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कैसे मैं उमर खैयामिक बना --१

Posted On: 5 Dec, 2013 Others में

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‘द अल्केमिस्ट ‘ के लेखक पाउलो कोएलो लेखक की परिभाषा देते हुए कहते हैं, “हमेशा चश्मा पहने रहता हो, बालों में कंघी नहीं करता हो, और उसकी बातें ऐसी हो जिसको उसके समसामयिक कभी न समझ सके” |
आज कल मेरे मोबाइल के वॉलपेपर में जिस लड़की की तस्वीर लगी है वो उस लड़की की है जिससे दो साल पहले मैं प्यार करता था (ये बात अपने आप में महत्वपूर्ण है क्योंकि आज कल मैं जिस लड़की के प्रेम में हूँ वो कोई और है, मतलब की प्रेम किसी और से करता हूँ, तस्वीर किसी और की लगा रखी है), उचित हो कि मैं ये कहूँ कि दो साल पहले हम दोनों एक दुसरे से प्यार करते थे, क्योंकि मैं आज भी प्यार उस लड़की से उतना ही प्यार करता हूँ जितना दो साल पहले करता था | इधर मेरे अनुभव में आया है कि प्रेम-पात्र (प्रेमिका) के चले जाने से प्रेम करने की क्षमता नष्ट नहीं हो जाती है | एक लड़की के जाने के बाद मैं बड़ी सहजता से दूसरी लड़की के प्रेम में पड़ जाता हूँ, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि पुरानी लड़की के प्रति जो प्रेम मेरे अंदर था वो समाप्त हो जाता है… बिल्कुल नहीं… !!! हाँ…ये ज़रूर होता है कि पुरानी वाली की कम याद आती है लेकिन जब भी याद आती है बहुत याद आती है…. | मैं बद्र साहेब से राजी हूँ जब वो ये कहते हैं कि ‘एक लड़की को भूलाने में दूसरी लड़की के आने तक का वक़्त लगता है’ | मज़ा ये है कि हर बार मैं ये महसूस करता हूँ कि मेरा ये नया वाला प्यार पुराने वाले प्यार से ज्यादा गहरा और समग्र है |
दो साल पहले मैं अपने रिलेशनशिप से परेशान हो कर दिल्ली से मुंबई आ गया था | सोच कर तो ये आया था कि कुछ दिन मुंबई में रह कर दिल्ली वापिस चला जाऊंगा, लेकिन मुंबई आने के बाद मैं फिर से दिल्ली जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया | मैं दिल्ली से इतना डर गया था कि कोई अगर दिल्ली की बात छेड़ देता था तो मैं वहां से उठ कर चला गया था… दिल्ली का नाम सुनकर ही मैं अंदर से कांप उठता था | पहली बार मुझे सार्त्र की ”दि अदर इज़ हेल” बाली बात कुछ कुछ समझ में आने लगी थी | लेकिन समय के साथ ज़ेहन से दिल्ली का डर जाता रहा, कोई एक साल मुंबई में रहने के बाद मैं तीन-चार दिनों के लिए दिल्ली गया था | दिल्ली जाने की वजह थी एक लड़की…, इस लड़की से मेरी दोस्ती ब्लॉगिंग की वजह से हुई थी, ये मेरी पहली ऑनलाइन रिलेशनशिप थी.. कुछ दिन चैटिंग और फ़ोन पर बात करने के बाद मैंने सोचा अब इससे मिल लिया जाए…
यहाँ एक बात गौरेतलब कि जैसे सार्त्र लड़कियों को इम्प्रेस करने के लिए दार्शनिक बना था, मैंने लड़कियों को इम्प्रेस करने के लिए लेखन का कार्य शुरू किया था | सार्त्र का तो मुझे पता नहीं लेकिन मुझे अपने इस उदेश्य में निराशा ही हाथ लगी… नहीं कि लड़कियां इम्प्रेस नहीं हुई…. लड़कियां तो बहुतों इम्प्रेस्ड हुई लेकिन गलत तरह की, फिर मैंने पाया कि जो लड़कियां पढने लिखने में ज्यादा रूचि लेती है वो थोड़ी अजीब होती है, इनसे बच कर रहना है ठीक है… ! ऐसा मैं इस लिए कह रहा क्योंकि जिस लड़की से मिलने के लिए मैं दिल्ली गया था, उससे मिलने के बाद मेरे पैरों के नीचे की ज़मीन खिसक गयी… जो इमेज उसने अपना मेरे सामने बनाया था वो उसके ठीक विपरीत थी… ज्यादा मैं यहाँ नहीं कहूँगा.. कहना उचित नहीं होगा… खैर दिल्ली जाना इतना निराशाजनक भी नहीं रहा… अपने पुराने दोस्तों से मिला, रिश्तेदारों से मिला…और जिस दिन मैं आने वाला था उस दिन एक चमत्कार हुआ… वो लड़की जिसकी वजह से मैं ने दिल्ली छोड़ा था मुझे कॉल कि बोली, ‘अख़बार में एक वर्ड पढ़ा था ‘leave no stone unturned’ जिससे तुम्हारी याद आ गई…’… खैर, हम शाम में मिले, अगर मेरा प्यार वक़्त के साथ बढ़ जाता है तो इसमें मेरा कोई कमाल नहीं है, जब मैंने उसे उस शाम देखा तो मेरे अंदर से यही आवाज़ आयी, ‘ये तो और सुंदर हो गई है…|’
हाँ मैं बात कर रहा था, मेरी ब्लोगिंग और मेरे लिखने के उदेश्य की…. लेखनी से मिली शुरुआती असफलताओं से मैं पूर्णरूप से निराश नहीं हुआ था, मुझे लेखनी के दम का पता चल गया था, मुझे ये तो समझ आगया था कि शब्दों का लड़कियों पर कमाल का असर होता है…दिक्कत बस ये आ रही थी कि सही टाइप की लड़कियों तक मेरी बात नहीं पहुंच रही थी… मैंने सोचा क्यों न माद्ध्यम बदल कर देखा जाए… इसी सिलसिले में मैं ने अख़बार के लिखना शुरू किया…| वैसे अख़बार से मुझे काफ़ी फायदा हुआ लेकिन मनवांछित फल यहां भी नहीं मिला, खैर जो कुछ भी… ब्लॉगिंग की तुलना में अखबारों के लिए लिखना ज्यादा सुखद था |
(ये जानने के लिए कि कैसे मैं उमर खैयामिक (lover ऑफ़ वाइन, वुमन एंड म्यूजिक) बना…. और कैसे अपनी मौजूदा प्रेमिका से मिला जो किसी और मुल्क से है…इंतजार कीजिए )

