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एक समय सखि सुअरि सुन्दरि

Posted On: 7 Dec, 2013 Others में

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एक समय था जब मैं ख़ुद को सौंदर्य का उपासक मानता था और इसका सबूत ये है कि जिस लड़की को देख कर पहली बार मेरा दिल स्पंदित हुआ था वो थी ‘सिनेमा जगत की सोनपरी- ऐश्वर्या राय’…| जैसे बच्चे के साथ माँ का भी जन्म होता उसी प्रकार ऐश्वर्या की अभूतपूर्व सौंदर्य को देख कर उपजे प्रेम के साथ मेरे अंदर रूह का जन्म हुआ था..| बालावस्था से अभी तरुणाई में प्रवेश ही कर रहा था, वासना की तरंगे कहीं एक जगह केन्द्रित न हो कर पुरे शरीर में फैली हुईं थी | अभी प्रेम की गंगा गंगोत्री से निकली ही थी, प्रवाह में बहुत ज्यादा बल तो नहीं था लेकिन सागर तक पहुँचने की अचीन्ही अभीप्सा ज़रूर थी…|

जल्दी ही यथार्थ का बोध हो गया, अनुभव में आया कि मैं किसी छोटे से जल कुंड की वो तरंग हूँ जो उछल कर चांद को छूना चाहता है, लेकिन ये कब और कहां मुमकिन था | अब सोचता हूँ कि काश उस वक्त मैंने बच्चनजी की वो कविता ‘कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती’ पढ़ी होती, तो शायद इतिहास कुछ और हो सकता था…| मज़ाक कर रहा हूँ, मैं पूर्णरूप से यथार्थवादी हूँ, सकारात्मक-सोचवादी और कवियों की सधुकड़ी का मुझ पे कोई ख़ास असर नहीं पड़ता है…| वैसे मैं अभी यहाँ तत्वमीमांसा नहीं करना चाहता हूँ, सो मुद्दे पर आते हैं |

उस वक्त मुझे प्रेम के किसी परमात्मा रुपी सागर का कोई पता नहीं था, और मैं मानता हूँ कि गंगा जब गंगोत्री से चली होगी पहली बार तो उसे भी किसी सागर का कोई पता नहीं होगा, रास्ते में मिलने वाली किसी भी पोखर, तलाब, झांखर, कुंड और नदी को ही अपनी मंजिल समझ लेती होगी… मेरे रास्ते में भी बहुत सारी लड़कियां आई, जो भी ढंग की दिख जाती थी मैं उसी के घर के सामने धूनी रामा कर बैठ जाता था..| इसी दौरान मेरे हाई-स्कूल में हरिद्वार से कुछ पंडित आए थे उन्होंने हर कक्षा में कुछ एक किताबें बांटी थी, उन किताबों में ब्रह्मचर्य को बहुत महिमामंडित किया था, लीला शाह, हनुमान, और महर्षि राम का हवाला दे कर ब्रह्मचर्य का पालन करने से प्राप्त होने वली शक्तियों का बखान किया गया था… उनका कहना था कि कोई अगर पचीस वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन कर ले तो जिंदगी में कुछ भी प्राप्त कर सकता है… मेरे महत्वकांक्षी मन पर उन किताबों का अच्छा खासा असर पड़ा था | मैंने संयम साधना शुरू किया, मतलब रमणियों से और उनकी तसव्वुर से परहेज करना शुरू किया… लेकिन थोड़े दिनों के बाद ही मेरे अंदर कुछ विचित्र घटने लगा, मेरा सारा सौंदर्यबोध हवा होने लगा, ‘एक समय सखि सुअरि सुन्दरि’ वाली स्थिति हो गई, जिन लड़कियों को मैं पहले एक पईसे का भाव नहीं देता था वो सब भी अब मुझे कभी अगर दिख जाती थीं तो उनमे मुझे मेनका, रंभा नज़र आने लगती थी…| लेकिन महात्माओं ने कहा था संयम हमेशा कठिन होता है, सो मैंने तपश्चर्या जारी रखा, लेकिन ये सब इतना आसान नहीं था, दिन भर तो मैं जैसे तैसे ख़ुद को सम्हाल लेता था, लेकिन इन देवियों ने अब रात मेरे सपनों में आना शुरू कर दिया… सुबह उठ कर जब अपनी हालत देखता था तो अपराध बोध से भर जाता था…!!

