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घर में मूत्र-विसर्जन महंगा पड़ा

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

December 14, 2013

मियाँ………………..अब पूरा पढ़ चूका हूँ……….मगर मजा नहीं आया………………….एक छोटी से बात को इतना बढ़ा चढ़ा के लिखे हो कि अविश्वसनीय लग रहा है………………..ऐसा लगा रहा जैसे तुम एक रूम नहीं बल्कि इस जहाँ को छोड़कर स्वर्ग में चले गए………….और वहाँ देवताओं ने तुम्हें चुक्का-मुक्का बैठाकर जी भर लतियाया तो तुम दुम दबाकर फिर इसी नरक में आ गए…….आओ-आओ स्वागत है…………….हाँ…………..हाँ……………

    December 14, 2013

    वैसे एक बात तो मैं भी बताना चाहता हूँ कि तुम तो यहाँ हरेक जगह सफाई से निकलते गए हो परन्तु मैं तो दो साल पहले बिना गुनाह के रात भर जेल में काँटा और क्या खातिर-बातिर हुई वहाँ मेरी ……….पूछो मत बस मजा आ गया…………………..जल्दी ही अपने इस जीवन के सच को लेकर आ रहा हूँ अपने अगले पोस्ट में जिसे मेरा मन छुपाया था कि कहीं मेरी बेइज्जती न हो जाए………….

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 14, 2013

    “Life is more fictitious than any fiction.” बढ़ा चढ़ा कर नहीं लिखा गया है…!! अतिश्योक्ति कहानियों में होती है, जीवन में नहीं, जीवन जितना है उतना ही कहना मुश्किल है, अतिश्योक्ति का तो सवाल ही पैदा नहीं होता… अगर मैं ये कहूं कि “जो चीज़ इकहरी थी वो दोहरी निकली, सुलझी हुई जो बात थी उलझी निकली, सीपी तोड़ी तो उससे मोती निकला, मोती तोडा तो उसमें सीपी निकला, मिक़राज़ (कैंची) ख़ुद अपने को कतर जाती है, जम जाती है लौ, आग ठिठुर जाती है, जितना भी उभारती है जिस चीज़ को अक्ल, उतना ही वे ग़ार में उतर जाती है” भाई ये सब जीवन में होता है, जीवन चमत्कारों का चमत्कार है… यहाँ कुछ बढ़ा चढ़ा कर कहने की ज़रुरत नहीं है जितना है अगर उतना ही कह पाओ तो अपने को धन्यभागी समझो….मेरे दोस्त ने जब इस लेख को पढ़ा तो उसने कहा बहुत सी बातें तो तुमने छोड़ ही दिया….और ये सच भी है मैंने सब को कम-कम करके लिखा है….तुम इतने को ही अविश्वसनीय कहते हो…क्या होगा जब कोई कबीर ये कहेगा कि, “एक अचम्भा मैं ने देखा नदिया लागी आग…” जब नदी में आग लगा देखोगे तो क्या कहोगे….मच्छली जब पेड़ पर चढ़ेगी तो फिर क्या कहोगे…..अक्ल में आग लगा कर पढ़ो और जीवन को देखो….!! बुद्ध ने कहा, ‘समंदर में भी उतना पानी नहीं है, जितना दुखियो नेआंसू बहाया है’ तुम्हे क्या लगता है ये अतिश्योक्ति है…??? बुद्ध की छोडो जब तुम कहते हो, ‘मैं उस लड़की के बिना जी नहीं सकता’… क्या ये अतिश्योक्ति है…??? बुद्धि के पकड़ में जीवन नहीं आती है, इसीलिए तो हम दूसरों के सुख- दुःख समझ नहीं पाते हैं, मीरा कहती है, ‘विरहिन के दुःख को एक विरहिन ही समझ सकती है’, जीवन गणित नहीं है महाकाव्य है…इसे तर्क की कसौटी पर मत कसो…!!!! संशय जीवन को छोटा कर देगा…चमत्कारों में भरोसा करना सीखो…!!!

December 14, 2013

रात देर तक चली मीटिंग के थकान के कारण लेख पढ़ते-पढ़ते सो गया…………..

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 14, 2013

    Let me decode it… रात देर तक दौर-ए-मय चला, नशे के कारण राह चलते चले नाली में लुढक गया…सुबह आँख खुली तो कुत्ता मुंह में शुशु कर रहा था….!! I think यही कहना चाह रहे थे तुम….!!!

