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Sufi Dhyan Muhammad


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स्पिरिचुअल शॉपिंग

Posted On: 4 Nov, 2014  
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लिखने से दर्द को तसल्ली मिलती है

Posted On: 19 May, 2014  
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‘तलाश’

Posted On: 17 May, 2014  
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‘तुम कौन हो…??’

Posted On: 17 May, 2014  
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अपनी बख्शीश वापिस ले जाए…

Posted On: 5 Apr, 2014  
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आदिवासी हो जाना चाहता हूँ..

Posted On: 4 Apr, 2014  
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आई ऍम नथिंग बट ‘ब्लडी सैड्नस’

Posted On: 3 Apr, 2014  
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‘तेरे आने की….’2(अंतिम)

Posted On: 8 Feb, 2014  
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‘तेरे आने की जब…..’

Posted On: 8 Feb, 2014  
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उंगलियां आज भी….2 (अंतिम)

Posted On: 3 Feb, 2014  
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ग़रीबी ने किया कड़का, नहीं तो चाँद पर जाता, तुम्हारी माँग भरने को सितारे तोड़कर लाता..... बहा डाले तुम्हारी याद में आँसू कई गैलन, अगर तुम फ़ोन न करतीं यहाँ सैलाब आ जाता..... तुम्हारे नाम की चिट्ठी तुम्हारे बाप ने खोली, उसे उर्दू जो आती तो मुझे कच्चा चबा जाता..... तुम्हारी बेवफाई से बना हूँ टाप का शायर, तुम्हारे इश्क में फँसता तो सीधे आगरा जाता..... ये गहरे शे’र तो दो वक़्त की रोटी नहीं देते, अगर न हास्य रस लिखता तो हरदम घास ही खाता..... हमारे चुटकुले सुनकर वहाँ मज़दूर रोते थे, कि जिसका पेट खाली हो कभी भी हँस नहीं पाता... मुहब्बत के सफर में मैं हमेशा ही रहा वेटिंग, किसी का साथ मिलता तो टिकट कन्फर्म हो जाता..... कि उसके प्यार का लफड़ा वहाँ पकड़ा गया वर्ना, नहीं तो यार ये क्लिंटन हज़ारों मोनिका लाता.....

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

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पच्छिम में महान विचारक और संत Alan Wilson Watts उसके आखिरी दिनों में उसके एक मित्र ने पूछा, "तुम बुद्ध के भक्त हो, उनकी देशनाओं का पालन करते हो...उनको गुनते हो...फिर मुझे समझ नहीं आता, 'तुम शराब क्यों पीते हो', अगर बुद्ध तुम को शराब पीते हुए देखते और ये सवाल पूछेंते तो तुम क्या जवाब देते..." Watts हंसने लगा उसने कहा, "बुद्ध मुझसे कभी ये सवाल नहीं पूछेंगे...क्योंकि I always drink in an enlightened way (मैं हमेशा बुद्ध की तरह शराब पीता हूँ)........ ये सवाल ही पैदा नहीं होता कि हम क्या करते हैं, हम कैसे करते हैं...ये ज्यादा महत्वपूर्ण है, दूसरी बात... क्या सुखों पर सिर्फ़ पापियों का ही हक़ है...?? ख़लील जिब्ररान से किसी ने उसके सिगरेट पीने की आदत के बारे में पूछा, तो उसने कहा सिगरेट पीना मेरा आनंद है आदत नहीं.... विवेकानंद ने भी ठीक यही जवाब दिया था... जीसस शराब पीते थे... हर्मन हेस का सिद्धार्थ वेश्या के संग रहता था और शराब और धूम्रपान का सेवन करता था... रामकृष्ण परमहंस मांस खाते थे...और जब तंत्र की साधना कर रहे थे तो शराब पीते थे... सिगरेट पीने के साथ-साथ जिब्रान औरतखोर भी था.... सुकरात समलैंगिक था... कहने का ये मतलब है कि कृत्य को कसौटी बना कर संतत्व को कभी नहीं परखा जा सकता है... हमारी सोच संक्रीर्ण हो गयी है... हम रुग्ण, मंदबुद्धि, डरपोक और गोबर गणेश लोगों को संत और ज्ञानी मानते हैं.... सोचने वाली बात ये है कि जो अंगूरी शराब को पीने से डरता हो और परमात्मा रुपी शराब (शराबे-तहूरा) को क्या पी पायेगा....?? परमात्मा परम नशा है.... जो संभोग से डरता है वो क्या समाधि कहां जान पाएगा.... समाधि परम संभोग है.... जो परमात्मा की बनाई कृति से प्रेम नहीं कर सकता है वो परमात्मा से क्या प्रेम करेगा.... औरत इस अस्तित्व की श्रेष्टतम अभिव्यक्ति है....| (कोई शराब पी कर बर्बाद नहीं होता है, न ही कोई शराब पी कर बहकता है... बहके हुए लोग पानी भी लें तो बहक जाते हैं...शराब या शराब जैसी मादक पदार्थ उसी को बहार लाता है, जो पहले से हमारे अंदर दबा पड़ा होता है....) मेरे पास गद्दा होना सिर्फ एक संयोग था...अगर किसी के पास भी गद्दा होता तो मैं ही उस पर सोता...अगले दिन जब डायरेक्टर अपने लिए गद्दा और तकिया ले कर आया, मेरे पास तकिया नहीं था...मैंने उसकी तकिया ले लिया और वो बिना तकिये के सोया.... प्रेम का सूक्ष्म धागा जो हमें एक दुसरे से जोड़ता है हम इसको बहार से नहीं देख सकते हैं.... दर्शक बन कर इसको समझना मुश्किल है... अभी whatsapp पर मैंने एक pic लगाई है वो pic एक ख़त की फोटो है जिसमे मेरी शरीक-ए-हयात ने मुझे गाली लिख कर दिया था, कोई बहार से देखे और सिर्फ शब्दों को ही समझे, तो वो बोलेगा ‘ये लड़की इससे नफरत करती है’, बजाहिर वो मुझे दिन भर गाली देती रहती है क्या कुछ नहीं बोलती है मुझे, जब खुश होती है तो बोलती है, “I hate you, I don’t like you.” जबकि हक़ीकत ठीक इसके ल्टा होता है | अगर सूरज दिखाई न दे तो अपनी आंख पर शक करना चाहिए न कि सूरज पर... जीवन तर्कातीक है... इसिलए लिए यहाँ बुद्धि की बात चाहे लाख ठीक लगे...लेकिन करना हमेशा भरोसा हृदय पर ही चाहिए..... “क्या शैख़ मिलेगा गुलाफ़िशानी करके, क्या पायेगा तौहीन-जवानी करके, तू आतिशे-दोज़ख़ से डराता है उन्हें, जो आग को पी जाते हैं पानी करके”