महात्माओं की किताबों का असर तो था ही मुझ पर लेकिन और भी कुछ ऐसा हुआ था मेरे साथ जिसकी वजह से मुझे संयम साधना पड़ रहा था… बात थोड़ी हांस्यस्पद है लेकिन ज़िक्र ज़रूरी है, अपने एक दो दोस्तों और प्रेमिकाओं के सिवाय ये बात मैंने आज तक किसी के साथ नहीं बांटी है…. हुआ यूं था कि मैं अपनी नई आयी जवानी से परेशान रहने लगा था, बिल्कुल शुरू-शुरू की बात है, उम्र बस तेरह साल थी, मुझे पता भी नहीं चलता था और घटना घट जाती थी, इज्ज़त का सवाल हो जाता था, अजीब लगता था, मुझे हाथ से चीन की दीवाल खड़ी करनी पड़ती थी, लेकिन हाथ लगाने से बात और बिगड़ जाती थी | (कल्पना शक्ति का इस्तेमाल कीजिए और बात को समझने की कोशिश कीजिए, ज्यादा मर्यादित तरीके से मुझ से कहा नहीं जा रहा है, इसीलिए जितना मैं कहूँ उससे ज्यादा समझिए… नहीं तो आप लोगों को समझाने के चक्कर में खामखाँ मेरा लेख ‘सी’ ग्रेड का हो जाएगा)… मेरी माँ ने मेरी असहाय अवस्था को भांप लिया और पिता जी से कह कर बाजार से ‘अंदरूनी-वस्त्र’ मंगवा दिए.. कैसी विडंवना है मन अभी भी तितलियों के पीछे ही भागा करता था, लेकिन तन लडकियों के पीछे भागने लगा था, ये वो दौर था जब एक तरफ जवान होने में मज़ा भी आ रहा था और दूसरी तरफ शर्म भी…| अंदरूनी-वस्त्र धारण करने के बाद जो अनुभव हुआ उसकी की तो पूछिए मत…पस्त पस्त हो गया मैं… गुदगुदी से मेरी हालत ख़राब थी (सेंसर बोर्ड माफ़ करे…मुझे यहाँ कोई सही उपमा नहीं मिल रहा है सो बात साफ़ तरीके से कहनी पड़ रही है), शाम होते-होते मैं ख़ुशी से पागल हो चुका था, इतनी ख़ुशी, इतनी ख़ुशी कि क्या बताऊँ… दादा जी हमेशा कहते थे कि ‘ज्यादा हंसोगे तो रोंना पड़ेगा’, सच ही कहते थे जब हंसी अपने चरमोत्कर्ष पे पहुंची तो अचानक रोना आ गया… लेकिन इस बार आंसू का रास्ता अलग था, रास्ता के साथ-साथ उसके गुण-धर्म भी अलग थे… मेरा कलेज़ा काँप गया, डर के मारे हालत ख़राब हो गयी… हज़ार प्रश्न उठने लगे… सब से पहला सवाल उठा, ‘क्या मेरे अंदर कोई घाव है… ये मवाद क्यों निकला है..?’… हमेशा खुश रहने वाले को जब निढाल, बेहोश, उदास, सिकुड़ा और बेसुध पड़ा हुआ देखा तो मेरा शक यकीन में बदलने लगा.. मैं रोने लगा… सोंचा माँ को जा कर बताऊँ… लेकिन अंदर से पता नहीं कौन लेकिन कोई समझदार व्यक्ति ने मुझे माँ के पास जाने से रोका… मैं बहुत ज्यादा डर गया था…ऐसा महसूस हो रहा था मनो जवान अचानक वृद्ध हो गया हो… किसी से कुछ नहीं बोला.. लेकिन अंदर ही अंदर बहुत परेशान था…