    December 14, 2013

    हाँ……………….हाँ………………….कमाल है मियां…………………पर यह सब तुम्हें कैसे पता………………….कहीं उस नाली में दूसरा तुम………………..ओ या …………….तो तुम थे………….यार बिलकुल पहचान में नहीं आ रहे थे…………….हाँ……………..हाँ…………

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 18, 2013

    इतनी ऊँची मत छोड़ो, गिर पड़ोगे धरती पर, क्योंकि आसमानों में, सीढ़ियाँ नहीं होतीं, रोज़ क्यों नहाते हो वज्न मत घटाओ तुम, वो बदन भी क्या जिसमें खुजलियाँ नहीं होतीं,

sinsera के द्वारा
December 13, 2013

सिगरेट शराब और लड़की …….भयानकतम कॉम्बिनेशन…..इंसान कितना गिर सकता है ये सोचा भी नहीं जा सकता…ऊपर ऊपर सीधे दिखने वाले लोग अंदर से कैसे होते है ये देख लिया ..क्या सोचा था और क्या निकला ….ऐसे मनुष्यों को क्या कहा जाये……ज्ञान ध्यान की बड़ी बड़ी बातें करने वालों की ये हरकत…..??कि खुद गद्दे पर सोये और दोस्तों को ज़मीन पर सुलाया…….???छि छि …

    December 14, 2013

    जी तरह यह लेख अविश्वसनीय है उसी प्रकार आपका यहाँ कमेंट भी …………ऐसा लगा जैसे कोई जिलेबी को सीधा होने की बात कर रहा हो……………

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 14, 2013

    पच्छिम में महान विचारक और संत Alan Wilson Watts उसके आखिरी दिनों में उसके एक मित्र ने पूछा, “तुम बुद्ध के भक्त हो, उनकी देशनाओं का पालन करते हो…उनको गुनते हो…फिर मुझे समझ नहीं आता, ‘तुम शराब क्यों पीते हो’, अगर बुद्ध तुम को शराब पीते हुए देखते और ये सवाल पूछेंते तो तुम क्या जवाब देते…” Watts हंसने लगा उसने कहा, “बुद्ध मुझसे कभी ये सवाल नहीं पूछेंगे…क्योंकि I always drink in an enlightened way (मैं हमेशा बुद्ध की तरह शराब पीता हूँ)…….. ये सवाल ही पैदा नहीं होता कि हम क्या करते हैं, हम कैसे करते हैं…ये ज्यादा महत्वपूर्ण है, दूसरी बात… क्या सुखों पर सिर्फ़ पापियों का ही हक़ है…?? ख़लील जिब्ररान से किसी ने उसके सिगरेट पीने की आदत के बारे में पूछा, तो उसने कहा सिगरेट पीना मेरा आनंद है आदत नहीं…. विवेकानंद ने भी ठीक यही जवाब दिया था… जीसस शराब पीते थे… हर्मन हेस का सिद्धार्थ वेश्या के संग रहता था और शराब और धूम्रपान का सेवन करता था… रामकृष्ण परमहंस मांस खाते थे…और जब तंत्र की साधना कर रहे थे तो शराब पीते थे… सिगरेट पीने के साथ-साथ जिब्रान औरतखोर भी था…. सुकरात समलैंगिक था… कहने का ये मतलब है कि कृत्य को कसौटी बना कर संतत्व को कभी नहीं परखा जा सकता है… हमारी सोच संक्रीर्ण हो गयी है… हम रुग्ण, मंदबुद्धि, डरपोक और गोबर गणेश लोगों को संत और ज्ञानी मानते हैं…. सोचने वाली बात ये है कि जो अंगूरी शराब को पीने से डरता हो और परमात्मा रुपी शराब (शराबे-तहूरा) को क्या पी पायेगा….?? परमात्मा परम नशा है…. जो संभोग से डरता है वो क्या समाधि कहां जान पाएगा…. समाधि परम संभोग है…. जो परमात्मा की बनाई कृति से प्रेम नहीं कर सकता है वो परमात्मा से क्या प्रेम करेगा…. औरत इस अस्तित्व की श्रेष्टतम अभिव्यक्ति है….| (कोई शराब पी कर बर्बाद नहीं होता है, न ही कोई शराब पी कर बहकता है… बहके हुए लोग पानी भी लें तो बहक जाते हैं…शराब या शराब जैसी मादक पदार्थ उसी को बहार लाता है, जो पहले से हमारे अंदर दबा पड़ा होता है….) मेरे पास गद्दा होना सिर्फ एक संयोग था…अगर किसी के पास भी गद्दा होता तो मैं ही उस पर सोता…अगले दिन जब डायरेक्टर अपने लिए गद्दा और तकिया ले कर आया, मेरे पास तकिया नहीं था…मैंने उसकी तकिया ले लिया और वो बिना तकिये के सोया…. प्रेम का सूक्ष्म धागा जो हमें एक दुसरे से जोड़ता है हम इसको बहार से नहीं देख सकते हैं…. दर्शक बन कर इसको समझना मुश्किल है… अभी whatsapp पर मैंने एक pic लगाई है वो pic एक ख़त की फोटो है जिसमे मेरी शरीक-ए-हयात ने मुझे गाली लिख कर दिया था, कोई बहार से देखे और सिर्फ शब्दों को ही समझे, तो वो बोलेगा ‘ये लड़की इससे नफरत करती है’, बजाहिर वो मुझे दिन भर गाली देती रहती है क्या कुछ नहीं बोलती है मुझे, जब खुश होती है तो बोलती है, “I hate you, I don’t like you.” जबकि हक़ीकत ठीक इसके ल्टा होता है | अगर सूरज दिखाई न दे तो अपनी आंख पर शक करना चाहिए न कि सूरज पर… जीवन तर्कातीक है… इसिलए लिए यहाँ बुद्धि की बात चाहे लाख ठीक लगे…लेकिन करना हमेशा भरोसा हृदय पर ही चाहिए….. “क्या शैख़ मिलेगा गुलाफ़िशानी करके, क्या पायेगा तौहीन-जवानी करके, तू आतिशे-दोज़ख़ से डराता है उन्हें, जो आग को पी जाते हैं पानी करके”