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

मेरे भाई, जो लोग ही प्रिय नहीं हैं उनके बीच लोकप्रिय होने का क्या अर्थ...??? जिनको मैं प्रिय नहीं मानता अगर वो मुझे अपना प्रिय भी मानते हों तो मुझे इससे कोई ख़ास प्रफुल्ता नहीं होती है... मैं लेख दूसरों को ध्यान में रख कर नहीं लिखता हूँ, मेरी कोई भी कृति ऑब्जेक्टिव आर्ट नहीं है, सब सब्जेक्टिव है...अंग्रेजी में एक टर्म यूज़ होता है, "थिंक अलाउड'', इसका अर्थ होता है हम जो भी कहते हैं खुद के लिए कहते हैं...ये सब लेख मेरी डायरी के पन्ने हैं...आमतौर पर लोग अपनी डायरी को दूसरों से छुपा कर रखते हैं...उनको लगता है दूसरा पढ़ लेगा तो उसके राज़ को जान जाइयेगा...उसकी छवि खराब हो जायगी..वगैरह-वगैरह... लेकिन मामला मेरे साथ थोडा भिन्न है...मुझे दूसरों की फिकिर ही नहीं है...मेरे राज़ ऐसे हैं कि अगर कोई जान भी ले तो उसको जान नहीं पायेगा...ऐसा गोरख धंधा है कि दूसरा कभी न तो जान सकता है न ही समझ सकता है इसीलिए मुझे उनसे ज़रा भी डर नहीं लगता...इसीलिए कुछ भी लिख देता हूँ...मुझे याद है 02 Oct, 2010 मेरे पिछले रुत की साथी (गर्ल फ्रेंड) मुझसे बोली, "मैं खुद को लोगों की पहुच से दूर रखती हूँ'', उसकी बात सुन कर मैं ज़ोर से हंसने लगा, तो बोली तुम हँसे क्यों, मैं ने कहा, 'शयद तुम ये सोचती हो कि दूसरा तुम तक पहुँच सकता है...लगता है तुम्हे अपना पता नहीं है क्योंकि जैसे ही तुम्हे अपनी थोड़ी भी खबर मिलेगी, ये साफ़ होने लगेगा कि दूसरा तुम तक पहुँच ही नहीं सकता है, मनुष्य न तो 'अननोन' है न ही 'नोन' है, मनुष्य 'अन्नोअबल' है अगेय है...!! जीवन ऐसा रहस्य है, इसको जितना जानोगे ये उतना रहस्यपूर्ण होता चला जाएगा" मेरे मन मंदिर का द्वार सब के लिए खुला है, कोई भी आ जा सकता है, जो चीज़ तुम जान सकते हो वो मेरे छुपाने के वावजूद भी जान लोगे ही, इसीलिए उनको छुपाने का कोई सार नहीं है...जो चीज़ छुपी हुई है वो ऐसी है जिसको जान के भी नहीं जाना जा सकता है, इसिलए डर का कोई सवाल नहीं है... ||| मैं लेख खुद पर हंसने के लिए लिखता हूँ...!! I am self-obsessed..!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

