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आदिवासी हो जाना चाहता हूँ..

Posted On: 4 Apr, 2014 Others में

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आई डोंट नो व्हाट आई वांट. मैं अपने साथ खुश क्यों नहीं हूँ? अरे न मिले ख़ुशी कम से कम चैन-ओ-सुकून तो मिले. जैसे-जैसे समय बीतता रहा है, मेरे अंदर का पागलपन बढ़ता ही जा रहा है. कुछ भी करके ख़ुद को भुला नहीं पता हूँ, कैसे बिसारूं ख़ुद को? मेरा होना एक घाव जैसा हो गया है, जहाँ से हर वक़्त टीस उठती रहती है. ख़ुद तो परेशान रहता ही हूँ अपने आस-पास के लोगों को भी परेशान कर देता हूँ. एक कांटे की तरह हो गया हूँ मैं, वो भी एक ऐसा काँटा जो दोनों तरफ़ से नुकीला है. मेरी जानकारी, मेरा ज्ञान ही मेरे लिए अभिश्राप बन गया है. आठो पहर ख़ुद को सम्हाले रहता हूँ, कहीं भाग जाने को दिल करता है, कहीं खो जाना चाहता हूँ मैं, मिट जाना चाहता हूँ.
कल अपने एक दोस्त से कह रहा था कि मेरी ज़िन्दगी में 70 फीसदी समस्या मोहब्बत की वजह से है, बीस फीसदी पैसों की वजह से, और दस फीसदी मेरे ख़ुद के होने की वजह से. मेरी बात सुन कर वो कहने लगा कि नहीं पूरी सौ फीसदी तुम ही हो. दम लगा मुझे उस बंदे की बात में भी. अपनी बात पूरी करके वो मुझे ग़ालिब की एक शेर सुनाने लगा, “ना था कुछ तो ख़ुदा था, कुछ न होता तो ख़ुदा होता, डुबोया मुझ को होने ने, न होता मैं तो क्या होता?” मैं भी यही पूछना चाहता हूँ, ‘तो क्या होता?’
अगर को खरीदने में उत्सुक हो तो, मैं अपनी खोपड़ी बेच कर आदिवासी हो जाना चाहता हूँ. समय में पीछे लौट जाना चाहता हूँ मैं, नहीं रहना है मुझे इस सभ्य दुनियां में, आवारा बन जाना चाहता हूँ मैं. नंगा सड़कों पर टहलना चाहता हूँ, खुली हवा में सांस लेना चाहता हूँ. दरख्तों को महसूस करना चाहता हूँ, जानवर की तरह बेफिक्र हो कर जीना चाहता हूँ. अब और यूं इस पागल दुनियां में मुझसे दौड़ा नहीं जाता है. कोई मेरी खोपड़ी से मुझे मुक्त कर दे…प्लीज़!

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