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33 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
December 13, 2013

उसके बॉय फ्रेंड यानि हमारे रूम मालिक की खता ये थी कि उसने एक गाने की शूटिंग के दौरना हीरोइन को ‘किस’ किया था, जो उसकी गर्ल फ्रेंड को नागवार गुज़री..| http://follyofawiseman.jagranjunction.com/2013/12/13/%E0%A4%98%E0%A4%B0-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AE%E0%A5%82%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0-%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9C%E0%A4%A8-%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%82%E0%A4%97/

sadguruji के द्वारा
December 7, 2013

जीसस कहते हैं “जो बचाएगा उसके पास जो भी है छीन लिया जाएगा, और जो नहीं बचाएगा उसे और दिया जाएगा ” उपनिषद का बचन है ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा’ जिसने भोगा उसी ने त्यागा….जिससे मुक्त होना है उसे भोगना ही होगा…मै इन वचनो से सहमत नहीं हूँ.भोग भी सामर्थ्य के अनुसार होता है,किसी की प्रधानमत्री,मंत्री,सांसद या विधायक बनने,की इच्छा है,जबकि वो एक सामान्य आदमी है तो वो कैसे भोग कर सकता है.जीसस मेरे विचार से यहाँ दान करने की बात कर रहे हैं और उपनिषद कुछ चीजों को भोग कर उसे त्याग देने की बात कर रहा है,जो व्यक्ति के सामर्थ्य के अनुसार हो.