"Life is more fictitious than any fiction." बढ़ा चढ़ा कर नहीं लिखा गया है...!! अतिश्योक्ति कहानियों में होती है, जीवन में नहीं, जीवन जितना है उतना ही कहना मुश्किल है, अतिश्योक्ति का तो सवाल ही पैदा नहीं होता... अगर मैं ये कहूं कि "जो चीज़ इकहरी थी वो दोहरी निकली, सुलझी हुई जो बात थी उलझी निकली, सीपी तोड़ी तो उससे मोती निकला, मोती तोडा तो उसमें सीपी निकला, मिक़राज़ (कैंची) ख़ुद अपने को कतर जाती है, जम जाती है लौ, आग ठिठुर जाती है, जितना भी उभारती है जिस चीज़ को अक्ल, उतना ही वे ग़ार में उतर जाती है” भाई ये सब जीवन में होता है, जीवन चमत्कारों का चमत्कार है... यहाँ कुछ बढ़ा चढ़ा कर कहने की ज़रुरत नहीं है जितना है अगर उतना ही कह पाओ तो अपने को धन्यभागी समझो....मेरे दोस्त ने जब इस लेख को पढ़ा तो उसने कहा बहुत सी बातें तो तुमने छोड़ ही दिया....और ये सच भी है मैंने सब को कम-कम करके लिखा है....तुम इतने को ही अविश्वसनीय कहते हो...क्या होगा जब कोई कबीर ये कहेगा कि, "एक अचम्भा मैं ने देखा नदिया लागी आग..." जब नदी में आग लगा देखोगे तो क्या कहोगे....मच्छली जब पेड़ पर चढ़ेगी तो फिर क्या कहोगे.....अक्ल में आग लगा कर पढ़ो और जीवन को देखो....!! बुद्ध ने कहा, 'समंदर में भी उतना पानी नहीं है, जितना दुखियो नेआंसू बहाया है' तुम्हे क्या लगता है ये अतिश्योक्ति है...??? बुद्ध की छोडो जब तुम कहते हो, 'मैं उस लड़की के बिना जी नहीं सकता'... क्या ये अतिश्योक्ति है...??? बुद्धि के पकड़ में जीवन नहीं आती है, इसीलिए तो हम दूसरों के सुख- दुःख समझ नहीं पाते हैं, मीरा कहती है, 'विरहिन के दुःख को एक विरहिन ही समझ सकती है', जीवन गणित नहीं है महाकाव्य है...इसे तर्क की कसौटी पर मत कसो...!!!! संशय जीवन को छोटा कर देगा...चमत्कारों में भरोसा करना सीखो...!!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

के द्वारा: sinsera sinsera

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

"लेखक को जानबूझकर मानसिक रूप से टार्चर करना क्या बचकानी हरकत नहीं है" पहली बात सोनम मेरी वजह से मंच नहीं छोड़ रही है, न ही मुझसे नाराज है... आपका मुझसे ये सवाल करना मुझे समझ में नहीं आया... दूसरी बात आप सोनम की चिंता न करें...वो न तो नाराज़ है न ही मंच छोड़ रही...वो इन सब को लेकर ज़रा भी गम्भीर नहीं है...गम्भीर होने कि बीमारी आपको लगी हुई है...आपके सिवाय सब प्रसन्न है यहाँ...आपका घर फूस-मिटटी का है सो आप बारिश से डर रहे हैं..., जिनके माकन पक्के होते हैं वो बारिशों से नहीं डरा करते हैं..." कुछ दिन बीच कर के सोनम ऐसा नाटक करती रहती है...दो चार दिन में ठीक हो जाएगी...कोई नई बात नहीं है....लेखक के साथ ये सब होता रहता है...दो साल से उसे इस मंच पर देख रहा हूँ मैं...कई बार मेरे खिलाफ भी लेख लिखी है वो...कि 'अब लिखना छोड़ दूंगी'... आपको स्त्रियों के मनोविज्ञान का ज़रा भी पता नहीं है...इसीलिए आप बीच में मत पड़िये....!!! "दूसरे ब्लॉगरों की लिखने की स्वतंत्रता में दखल देना बचकानी हरकत नहीं है" जी दखल देना तो बचकानी नहीं है लेकिन इस तरह का सवाल पूछना ज़रूर बचकानी है...अगर आपको लिखने की स्वतन्त्रा चाहिए तो दूसरे को भी प्रतिक्रिया व्यक्त करने की स्व्तंत्रता चाहिए...'मेरे लेख पर लोगों ने मुझे गाली दी है, मेरे विचारों का विरोध किया, मैं तो कभी व्यथित नहीं होता...! लोगों ने जमात बना कर मेरा विरोध किया है मैं क्यों नहीं चिल्ल-पों मचता हूँ....?? मैं भी तो लेखक हूँ...??? आज दो साल से जेजे पर लिख रहा हूँ, कोई कहे कि मैं कभी भी जेजे के फीड-बेक पर गया हूँ...?? आज तक मैंने फीड-बेक पर कुछ नहीं लिखा है....आज पीछले पांच लेख से मेरा लेख फीचर्ड नहीं हो रहा कहाँ मैं गुहार लगाने के लिए गया...कि आप क्यों मेरा लेख फीचर्ड नहीं कर रहे हैं....| मुझे पता है कि अगर मैं कुछ कहता हूँ, कुछ लिखता हूँ तो उसका प्रतिक्रिया भी होगा...कुछ परिणाम आएगा.....!! '