    sinsera के द्वारा
    December 14, 2013

    आपका जवाब देख कर मुझे भोले भाले बाल कृष्ण का ध्यान हो आया……”मैया मोरी, मैं नाही माखन खायो…..” जिन बातों की आपने सफाई दे डाली उन को तो मैं ने पूछा ही नही था…मुझे तो सिर्फ ये बुरा लगा कि ज्ञान की बड़ी बड़ी बातें करने वाले भी इतने स्वार्थी हो सकते हैं की खुद गद्दे पर सो के दोस्तों को ज़मीं पर सुलाते हैं….

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 14, 2013

    आपका कमेंट पोलिटिकल था, दुईअर्थी था…एक अर्थ जो सिर्फ मैं ही समझ सकता था…दूसरा जो लोग समझते.. इसीलिए मुझे आपके साथ लोगों को भी जवाब देना पड़ा… आप निमित मात्र थीं…!!! दूसरी बात, सफाई मैंने किसी बात की नहीं दी है….बस लोगों के मन को साफ़ करने की कोशिश की है…सच कहूं तो लोगों को भ्रष्ट करने की कोशिश है…हिम्मत दे रहा हूँ लोगों को..!!!

    sinsera के द्वारा
    December 14, 2013

    जिस PG में आप वापस जा चुके हैं देखिये वहाँ आस पास कोई खम्भा वंभा भी होगा…… और हाँ ये कोई द्विअर्थी बात नहीं है..आप ये न समझे कि ये लेख के शीर्षक से रिलेटेड है…….ये बिल्ली वाला मुहावरा है कुत्ते वाला नहीं….मुहावरे को मुहावरा ही समझें शाब्दिक अर्थ पर न जाएँ….. :-) :-):-):-):-):-):-):-):-):-):-):-):-):-):-):-):-):-):-):-):-):-):-):-):-)

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 14, 2013

    हूँह…कुछ भी …!

December 13, 2013

यह PG क्या होता है…………….

    sinsera के द्वारा
    December 13, 2013

    PG मतलब पतली गली…

    December 14, 2013

    gजी, शुक्रिया मेरी गलत फहमी को दूर करने की……………………वरना मैं तो समझ रहा था कि PG का मतलब “पागलो का गैरेज”……………………..हाँ………………हाँ……………………

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 14, 2013

    PG मतलब होता है ‘पेइंग गेस्ट’… यहाँ तुम्हे सब कुछ माकन मालिक ही देता है…जैसे बेड, वाशिंग मशीन, टीवी, किचन का सारा सामान, मतलब सब कुछ, जितनी भी ज़रुरत की चीज़ है सब माकन मालिक का होता है, कुछ खरीदने और ढ़ोने की ज़रुरत नहीं होती है…पैसा दो और मज़े से रहो…!!

December 13, 2013

हाँ………………हाँ…………………………..When all the power and knowledge of world come to end, I am started from there………………………..I am Anil Kumar Aline………………………….हाँ…….हाँ……………हाँ………….