    December 8, 2013

    जीवन पर्यंत हम इसी बात पर लड़ते है कि जीसस क्या बोले? और उपनिषद क्या बोलाय़ या गिद्ध क्या बोलाय़………………………….इससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है कि हम क्या बोले और क्या कर रहे हैं ………….हम सत्य है बाकि सब झूठ ………………..पर सत्य को झूठ के आवरण मे ढककर जीने की आदत हो गयी है हमारी, खुद को भ्रम में रखने की आदत हो गयी है हमारी, खुद की होने और न होने की गलतफहमी हो गयी है हमारी…………….

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 9, 2013

    “भोग भी सामर्थ्य के अनुसार होता है,किसी की प्रधानमत्री,मंत्री,सांसद या विधायक बनने,की इच्छा है,जबकि वो एक सामान्य आदमी है तो वो कैसे भोग कर सकता है.”, भोग का अर्थ होता है बिना किसी चुनाव के जीवन को अंगीकार करना, अभी इस क्षण जो उपलब्ध है उसको पूरा पूरा जीना…आप जिसका भी भोग करते हैं उसका त्याग अपने आप हो जाता है, त्याग करना नहीं पड़ता…पका फल आप ही गिर जाता है, कच्चे को तोड़ने पड़ता है… मंजिल कुछ भी हो कोई फ़र्क नहीं पड़ता, भोगी के लिए हर क़दम मजिल है…”Every step is enough unto itself” मंजिल कितनी भी बड़ी क्यों न हो लेकिन हम एक बार में एक ही क़दम उठा सकते हैं, इसीलिए अगर कोई ठीक से चले, होश के साथ एक एक क़दम उठाए तो प्रधानमंत्री की यात्रा परमात्मा की यात्रा हो सकती है…!!! नहीं जीसस दान की नहीं ध्यान में ख़ुद को मिटाने की बात कर रहे हैं…’सब्बा दानं, धम्मा दानं” चीजों का भोग नहीं होता है, चीज़ें महत्वपूर्ण नहीं है, क्या करते है से ज्यादा महत्वपूर्ण है कैसे करते हैं…’ कज़जोर लोग त्याग करते हैं…और डर कर भाग जाते हैं…

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 9, 2013

    The moment you fall in love with somebody, you start expressing yourself through him or her…in love we expend, so here I am or we are not talking about Buddha, Jesus or Mahavira, we are expressing ourselves via ‘other’. ‘In deep love buddha and you are not different’..!!’ “तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नहीं होता”

    December 12, 2013

    मियाँ, यह क्या कह रहे हैं………………….?“तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नहीं होता” यह तो पक्षपात हो गया……………

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 12, 2013

    कुरबतों में भी जुदाई के ज़माने मांगे, दिल वो बे-मेहर कि रोने के बहाने मांगे

sadguruji के द्वारा
December 7, 2013

सूफी जी,आप का लेख पढ़ा,सोचा चुचाप चले जाऊँ,लेकिन अपने विचार लिख के जा रहा हूँ.आप का लेख मुझे बहत उबाऊ लगा.आप ने एक जगह लिखा है- “एक लड़की के जाने के बाद मैं बड़ी सहजता से दूसरी लड़की के प्रेम में पड़ जाता हूँ.”आपके भीतर कहीं असुरक्षा की भावना है,जो आप को परेशान किये रहती है और उसे आप लड़कियों में,सिगरेट में,शराब में ढूंढते हैं.स्त्री पुरुष के बीच की जो भेद दृष्टि है,वो आप की सभी समस्याओं की जड़ है.मुझे बहुत अफ़सोस हुआ जब नीचे आपने लिखा-”कैसे मैं उमर खैयामिक (lover ऑफ़ वाइन, वुमन एंड म्यूजिक) बना.”क्या सूफियों या ज्ञानियों के जीवन का यही सार है ?

    December 7, 2013

    राजेन्द्र जी……………..मेरे विचार से यह आवारा और बेवड़ों का काम है……….आपके विचार में क्या हो सकता है……………..