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

मुनिवर, आपका सवाल बेबुनियाद और अजीब है- मैंने तो कभी नहीं कहा कि मैं साक्षी की साधना करता हूँ या साक्षी भाव में रहता हूँ... मेरा किसी चीज़ को लेकर कोई दावा नहीं है... और आपने मुझे क्या मान लिया है और क्या समझा है ये आपका व्यक्तिगत मामला है 'मैं आपके व्यक्तिगत समझ से जुडी किसी भी सवाल का जवाब नहीं दे सकता हूँ..' लोग अक्सर मुझ से कहते हैं, 'मैं तो सोचता था तुम ऐसे हो, लेकिन तुम तो ऐसे हो' - अब कौन क्या सोच के बैठा है मेरे बारे में उससे मुझे क्या लेना देना...??? "ब्रह्ज्ञान की ऊँची से ऊँची बाते करते " मुझे किसी भी प्रकार की बात-चीत से कोई परहेज नहीं है...न कोई बात ऊँची है न नीची- ब्रह्म चर्चा हो या सेक्स की चर्चा हो, या राजनीती की चर्चा मैं सब के साथ सजह हूँ, जब जैसे लोग मिल जाते हैं उनसे वैसी बात कर लेता हूँ -- अगर आप मुझे ठीक से समझें तो मैं चरित्र-हीन हूँ, मेरा कोई चरित्र नहीं है- अपने ज़रूर कोई धारणा बना ली होगी मेरे बारे में जिससे कठनाई आ रही है, संदेह पैदा हो रही है...लेकिन मैं पूछता हूँ आपको धारणा बनाने के लिए बोला किसने था...??? अपने मंतव्यों को मुझ पर आरोपित कर रहे हैं... अपनी समझ की खिड़की से मुझे देख रहे हैं, और फिर पूछते हैं 'आप मुझे ऐसे क्यों दिख रहे हैं..', मुनिवर आपका सवाल बचकाना है, ये ऐसे है जैसे हरा चश्मा लगा कर कोई पूछे कि मुझे सब हरा क्यों दीखता है...हद है..!!! जीसस का प्रसिद्ध वचन है, 'Judge not, that ye be not judged.' आपको कहा किसने मेरा निर्णायक बनने के लिए....??? किसी के मर्ज़ी के मुताबिक नज़र आने का मैंने ठेका नहीं ले रखा है...!! "जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी", अंत मैं कुछ बातों को दोहरा दूं...'मैंने किसी के भी उम्मीद पर खड़ा उतरने का कोई ठेका नहीं ले रखा है', 'I love freedom. मैं कभी किसी से नहीं कहता कि 'मैं तो ये सोचता था तुम्हारे बारे में लेकिन तुम तो ऐसे निकले' इस तरह की घटिया, राजनितिक और घिनौना सवाल मैं कभी नहीं पूछता....!! धर्म नितांत रूप से व्यक्तिगत मामला है, किसके भीतर से परमात्मा किस रूप में प्रगट होता है कोई नहीं जानता है, मुनिवर सत्य के आदर्शों को बदलना सीखिए...आदर्शों के लिए सत्य को बदलना मूर्खता होगी...अगर मैं आपकी साक्षी की परिभाषा में फिट नहीं बैठता हूँ तो अपनी परिभाषा को बदल दीजिए...आपके ज्ञान की किताब में कुछ भूल-चूक हो गयी होगी...सुधर कर लीजिए...मैं चुनाव रहित जीवन जीता हूँ, all is included in my life.

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

सूफी जी,एक सवाल मेरा आप से और अनिल जी दोनों से है.मुझे संदेह है कि आप लोग साक्षी भाव में रहते हैं.मै अगर कुछ देर के लिए मान भी लूँ कि आप लोग साक्षी भाव में रहते हैं तो य़े बताइये कि चाहे सोनम जी का विषय हो या अन्य किसी ब्लॉगर का,आप लोग जो शोर शराबा करते हैं,उसमे गुस्सा,प्रतिशोध की भावना,धमकी देना और अनर्गल किसी का मजाक उड़ाना सब दिखाई देता है.उस समय आप लोगों कि स्थिति एक ख़राब से ख़राब व्यक्ति से भी ज्यादा गई गुजरी नज़र आती है.मै देखता हूँ कि आप लोग बुराई में पूरी तरह से लिप्त होकर के और बाकायदा ब्लॉगर के पीछे पड़कर उसे परेशान करते हैं और उसकी निंदा करते हैं और बाद में गहरा मजाक कहकर भाग लेते हैं.आप लोग ब्रह्ज्ञान की ऊँची से ऊँची बाते करते हैं,लेकिन उसपर स्वयं ही अमल नहीं करते हैं.आप लोगों के व्यक्तित्व में दोहरापन है-अपने लिए आप लोगो के नियम और हैं और दूसरों के लिए और.जो कड़वी बात आप लोग कहते हैं और कहकर खुश होते हैं,वही कड़वी बात कोई आप लोगों को कह दे तो आप लोग नाराज हो जाते हैं.मुझे तो सब ढोंग पाखंड नज़र आता है.अपनी सुविधा के लिए ज्ञानी होना अलग बात है और समाज के लिए ज्ञानी होना अलग बात है.आप लोग अपने ज्ञान का उपयोग अपनी सुविधा और अपनी बौद्धिक कसरत के लिए करते हैं.ये आप लोगों के साक्षी भाव को संदेहास्पद और हास्यास्पद बना देता है.6s8a