दो तीन दिन बाद डर कुछ कम हुआ तो घटना स्थल पर जा कर खोज खबर लेने की सोची, घायल की तीमारदारी करने की सोची… इसी जाँच पड़ताल के दौरान कुछ विधियां भी इज़ाद किया मैंने, बाद में पता चला कि ये विधियाँ सनातन हैं, आदि काल से आश्रमों में रह रहे ऋषि मुनि और सद्गुरु इसका इस्तेमाल करते आ रहे है…इस दौरान ये भी पता चला कि इन क्रियाओं के ज्यादा वार दोहराने से आदमी अंधा भी हो सकता है..तरह तरह की खतरनाक जानकारी प्राप्त होती रही…|

प्रथम अनुभव में मिली आघात और महात्माओं के किताब का काफ़ी दिनों तक असर रहा मुझ पे, इन दोनों के अलाव सस्ती किताबों के पीछे छपा ‘बचपन की गलतियों’ वाला विज्ञापन भी बहुत दिन तक डराता रहा था |

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9 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sadguruji के द्वारा
December 10, 2013

सूफी जी,एक सवाल मेरा आप से और अनिल जी दोनों से है.मुझे संदेह है कि आप लोग साक्षी भाव में रहते हैं.मै अगर कुछ देर के लिए मान भी लूँ कि आप लोग साक्षी भाव में रहते हैं तो य़े बताइये कि चाहे सोनम जी का विषय हो या अन्य किसी ब्लॉगर का,आप लोग जो शोर शराबा करते हैं,उसमे गुस्सा,प्रतिशोध की भावना,धमकी देना और अनर्गल किसी का मजाक उड़ाना सब दिखाई देता है.उस समय आप लोगों कि स्थिति एक ख़राब से ख़राब व्यक्ति से भी ज्यादा गई गुजरी नज़र आती है.मै देखता हूँ कि आप लोग बुराई में पूरी तरह से लिप्त होकर के और बाकायदा ब्लॉगर के पीछे पड़कर उसे परेशान करते हैं और उसकी निंदा करते हैं और बाद में गहरा मजाक कहकर भाग लेते हैं.आप लोग ब्रह्ज्ञान की ऊँची से ऊँची बाते करते हैं,लेकिन उसपर स्वयं ही अमल नहीं करते हैं.आप लोगों के व्यक्तित्व में दोहरापन है-अपने लिए आप लोगो के नियम और हैं और दूसरों के लिए और.जो कड़वी बात आप लोग कहते हैं और कहकर खुश होते हैं,वही कड़वी बात कोई आप लोगों को कह दे तो आप लोग नाराज हो जाते हैं.मुझे तो सब ढोंग पाखंड नज़र आता है.अपनी सुविधा के लिए ज्ञानी होना अलग बात है और समाज के लिए ज्ञानी होना अलग बात है.आप लोग अपने ज्ञान का उपयोग अपनी सुविधा और अपनी बौद्धिक कसरत के लिए करते हैं.ये आप लोगों के साक्षी भाव को संदेहास्पद और हास्यास्पद बना देता है.6s8a