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 7, 2013

    सूफियों और ज्ञानियों का तो मुझे नहीं पता लेकिन अपनी कहूं तो यही कहूंगा…..”"अपना तो आशिकी का किस्सा-ए-मुख्तसर है, हम जा मिले खुदा से दिलबर बदल-बदल कर।” और ये मेरे लिए ही नहीं सब के लिए सच है, जब ख़ुदा जिसको मिला है दीवानगी से मिला है, “आशिकी से मिलता है ये जाहिद, बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता”

    sadguruji के द्वारा
    December 7, 2013

    अनिल जी,मै चाहता हूँ कि इस मंच पर एक स्वस्थ वैचारिक आंदोलन चले-ईश्वर है और ईश्वर नहीं है के बीच.बुद्ध के एक वचन से मै बहुत प्रभावित हूँ.बुद्ध कहते हैं कि जो कहता है-ईश्वर है,उसे भी खोज करना चाहिए और जो कहता है कि ईश्वर नहीं है,उसे भी खोज करना चाहिए.और ये खोज सत् जरी रहना चाहिए,जब तक कि सत्य की अनुभूति न हो जाये.यही वजह है कि आप के कमेंट के ठीक विपरीत मै कमेंट करता हूँ.मेरा आशय समझ जाइयेगा और बुरा मत फील कीजियेगा.

    sadguruji के द्वारा
    December 7, 2013

    अनिल जी,आपने पूछा है-मेरे विचार से यह आवारा और बेवड़ों का काम है……….आपके विचार में क्या हो सकता है……………..सूफी जी ने कहा है-”अपना तो आशिकी का किस्सा-ए-मुख्तसर है, हम जा मिले खुदा से दिलबर बदल-बदल कर।” और ये मेरे लिए ही नहीं सब के लिए सच है, जब ख़ुदा जिसको मिला है दीवानगी से मिला है, “आशिकी से मिलता है ये जाहिद, बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता”मेरा विचार आप ने पूछा है तो मुझे लगता है कि ये सब साधन है और खतरनाक साधन है.इसमें उलझ-पुलझ के आदमी अपना कीमती समय बर्बाद भी कर सकता है.वाइन, वुमन एंड म्यूजिक आप कि हालत ऐसी कर सकते हैं कि-आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास.जाना था पूरब पहुँच गये पश्चिम.इस मार्ग से कोई विरला ही चलकर मंजिल तक पहुंचा होगा.हो सकता है कि कोई अपवाद हो.

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 7, 2013

    जिसको खोया ही नहीं उसे खोजेंगे कैसे…बुद्ध ने ज़रूर मज़ाक किया होगा….और जब बुद्ध अन्ता की बात करते हैं तो मैं नहीं मानता कि उन्होंने ईश्वर खोज की बात की होगी, अगर की भी होगी तो बोधि से पहले… झेन कहता है ‘be still and know’ फिर खोने और पाने की बात कहाँ से आ गयी….??? कृपया आप बुद्धों के मज़ाक को गम्भीरता से न लें…बड़ी भूल हो जाएगी अन्य्था…!!!

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 7, 2013

    जीसस कहते हैं “जो बचाएगा उसके पास जो भी है छीन लिया जाएगा, और जो नहीं बचाएगा उसे और दिया जाएगा ” उपनिषद का बचन है ‘तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा’ जिसने भोगा उसी ने त्यागा….जिससे मुक्त होना है उसे भोगना ही होगा…वाइन वुमन और म्यूजिक बड़ा महत्वपूर्ण है इसके esotaric अर्थ है, ‘वाइन मतलब तंत्र, वुमन मतलब भक्ति और म्यूजिक मतलब सूफीवाद…’ “महोत्सिव तस्वीह के दानो पर ये गिनता रहा, किस ने पी किस ने न पी, किस किस के आगे जाम थी” और आप के लिए एक ख़ास बात, “ऐ वईज़-ए-नादां तू ने ये सोचा कभी, जिंदगी ख़ुद एक इबादत है गर होश रहे”

    sadguruji के द्वारा
    December 7, 2013

    शुभ प्रभात सूफी जी.प्रातः: ५.०३ मिनट.‘वाइन मतलब तंत्र, वुमन मतलब भक्ति और म्यूजिक मतलब सूफीवाद…’कृपया इसे और स्पष्ट करने के लिए एक लेख लिखें.आप ने होश में रहने की बात कि है तो मै आप को बता दूँ कि मै सबसे ज्यादा स्वयं को तटस्थ होकर साक्षी भाव से देखता हूँ.जहाँ पर गड़बड़ होती है,उसे ठीक भी करता हूँ.