के द्वारा: sadguruji sadguruji

"मै सबसे ज्यादा स्वयं को तटस्थ होकर साक्षी भाव से देखता हूँ.जहाँ पर गड़बड़ होती है,उसे ठीक भी करता हूँ." - आप गलत ठंग से साधना कर रहे हैं....कहीं भारी भूल हो रही है आपसे...आपने वक्तव्य से साफ़ पता चलता है कि आपने कभी ध्यान नहीं किया है...!! थोडा जटिल है लेकिन समझने की कोशिश करें...'साक्षी मतलब- Choiceless Awareness- चुनाव रहित होश, आप निर्णायक नहीं बनते हैं कि 'ये ठीक है या ये गलत है' आप बस जो है उसके प्रति साक्षी होते हैं...फिर कुछ और नहीं करना पड़ता है, "जहाँ पर गड़बड़ होती है,उसे ठीक भी करता हूँ" अगर ऐसा करना पड़ रहा है तो गाँठ बाँध ले आपको ध्यान नहीं लग रहा है...'होश के जागते ही बहुत सी चीज़ें अपने आप तिरोहित हो जाती हैं...कुछ करना नहीं पड़ता है, विचारों का विश्लेषण ध्यान नहीं है...'ये सही विचार है और ये गलत विचार है' इसका निर्णय ध्यानी कभी नहीं करता है...'ये ठीक ये खराब' इसका निर्णय पंडितों का काम है...ध्यानी का नहीं है...' ||

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

"भोग भी सामर्थ्य के अनुसार होता है,किसी की प्रधानमत्री,मंत्री,सांसद या विधायक बनने,की इच्छा है,जबकि वो एक सामान्य आदमी है तो वो कैसे भोग कर सकता है.", भोग का अर्थ होता है बिना किसी चुनाव के जीवन को अंगीकार करना, अभी इस क्षण जो उपलब्ध है उसको पूरा पूरा जीना...आप जिसका भी भोग करते हैं उसका त्याग अपने आप हो जाता है, त्याग करना नहीं पड़ता...पका फल आप ही गिर जाता है, कच्चे को तोड़ने पड़ता है... मंजिल कुछ भी हो कोई फ़र्क नहीं पड़ता, भोगी के लिए हर क़दम मजिल है..."Every step is enough unto itself" मंजिल कितनी भी बड़ी क्यों न हो लेकिन हम एक बार में एक ही क़दम उठा सकते हैं, इसीलिए अगर कोई ठीक से चले, होश के साथ एक एक क़दम उठाए तो प्रधानमंत्री की यात्रा परमात्मा की यात्रा हो सकती है...!!! नहीं जीसस दान की नहीं ध्यान में ख़ुद को मिटाने की बात कर रहे हैं...'सब्बा दानं, धम्मा दानं" चीजों का भोग नहीं होता है, चीज़ें महत्वपूर्ण नहीं है, क्या करते है से ज्यादा महत्वपूर्ण है कैसे करते हैं...' कज़जोर लोग त्याग करते हैं...और डर कर भाग जाते हैं...

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आपको क्या लगता है कि मैं बुरा मानता हूँ नहीं बिलकुल नहीं क्योंकि मैं अच्छा और बुराई से परे हूँ. अब आप जानना चाहेंगे कि फिर मैं इतना-अनाप सनाप क्यों बोलता रहता हूँ? कारण हम दुनिया से खुद को छुपाने के लिए भले ही कोई भी आवरण लगा ले परन्तु जब खुद के साक्षी होंगे तो यह खुद से नहीं छुपा पाएंगे. मैं जो कुछ दूसरों को कहता हूँ अप्रत्यक्ष रूप से अनिल कुमार “अलीन” को कहता हूँ जितना दुसरे तिलमिलाते है मेरी बातों से उससे कहीं ज्यादा अनिल कुमार “अलीन” तिलमिलाता है. क्योंकि वह समझता है कि मैं उसे जानता ही नहीं बल्कि मैं तो उसके नश-नश से वाकिफ हूँ और मुझे देखकर अक्सर भागने की कोशिश करता है मगर अफ़सोस दुसरे तो भागने में कामयाब हो जाते हैं पर यह मुझसे कैसे भागेगा? मैं तो दूसरों के बारे में बहुत कम जान पाता हूँ क्योंकि वो तो किसी न किसी तरह भाग जाते हैं और बेटा अनिल कुमार “अलीन” मेरी पकड़ में आ जाते हैं. अतः जोर-जोर से हँसने लगता हूँ कि अनिल कुमार अलीन से गन्दा, अहंकारी, मुर्ख तो कोई है ही नहीं. इस प्रकार खुद के अच्छे होने की गलतफहमी दूर करता हूँ……………………………. हाँ………………हाँ