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 10, 2013

    मुनिवर, आपका सवाल बेबुनियाद और अजीब है- मैंने तो कभी नहीं कहा कि मैं साक्षी की साधना करता हूँ या साक्षी भाव में रहता हूँ… मेरा किसी चीज़ को लेकर कोई दावा नहीं है… और आपने मुझे क्या मान लिया है और क्या समझा है ये आपका व्यक्तिगत मामला है ‘मैं आपके व्यक्तिगत समझ से जुडी किसी भी सवाल का जवाब नहीं दे सकता हूँ..’ लोग अक्सर मुझ से कहते हैं, ‘मैं तो सोचता था तुम ऐसे हो, लेकिन तुम तो ऐसे हो’ – अब कौन क्या सोच के बैठा है मेरे बारे में उससे मुझे क्या लेना देना…??? “ब्रह्ज्ञान की ऊँची से ऊँची बाते करते ” मुझे किसी भी प्रकार की बात-चीत से कोई परहेज नहीं है…न कोई बात ऊँची है न नीची- ब्रह्म चर्चा हो या सेक्स की चर्चा हो, या राजनीती की चर्चा मैं सब के साथ सजह हूँ, जब जैसे लोग मिल जाते हैं उनसे वैसी बात कर लेता हूँ — अगर आप मुझे ठीक से समझें तो मैं चरित्र-हीन हूँ, मेरा कोई चरित्र नहीं है- अपने ज़रूर कोई धारणा बना ली होगी मेरे बारे में जिससे कठनाई आ रही है, संदेह पैदा हो रही है…लेकिन मैं पूछता हूँ आपको धारणा बनाने के लिए बोला किसने था…??? अपने मंतव्यों को मुझ पर आरोपित कर रहे हैं… अपनी समझ की खिड़की से मुझे देख रहे हैं, और फिर पूछते हैं ‘आप मुझे ऐसे क्यों दिख रहे हैं..’, मुनिवर आपका सवाल बचकाना है, ये ऐसे है जैसे हरा चश्मा लगा कर कोई पूछे कि मुझे सब हरा क्यों दीखता है…हद है..!!! जीसस का प्रसिद्ध वचन है, ‘Judge not, that ye be not judged.’ आपको कहा किसने मेरा निर्णायक बनने के लिए….??? किसी के मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आने का मैंने ठेका नहीं ले रखा है…!! “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी”, अंत मैं कुछ बातों को दोहरा दूं…’मैंने किसी के भी उम्मीद पर खड़ा उतरने का कोई ठेका नहीं ले रखा है’, ‘I love freedom. मैं कभी किसी से नहीं कहता कि ‘मैं तो ये सोचता था तुम्हारे बारे में लेकिन तुम तो ऐसे निकले’ इस तरह की घटिया, राजनितिक और घिनौना सवाल मैं कभी नहीं पूछता….!! धर्म नितांत रूप से व्यक्तिगत मामला है, किसके भीतर से परमात्मा किस रूप में प्रगट होता है कोई नहीं जानता है, मुनिवर सत्य के आदर्शों को बदलना सीखिए…आदर्शों के लिए सत्य को बदलना मूर्खता होगी…अगर मैं आपकी साक्षी की परिभाषा में फिट नहीं बैठता हूँ तो अपनी परिभाषा को बदल दीजिए…आपके ज्ञान की किताब में कुछ भूल-चूक हो गयी होगी…सुधर कर लीजिए…मैं चुनाव रहित जीवन जीता हूँ, all is included in my life.

    sadguruji के द्वारा
    December 10, 2013

    सूफी जी,मैं आप का कमेंट पढ़ा.आप कहते हैं कि-I love freedom.मुझे लगता कि सभी लोग आज़ादी चाहते हैं.क्या दूसरे ब्लॉगरों की लिखने की स्वतंत्रता में दखल देना बचकानी हरकत नहीं है ?कमेंट के रूप में बौद्धिक पैरिचर्चा एक अलग बात है,परन्तु लेखक मंच छोड़ के चला जाये इस तरह से किसी के पीछे पड़ना भी बचकानी हरकत है.मै सोनम जी की बात कर रहा हूँ.इस तरह से किसी लेखक को जानबूझकर मानसिक रूप से टार्चर करना क्या बचकानी हरकत नहीं है ?