    December 8, 2013

    जब हम खुद को साक्षी होकर देखने लगेंगे तो सवाल और जवाब दोनों ही ख़त्म हो जायेंगे……………जहाँ तक मैं समझता हूँ आप अभी खुद के साक्षी नहीं हुए हैं……………

    December 8, 2013

    आपको क्या लगता है कि मैं बुरा मानता हूँ नहीं बिलकुल नहीं क्योंकि मैं अच्छा और बुराई से परे हूँ. अब आप जानना चाहेंगे कि फिर मैं इतना-अनाप सनाप क्यों बोलता रहता हूँ? कारण हम दुनिया से खुद को छुपाने के लिए भले ही कोई भी आवरण लगा ले परन्तु जब खुद के साक्षी होंगे तो यह खुद से नहीं छुपा पाएंगे. मैं जो कुछ दूसरों को कहता हूँ अप्रत्यक्ष रूप से अनिल कुमार “अलीन” को कहता हूँ जितना दुसरे तिलमिलाते है मेरी बातों से उससे कहीं ज्यादा अनिल कुमार “अलीन” तिलमिलाता है. क्योंकि वह समझता है कि मैं उसे जानता ही नहीं बल्कि मैं तो उसके नश-नश से वाकिफ हूँ और मुझे देखकर अक्सर भागने की कोशिश करता है मगर अफ़सोस दुसरे तो भागने में कामयाब हो जाते हैं पर यह मुझसे कैसे भागेगा? मैं तो दूसरों के बारे में बहुत कम जान पाता हूँ क्योंकि वो तो किसी न किसी तरह भाग जाते हैं और बेटा अनिल कुमार “अलीन” मेरी पकड़ में आ जाते हैं. अतः जोर-जोर से हँसने लगता हूँ कि अनिल कुमार अलीन से गन्दा, अहंकारी, मुर्ख तो कोई है ही नहीं. इस प्रकार खुद के अच्छे होने की गलतफहमी दूर करता हूँ……………………………. हाँ………………हाँ

    December 8, 2013

    क्या बुद्ध कहे, क्या कृष्ण कहे, क्या क्या राजेंद्र कहे और क्या अनिल कहे……………………उससे मेरा कोई मतलब नहीं……………! क्योंकि यह चारो ही मेरे लिए झूठ है? या एक भ्रम है जो मैं पैदा किया हूँ खुद के होने या न होने का……………………सत्य यह कि सिर्फ मैं ही हूँ……………ईश्वर का होना और न होना, दोनों पर ही बात करने का मतलब है खुद को धोखा देना, भ्रमित करना, ………………………………………………………..और सबसे बड़ा भ्रम है अनिल कुमार ‘अलीन” के होने का. वो समझता है कि वो है जबकि मैं उसे बहुत बार कोशिश कर लिया बताने कि उसका कोई अस्तित्व नहीं सिवाय मेरे. सिर्फ मैं ही हूँ ………………….देखिये कबतक यकीं होता है इस मुर्ख को………………….

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 9, 2013

    “मै सबसे ज्यादा स्वयं को तटस्थ होकर साक्षी भाव से देखता हूँ.जहाँ पर गड़बड़ होती है,उसे ठीक भी करता हूँ.” – आप गलत ठंग से साधना कर रहे हैं….कहीं भारी भूल हो रही है आपसे…आपने वक्तव्य से साफ़ पता चलता है कि आपने कभी ध्यान नहीं किया है…!! थोडा जटिल है लेकिन समझने की कोशिश करें…’साक्षी मतलब- Choiceless Awareness- चुनाव रहित होश, आप निर्णायक नहीं बनते हैं कि ‘ये ठीक है या ये गलत है’ आप बस जो है उसके प्रति साक्षी होते हैं…फिर कुछ और नहीं करना पड़ता है, “जहाँ पर गड़बड़ होती है,उसे ठीक भी करता हूँ” अगर ऐसा करना पड़ रहा है तो गाँठ बाँध ले आपको ध्यान नहीं लग रहा है…’होश के जागते ही बहुत सी चीज़ें अपने आप तिरोहित हो जाती हैं…कुछ करना नहीं पड़ता है, विचारों का विश्लेषण ध्यान नहीं है…’ये सही विचार है और ये गलत विचार है’ इसका निर्णय ध्यानी कभी नहीं करता है…’ये ठीक ये खराब’ इसका निर्णय पंडितों का काम है…ध्यानी का नहीं है…’ ||