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: sadguruji sadguruji

अनिल जी,आपने पूछा है-मेरे विचार से यह आवारा और बेवड़ों का काम है……….आपके विचार में क्या हो सकता है……………..सूफी जी ने कहा है-"अपना तो आशिकी का किस्सा-ए-मुख्तसर है, हम जा मिले खुदा से दिलबर बदल-बदल कर।” और ये मेरे लिए ही नहीं सब के लिए सच है, जब ख़ुदा जिसको मिला है दीवानगी से मिला है, “आशिकी से मिलता है ये जाहिद, बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता”मेरा विचार आप ने पूछा है तो मुझे लगता है कि ये सब साधन है और खतरनाक साधन है.इसमें उलझ-पुलझ के आदमी अपना कीमती समय बर्बाद भी कर सकता है.वाइन, वुमन एंड म्यूजिक आप कि हालत ऐसी कर सकते हैं कि-आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास.जाना था पूरब पहुँच गये पश्चिम.इस मार्ग से कोई विरला ही चलकर मंजिल तक पहुंचा होगा.हो सकता है कि कोई अपवाद हो.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

के द्वारा: शालिनी कौशिक एडवोकेट शालिनी कौशिक एडवोकेट

श्री महमूद भाई,  काफी अरसे बाद ब्लाग पर आया तो आपकी  रचना पढ़ी। सच्चाई है। जिससे आप सहमे हुए हैं। ठीक है। इसे  निरंतर कर लिया न, तो खूब मजा आएगा। सूफी, संत, फकीरों ने भी इसे स्वीकार किया है। बस, एक  बात ध्यान रखनी होगी कि जब कभी ऊपर वाला या पावर की कृपा होती है न, एेसा ही होता है। अभी तो परीक्षण का  समय आया है। इस परीक्षण में सफल होंगे तो अगली सीढ़ी  अपने आप मिलेगी..सफलता और असफलता दोनो आपके हाथ में है। आराधना, पूजा, मन्नतें या संस्कार, कुरान या  वेद भी इसे ही मानते हैं। सहमे..सहमे..से हमें आपको या अन्य किसी को सदैव अपनी मृत्यु याद रखने की जरूरत है।  सहमने में पैर न डगमगाए, बस काम हो गया..   महमूद महाराज... कोई तो है जो सहमा है...प्रमोद 

के द्वारा: pramod chaubey pramod chaubey

मुझे लगता है तुम सच में कोई लड़की या वैसी ही कुछ हो, इतनी चर-चर और कच्चर-पच्चर कोई लड़की ही कर सकती है...!! तुम्हारे दोनों चें-पें(पोस्ट) को पढ़ लिया है मैंने, कल तक रिप्लाई कर दूंगा... लेकिन इसबार मैं कोई कोई ब्लॉग नहीं लिखने जा रहा हूँ तुम पर, लोगों को लग रहा है कि 'शिप्रा' कोई नहीं है 'सूफी' खुद से शिप्रा बन कर खुद की विरोध कर रहा है, या फिर अपने किसी दोस्त को बोल कर अपना विरोध करवा रहा है, तुम्हारी अजीब सी हरकत के कारण आज कल कोई खुल कर मेरा विरोध नहीं कर रहा है..और ये सिर्फ लोगों को ही नहीं मुझे भी लगने लगा है, ऐसा कैसा कि तुम खाली मुझ से रिलेटेड पोस्ट ही करती हो, न किसी को कमेंट करती हो न ही किसी और विषय पर कुछ लिखती हो...और न ही कोई तुम्हारे पोस्टों पर कोई आ कर कमेंट करता है??? 'सद्गुरु जी' भी मेरा विरोध करते हैं लेकिन आज कल वो भी बेचारे शांत हैं, सरिता जी ने उनको जा कर समझा दिया है कि 'सूफी' आप को चिढ़ा रहा है, वो मज़े लेने के लिए ऐसा करता है.... लोगों से ज्यादा मेरे दोस्तों को लगता है कि 'शिप्रा' फेक ब्लॉग है | मुझे ये पता नहीं चल रहा कि ऐसी कौन सी मिर्ची तुमको लग गयी कि ६ के ६ पोस्ट मेरे पर डाल दिया ...??? लड़ाकू टाइप की लड़की हो क्या तुम...?? तुम्हारा कुछ जागरण से लेना देना है क्या...जब से तुमने मुझ से लड़ना शुरू किया है मेरा कोई भी पोस्ट फ़ीचर्ड नहीं हो रहा है..??? एक काम करो लोगों को बताओ कि तुम हो...उनको एहसास कराओ की 'शिप्रा' जैसी कोई 'जीवात्मा' इस वक़्त पृथ्वी पर मौज़ूद है और वो सच में सूफी का खुलासा कर रही है, लोगों को बताओ कि तुम क्या हो...!! तुम्हारे दोनों पोस्ट अच्छे हैं...मैं अच्छे से जवाब देना चाहता हूँ, ताकि तुम्हारी बौद्धिक-क्षुधा शांत हो, लेकिन लोगों को मज़ा नहीं आ रहा है... अब मेरे पास दो आप्शन है, पहला 'तुम्हारा जवाब तुम्हे मेल कर दूँ या फिर यहाँ कमेंट कर दूं'...!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

