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सुनिधि

Posted On: 10 Jan, 2014 Others में

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उसकी सबसे बड़ी खासियत ये थी की उसमे कोई खासियत नहीं थी | अजीब थी वो बिलकुल, सांस ले-ले कर बोलती थी, बोलते बोलते रुक जाती थी और शून्य में घूरने लगती थी, फिर जब नज़रे समेट कर अपनी बड़ी आँखों से मुझे देखती थी, तो मैं तत्क्षण विचार शून्य हो जाता था…| नई बात ये थी कि मुझे उसकी चुप्पी खलती नहीं थी… और न ही उसे मेरी चुप्पी खलती थी | उसके साथ बिना बोले भी मैं सहज महसूस करता था | उसके साथ वक्त ऐसे गुज़रता था जैसे कोई पत्ता दरख़्त से टूट कर आराम से लहराता हुआ ज़मीन तक पहुँचता हो, मज़े से झूमता हुआ, कभी इस डाली पर अटक जाना, तो कभी उस डाली पर थोड़ी देर सुस्ता लेना…. ज़मीन पर पहुँच के भी पत्ता सहज ही बना रहता है, हवा के साथ इधर-उधर डोलते रहता है, हम भी मिलने का समय समाप्त होने के बाद भी बीस तीस मिनट तक यूंही ख़लाओं में डोलते रहते थे…| हमारा वक़्त बिल्कुल आराम व सुसतई से कटता था | हम दोनों में परिपक्वता थी, ठहराव था, उसे जीवन के अनुभवों ने पकाया था तो मुझे किताबों ने | हमारे मिलने की लम्बाई चाहे कितनी ही क्यों न हो, गहराई हमेशा अथाह होती थी |
उसका स्वभाव बहुत हद तक मुझसे मिलता था | वो जिस रफ़्तार से बोलती थी मैं उसे उसी रफ़्तार से सुनता था… जब वो रुक जाती थी तो मैं भी उसके साथ रुक जाता था…| उसको सुनते समय मुझे लुडविग विट्गेंश्टाइन की याद आ जाती थी | विट्गेंश्टाइन सूत्रों में लिखता था, ये टुकरों में बोलती थी | सुनिधि (बदला हुआ नाम) का हर वाक्य ‘एनफ अन्टू इटसेल्फ’ होता था.. दुसरे वाक्य का पहले वाक्य से शायद ही कोई संबध होता था | लड़कियों की ये आदत मुझे हमेशा से अच्छी लगती है, बेसिर-पैर की बातें करना, कीसी बात को कहीं से भी शुरू कर देना और बोलते बोलते मुद्दे को अचानक बदल देना… I Just Love It…| सुनिधि से मिलने का बाद मुझे पहली बार इस बात का बोध हुआ कि सिर्फ प्रेम आदमी को सिखाता है, इंसान न तो पढ़ के कुछ सीखता है, न ही किसी को देख या सुन कर.. हज़ारों किताबों को पढ़ कर जिन चीजों को मैं सिर्फ बौद्धिक रूप से ही समझ पाया था, वो बातें उसकी अंतर-दृष्टि थी | स्व-अनुभव से उसने इतना कुछ सीख लिया था जितना कोई पूरी दुनिया की किताबों को पढ़ कर भी न सीख पाए….|
सुनिधि से मैं 2011 के जुलाई में, दिल्ली में मिला था | मैं उस वक्त नई दिल्ली के खानपुर इलाके में रहता था, और वो गुडगांव में अपने माँ-बाप के साथ रह रही थी | जब मैं उससे मिला तो सबसे पहली चीज़ जो मैंने उसमे नोटिस की थी, वो था उसकी ‘सोल-सर्चिंग आईज’ | उसके बाद लम्बे काले बाल, कमर से नीचे घुटनों तक आते थे उसके बाल | उसके बालों की लम्बाई देखकर एक पल को मैंने सोचा कहीं ये बंगालन तो नहीं है | लेकिन वो बंगालन नहीं थी, उसके लहजा और पहनावा से मैंने अंदाज़ा लगाया कि ये उत्तर भारतीय है, संभवतः यूपी की है, या फिर प्रॉपर दिल्ली की ही है |
मुझे उसकी तीन साल की बेटी भी बड़ी प्यारी लगती थी, वो मेरे लिए एक बहुत बड़ी आकर्षण का केंद्र थी, बहुत ही प्यारी थी उसकी बेटी | लेकिन मैं ये सोच कर घबरा जाता था कि क्या बच्ची मेरी माँ को भी प्यारी लगेगी, क्या मेरी माँ कभी ये बर्दाश्त कर पायेगी कि मैं एक ऐसी लड़की से प्यार करता हूँ जो पहले से शादी-शुदा है और उसकी एक तीन साल की बेटी भी है…???