    December 12, 2013

    हाँ………………..हाँ……………………………….

sinsera के द्वारा
December 6, 2013

हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनून की तलब, गिरह में ले के गिरेबान का तार तार चले…… मक़ाम ‘फ़ैज़’ कोई राह में जँचा ही नहीं, जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले………… पहली बात तो ये कि लड़कियों का ज़िक्र यूँ न निकालिये, क्या पता कुछ की शादी वादी हो चुकी हो…खामखा बात बिगड़े गी…..दूसरे ये कि….तुम लौट आने की बात करते हो, मुझे तो अब भी यकीन नही उसके जाने का……

    December 7, 2013

    हाँ………………..हाँ…………………..मियाँ…………….आजकल देख रहा हूँ आपके दिन बहुत ख़राब चल रहे हैं……………..जी आ रहा दो-चार फटकार लागाकर चला जा रहा है………….हाँ……….हाँ…………

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 7, 2013

    “तुम मेरे पास होते हो गोया, जब कोई दूसरा नहीं होता” ….यहाँ मैं उन लड़कियों की चर्चा कर ही नहीं जिनकी शादी हो गई होगी, मैंने तो सिर्फ उन लड़कियों के बारे में लिखा है जो मेरे से मिलने से पहले से शादी शुदा थी…”अपने घर में आग लगा कर मेरे साथ आईं थी” क्योंकि मैंने कह दिया, “सूफ़ी खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ, जो घर जारे आपना आए मेरे साथ”

    December 8, 2013

    कम्बख्त कुछ ऐसी डगर है इश्क की………………………..जो सीधी नहीं जाती…………………ऊपर से यह इलज़ाम भी है………….जाने कैसे-कैसे लोग, जाने कहाँ कहाँ, और किस तरह मिल जाते हैं………………………छीं……………छीं……………….

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 13, 2013

    दफ्तर में भी गुम-सुम रहना, शाम से तनहा हो जाना, हँसते हँसते जाम उठाना, फिर संजीदा हो जाना, कितने मौसम बीत गए यह झील न सूखी आंखों की, कतरा-ए-गम का बढ़ते बढ़ते आग का दरया हो जाना

December 6, 2013

एक बार फिर उसी दहलीज पर जिंदगी लायी, जहाँ से मायूस होकर लौट आये थे कभी, खोने को यहाँ, क्या-क्या नहीं खोया अलीन, फिर भी लगता है, कुछ बाकी है अभी………………….अनिल कुमार “अलीन”

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 6, 2013

    “ले चला है दिल कूचा-ए-जाना की तरफ, लाख चाहा था कि न जायेंगे, मगर जाते हैं”

    December 7, 2013

    हम देख रहे हैं…………………….आपके पास और कोई चारा ही नहीं नहीं है…………..सिवाय भैंस को चारा देने के……………हाँ…………….हाँ…………………….दिल में हैं ललक जाने की तो जायेंगे ही आप, यह किसी और को सुनाइए न जाने की, यहाँ तो हर सुख पत्ता उड़ जाता है हवा के साथ, गलत फहम है उसकी शाखा से जुदा होने की…………………..अनिल कुमार अलीन

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 7, 2013

    भैंस तो भाई रज़ाक मियां के पास था, क्या दुलारी भैंस थी वो…मगर अफ़सोस दुल्लन के पारे के साथ भाग गयी…!

    December 12, 2013

    क्या कह रहे हो मियां……………दुल्लन के पाडे साथ……..यह तो बड़ी बेइज्जती हुई ……………….वो तो बड़ा ही आवारा था…………….

December 5, 2013

khoobsurat bhavnatmak abhivyakti .

    Sufi Dhyan Muhammad के द्वारा
    December 6, 2013

    शुक्रिया…!!!

    December 7, 2013

    हाँ………….हाँ…………………यह खूबसूरत अभिव्यक्ति है ……………..तो फिर अभिव्यक्ति को क्या कहेंगे…………….


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