महाभारत और गीता के रचयिता का भी सही पता नहीं है। ".......वेद व्यास नाम के अनेक व्यक्ति थे- उनमें से बादनारायण व्यास या द्वैपायन व्यास,  कौन इनके प्रणेता हैं? व्यास तो केवल एक उपाधि है जिस किसीने पुराण या शास्त्र की रचना  की, वही व्यास नाम से पुकारा जाने लगा। इतिहास में व्यास के समान ही विक्रमादित्य एक सामान्य नाम है.......।" (भारत में विवेकानन्द, पृष्ठ 315) महाभारत के रचयिता के बारे में निर्णय करने की समस्या बालगंगाधर तिलक जी के सामने  भी आई थी कि ब्रह्मसूत्रों में स्मृति शब्द को गीता के लिये प्रयोग किया गया और गीता में भी  ब्रह्मसूत्रों का उल्लेख मिलता हैं, तब प्रश्न उठता स्वभाविक है कि दोनों ग्रन्थों में एक दूसरे का उल्लेख क्यों? और इन ग्रन्थों में पहले कौन-सा और बाद में कौन-सा रचा गया? इसके उत्तर में तिलक जी  ने यह कहा कि इन दोनों ग्रन्थों के कर्ता बादनारायण व्यास ही हैं।  वे अपने ग्रन्थ गीता रहस्य में लिखते है ं कि- "इन बातों को मिलाकर विचार करने से यही अनुमान होता है कि महाभारत तदन्तर्गत गीता को  वर्तमान स्वरूप देने का ब्रह्मसूत्रों की रचना करने का काम भी बादनारायण व्यास जी ने ही किया  होगा। इस कथन का मतलब यह नहीं है कि बादनारायणाचार्य ने वर्तमान महाभारत की नवीन  रचना की।  हमारे कथन का भावार्थ है कि महाभारत ग्रन्थ के अतिविस्तृत होने के  कारण संभव है कि बादनारायणाचार्य के समय उसके कुछ भाग इधर उधर विखर गये हों। ऐसी अवस्था में तत्कालीन उपलब्ध महाभारत के भागों की खोज करने तथा ग्रन्थ में जहाँ तहाँ अपूर्णता, अशुद्धियाँ और त्रुटुयाँ देख पड़ी, वहाँ वहाँ उनका संशोधन और उनकी पूर्ति करके तथा अनुक्रमणिका आदि  जोड़कर वादनारायणाचार्य ने इस ग्रन्थ का पुनरुज्जीवन किया है अथवा उसे  वर्तमान  स्वरुप दिया  हो। यह बात प्रसिद्ध है कि मराठी साहित्य में ज्ञानेश्वरी ग्रन्थ का ऐसा ही संशोधन एकनाथ महाराज  जी ने किया था। और यह कथा भी प्रचलित है कि एक बार संस्कृत व्याकरण महाभाष्य प्रायः लुप्त हो गया था, और उसका पुनरुद्धार चन्द्रशेखराचार्य को करना पड़ा है।"...(गीता रहस्य, पृष्ठ 536)

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

जिनको पच्छिम में पागलखाने में डाल दिया जाता है उस तरह के लोगों को हमने यहाँ भारत में धर्मगुरु और ज्ञानी बना रखा है...माना की भारत एक उदार देश है लेकिन उदारता की भी एक हद होती है, अब ये सब बर्दाश्त से बहार की बात है...!! 'अपना अपना सोच' होना गलत नहीं है लेकिन जब आप अपने दिमाग के कूड़ा-कचड़ा को दुसरों के दिमाग में डालने लगते हैं तो दिक्कत पैदा हो जाती है, और जब सद्गुरु जी, अनील जी, जवाहर जी, दिनेश जी, मनोज जी या फिर रंजना जी जैसे उच्य स्तर के लोग इस तरह का काम कर रहे हो तो और भी मुश्किल पैदा हो जाती है...लोग आपको पढ़ते हैं आपको सम्मान देते हैं इसका ये मतलब तो नहीं कि आप लोगों के अज्ञानता का फायदा उठाएंगे...??? 'गीता को गलत कहना, समझ रहे हैं आप कितनी बेहूदगी की बात है', बोलने की आजादी है लेकिन गाली देने की नहीं...मैं किसी भी प्रकार के पागलपन के विरोध में हूँ, चाहे वो धार्मिक पागलपन ही क्यों न हो...!! मैं इस देश के प्रतिभावान युवकों और बुद्धिजीवियों से निवेदन करता हूँ कि वो आगे आएं और इन सड़क छाप पंडितों और ज्ञानियों को रास्ता दिखाने में मेरी मदद करें...!!! 