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 14, 2013

    “I am started” {(Object+is/am/are+V3+ (by Subject)} Whom are you started by…????? Who is starter here…?? Your statement proves you a puppet in somebody’s hand. You are just a puppet who is started by some puppeteer. Second thing… Knowledge and power never comes to an end, it’s ever-lasting, ever-expanding, and ever increasing…!!

    December 14, 2013

    मियाँ,………………तुम वो देखे हो जो है……………इसके लिए बधाई वरना ……लोग यहाँ अपने गुरुर के वशीभूत होकर मुझमे गुरुर देख रहे थे………………… यहाँ मैं ज्ञान और शक्ति के ख़त्म होने की बात नहीं कर रहा बल्कि विश्व के ज्ञान और शक्ति के. जो एक समय से अधिक नहीं हो सकता परन्तु वो उस पार भी है……………..परन्तु हममे से हर कोई अपनी सीमायें बनाकर उसी को सत्य मान बैठा है और बस उसी में पगलाए बैठा है………….

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 16, 2013

    “मिट्टी का तन, मिट्टी का मन, क्षण भर जीवन, मेरा परिचय”

Rajesh Kumar Srivastav के द्वारा
December 13, 2013

अरे ! सूफी भाई क्या लिख डाला / सस्ती लोकप्रियता पाने का तरिका अपना रहे हो /

    December 14, 2013

    और आप तो लोकप्रियता पाने के लिए, इससे भी सस्ता तरीका अपना रहे हैं इस पर कमेंट करके……………….

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 14, 2013

    मेरे भाई, जो लोग ही प्रिय नहीं हैं उनके बीच लोकप्रिय होने का क्या अर्थ…??? जिनको मैं प्रिय नहीं मानता अगर वो मुझे अपना प्रिय भी मानते हों तो मुझे इससे कोई ख़ास प्रफुल्ता नहीं होती है… मैं लेख दूसरों को ध्यान में रख कर नहीं लिखता हूँ, मेरी कोई भी कृति ऑब्जेक्टिव आर्ट नहीं है, सब सब्जेक्टिव है…अंग्रेजी में एक टर्म यूज़ होता है, “थिंक अलाउड”, इसका अर्थ होता है हम जो भी कहते हैं खुद के लिए कहते हैं…ये सब लेख मेरी डायरी के पन्ने हैं…आमतौर पर लोग अपनी डायरी को दूसरों से छुपा कर रखते हैं…उनको लगता है दूसरा पढ़ लेगा तो उसके राज़ को जान जाइयेगा…उसकी छवि खराब हो जायगी..वगैरह-वगैरह… लेकिन मामला मेरे साथ थोडा भिन्न है…मुझे दूसरों की फिकिर ही नहीं है…मेरे राज़ ऐसे हैं कि अगर कोई जान भी ले तो उसको जान नहीं पायेगा…ऐसा गोरख धंधा है कि दूसरा कभी न तो जान सकता है न ही समझ सकता है इसीलिए मुझे उनसे ज़रा भी डर नहीं लगता…इसीलिए कुछ भी लिख देता हूँ…मुझे याद है 02 Oct, 2010 मेरे पिछले रुत की साथी (गर्ल फ्रेंड) मुझसे बोली, “मैं खुद को लोगों की पहुच से दूर रखती हूँ”, उसकी बात सुन कर मैं ज़ोर से हंसने लगा, तो बोली तुम हँसे क्यों, मैं ने कहा, ‘शयद तुम ये सोचती हो कि दूसरा तुम तक पहुँच सकता है…लगता है तुम्हे अपना पता नहीं है क्योंकि जैसे ही तुम्हे अपनी थोड़ी भी खबर मिलेगी, ये साफ़ होने लगेगा कि दूसरा तुम तक पहुँच ही नहीं सकता है, मनुष्य न तो ‘अननोन’ है न ही ‘नोन’ है, मनुष्य ‘अन्नोअबल’ है अगेय है…!! जीवन ऐसा रहस्य है, इसको जितना जानोगे ये उतना रहस्यपूर्ण होता चला जाएगा” मेरे मन मंदिर का द्वार सब के लिए खुला है, कोई भी आ जा सकता है, जो चीज़ तुम जान सकते हो वो मेरे छुपाने के वावजूद भी जान लोगे ही, इसीलिए उनको छुपाने का कोई सार नहीं है…जो चीज़ छुपी हुई है वो ऐसी है जिसको जान के भी नहीं जाना जा सकता है, इसिलए डर का कोई सवाल नहीं है… ||| मैं लेख खुद पर हंसने के लिए लिखता हूँ…!! I am self-obsessed..!!


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