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 10, 2013

    “लेखक को जानबूझकर मानसिक रूप से टार्चर करना क्या बचकानी हरकत नहीं है” पहली बात सोनम मेरी वजह से मंच नहीं छोड़ रही है, न ही मुझसे नाराज है… आपका मुझसे ये सवाल करना मुझे समझ में नहीं आया… दूसरी बात आप सोनम की चिंता न करें…वो न तो नाराज़ है न ही मंच छोड़ रही…वो इन सब को लेकर ज़रा भी गम्भीर नहीं है…गम्भीर होने कि बीमारी आपको लगी हुई है…आपके सिवाय सब प्रसन्न है यहाँ…आपका घर फूस-मिटटी का है सो आप बारिश से डर रहे हैं…, जिनके माकन पक्के होते हैं वो बारिशों से नहीं डरा करते हैं…” कुछ दिन बीच कर के सोनम ऐसा नाटक करती रहती है…दो चार दिन में ठीक हो जाएगी…कोई नई बात नहीं है….लेखक के साथ ये सब होता रहता है…दो साल से उसे इस मंच पर देख रहा हूँ मैं…कई बार मेरे खिलाफ भी लेख लिखी है वो…कि ‘अब लिखना छोड़ दूंगी’… आपको स्त्रियों के मनोविज्ञान का ज़रा भी पता नहीं है…इसीलिए आप बीच में मत पड़िये….!!! “दूसरे ब्लॉगरों की लिखने की स्वतंत्रता में दखल देना बचकानी हरकत नहीं है” जी दखल देना तो बचकानी नहीं है लेकिन इस तरह का सवाल पूछना ज़रूर बचकानी है…अगर आपको लिखने की स्वतन्त्रा चाहिए तो दूसरे को भी प्रतिक्रिया व्यक्त करने की स्व्तंत्रता चाहिए…’मेरे लेख पर लोगों ने मुझे गाली दी है, मेरे विचारों का विरोध किया, मैं तो कभी व्यथित नहीं होता…! लोगों ने जमात बना कर मेरा विरोध किया है मैं क्यों नहीं चिल्ल-पों मचता हूँ….?? मैं भी तो लेखक हूँ…??? आज दो साल से जेजे पर लिख रहा हूँ, कोई कहे कि मैं कभी भी जेजे के फीड-बेक पर गया हूँ…?? आज तक मैंने फीड-बेक पर कुछ नहीं लिखा है….आज पीछले पांच लेख से मेरा लेख फीचर्ड नहीं हो रहा कहाँ मैं गुहार लगाने के लिए गया…कि आप क्यों मेरा लेख फीचर्ड नहीं कर रहे हैं….| मुझे पता है कि अगर मैं कुछ कहता हूँ, कुछ लिखता हूँ तो उसका प्रतिक्रिया भी होगा…कुछ परिणाम आएगा…..!! ‘

December 7, 2013

तुम जैसा तुम्ही का साक्षी अभी तक नहीं देखा ………………….जबकि हकीकत तो यह है कि मैं खुदी को खुद से छुपाता हूँ………………..सैलूट करता हूँ तुम्हें……………..

    sadguruji के द्वारा
    December 7, 2013

    सहमत हूँ आपसे….

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 9, 2013

    :) “इक तअल्लुक है वुजू से भी सुबू (शराब का मटका) से भी मुझे, मैं किसी शौक़ को पर्दे में नहीं रखता हूँ” :) :)

sadguruji के द्वारा
December 7, 2013

बहुत ईमानदारी से लिखा गया अच्छा लेख,जिसमे सच्चाई है.मेरी तरफ से बधाई.

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 9, 2013

    :) “गौतम की तरह घर से निकल कर नहीं जाते, हम रात में छुपकर कहीं बाहर नहीं जाते, उस वक़्त भी अक्सर तुझे हम ढूँढने निकले, जिस धूप में मज़दूर भी छत पर नहीं जाते”


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