‘Did I ever tell you that I like you..? I love to be with you, how you feel with me..?’, चाय पीते हुए सुनिधि ने मुझसे कहा और बिना मेरे जवाब का इंतजार किए, प्याला मुंह से लगा लिया…| मैं जनता था कि एक दिन ये मुझसे ऐसा कहने वाली है लेकिन इस तरह यूं अचानक से उसके मुंह से ‘I like you.’ सुनकर मैं थोड़ा असहज हो गया…| मेरे तरफ़ से कोई जवाब न सुनकर उसने पलकें उठा कर सीधा मेरी आंखों में देखा… ‘द सोल सर्चिंग आईज’…, उसके चहरे पर चमक और शरारत थी, चाय का एक बूंद शबनम की तरह उसकी होठों पर अटका हुआ था… गुलाब की पंखुड़ी सा नाज़ुक होठ, यूं लगा जैसे मुझे आमंत्रित कर रहे हैं… मेरा भी जी किया कि जवाब देने के बजाए सीधा इसके होठों को चूम लूं… इसके चेहरे से छटकती नूर को पी जाऊं…. इस तीन दिन में इस लड़की ने मेरी ज़िन्दगी के पुरे सिस्टम को बदल कर रख दिया था… पहले दिन से ही जिस अधिकार से उसने मुझ से बात करना शुरू किया था आज तक किसी ने नहीं किया था…| मुझे फ़ोन पर मिलने के लिए ऐसे ऑर्डर देती थी जैसे कैप्टेन अशोक मैं ही हूँ…| उस वक्त उसने कुछ इस अदा के साथ देखा था कि मेरे पुरे शरीर में सनसनी फ़ैल गयी… मन में ख्याल आया कि उससे पूछूं ‘why you are not my wife, क्यों की उस कैप्टन से शादी की जो छः महीना जहाज पर ही गुजारता है…| हज़ार सवाल पूछना था उससे, उसके सवाल और I like you ने मेरे अंदर आत्मविश्वास भर दिया था… ये एहसास कि सिर्फ मैं ही नहीं वो भी मुझे पसंद करती है मेरे सीने को गर्व से फुला दिया था… किसी शादी-शुदा स्त्री द्वरा चाहे जाने का ये मेरा पहला अनुभव था | मैं अपने नाखून से उसके शरीर पर अपनी भावनाओं को लिख देना चाहता था…. उसके सुकोमल बदन पर होठों से ग़ज़ल लिखने की तम्मना थी | बाहर खिड़की से आती हवा उसकी जुल्फ़ों से खेल रही थी, मैंने दरवाज़े की तरफ़ देखा दरवाज़ा खुला हुआ था…. मैं थोड़ा निराश हुआ…शयद वो मेरे चेहरे पर मेरे अंदर उठ रहे तूफ़ान को महसूस कर रही थी…. एक टक मुझे देखे जा रही थी…. सीने से लगाकर होठों को चूमने की भावना को मैंने जब्त किया और मुस्कुराते हुए उसकी हाथों को अपने हाथों में लेते हुए कहा, “You never told me, but your eyes always tells me that.” मैंने नोटिस किया मेरी तरह उसकी सांसे भी तेज़ हो गई थी, मैं उसके हाथों को अपने हाथों में ले कर दबा रहा था… उसे कहना चाहता था कि I Love you, तुम जैसे भी हो मुझे काबूल हो…लेकिन जैसे ही उसकी आंखों में देखा मेरे अंदर से आवाज़ ही नहीं निकली…. इससे पहले कि मैं उसके चेहरे को हाथों में लेता, दरवाज़े पर दस्तक हुई और उसका नौकर चाय की प्याली उठाने के लिए कमरे में आया, मैंने झट से हाथ छोड़ दिया…….| ये हमारी तीसरी मुलाकात थी, और तीन दिन हमें उसके बाद और मिलना था |
क्रमशः

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January 10, 2014

दिल पे मुश्किल है बहुत दिल की कहानी लिखना जैसे बहते हुए पानी पै हो पानी लिखना. कुछ भी लिखने का हुनर तुझको अगर मिल जाए इश्क को अश्कों के दरिया का रवानी लिखना.


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