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

'अपना अपना सोच' होना गलत नहीं है लेकिन जब आप अपने दिमाग के कूड़ा-कचड़ा को दुसरों के दिमाग में डालने लगते हैं तो दिक्कत पैदा हो जाती है, और जब सद्गुरु जी, अनील जी, जवाहर जी, दिनेश जी, मनोज जी या फिर रंजना जी जैसे उच्य स्तर के लोग इस तरह का काम कर रहे हो तो और भी मुश्किल पैदा हो जाती है...लोग आपको पढ़ते हैं आपको सम्मान देते हैं इसका ये मतलब तो नहीं कि आप लोगों के अज्ञानता का फायदा उठाएंगे...??? 'गीता को गलत कहना, समझ रहे हैं आप कितनी बेहूदगी की बात है', बोलने की आजादी है लेकिन गाली देने की नहीं...मैं किसी भी प्रकार के पागलपन के विरोध में हूँ, चाहे वो धार्मिक पागलपन ही क्यों न हो...!! मैं इस देश के प्रतिभावान युवकों और बुद्धिजीवियों से निवेदन करता हूँ कि वो आगे आएं और इन सड़क छाप पंडितों और ज्ञानियों को रास्ता दिखाने में मेरी मदद करें...!!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

'अपना अपना सोच' होना गलत नहीं है लेकिन जब आप अपने दिमाग के कूड़ा-कचड़ा को दुसरों के दिमाग में डालने लगते हैं तो दिक्कत पैदा हो जाती है, और जब सद्गुरु जी, अनील जी, जवाहर जी, दिनेश जी, मनोज जी या फिर रंजना जी जैसे उच्य स्तर के लोग इस तरह का काम कर रहे हो तो और भी मुश्किल पैदा हो जाती है...लोग आपको पढ़ते हैं आपको सम्मान देते हैं इसका ये मतलब तो नहीं कि आप लोगों के अज्ञानता का फायदा उठाएंगे...??? 'गीता को गलत कहना, समझ रहे हैं आप कितनी बेहूदगी की बात है', बोलने की आजादी है लेकिन गाली देने की नहीं...मैं किसी भी प्रकार के पागलपन के विरोध में हूँ, चाहे वो धार्मिक पागलपन ही क्यों न हो...!! मैं इस देश के प्रतिभावान युवकों और बुद्धिजीवियों से निवेदन करता हूँ कि वो आगे आएं और इन सड़क छाप पंडितों और ज्ञानियों को रास्ता दिखने में मेरी मदद करें...!!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

हाँ.......................तो यह बात हैं बहुत समय पहिले की. बहुत-बहुत, बहुत ही पहिले कि आप बस यह समझ लीजिये बाबा आदम के जमाने की. जब हमारे पूर्वज नंगे और असभ्य खानाबदोश जीवन व्यतीत करते थे. वो एक नंबर के जाहिल एवं आवारा थे. विचारों को व्यक्त करने के लिए सांकेतिक भाषा का उपयोग करते थे. धीरे-धीरे विचारों को व्यक्त करने के लिए एक भाषा का अविष्कार किये. जिसको केंद्रख कहा करते थे. इसका जिक्र किसी किताब में नहीं मिलेगा क्योंकि इस भाषा के शाक्षी बस हम ही दोनों थे. बस वही चीज याद दिलाना चाह रहा था कि आपकी और मेरी मुलाक़ात बहुत पुरानी है. याद है वो भी क्या दिन थे. जब ऊपर जे आग गिरा करता था और निचे से ऊपर पानी का प्रवाह था. मछलिया आसमान में उड़ा करती थी और कुत्ते पानी के अंदर भौका करते थे. मियाँ याद है हम दोनों के पास एक मगरमच्छ हुआ करता था जिसके पीठ पर बैठकर हम दोनों आसमान में उड़ा करते थे. अच्छा मियां वो दिन याद है जब हम मगरमच्छ को चाँद पर उतारे थे. वाह क्या नज़ारा था वहाँ से स्वर्ग का वो सुन्दर-सुन्दर पारियां हमें देखकर मुस्कुराया करती थी और मैं शरमाकर सूरज पर भाग जाया करता था. अच्छा वो परी याद है जिस पर तुम फ़िदा हो गए थे. उसके कहने पर पुरे चाँद को खुद दिए. वो भी ऐसी खुदाई कि आजतक यहाँ से चाँद पर गड्ढों के धब्बे नज़र आते हैं............हाँ...........हाँ...........हाँ......! और धरती पर आते समय हम दोनों दस बारह तारे भी लाये थे. घर आने पर हम दोनों की बहुत बढियां से खातिर हुत थी. हम दोनों रोते-रोते पाताल में जा छुपे थे..... हुई थी..............अब कुछ याद आया!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

महोदय, सूरज को देखने पर आखों का चौंधियाना स्वाभाविक है और वो भी तब, जब कोई बरसों अँधेरा में रहा हो.......... आप लम्बी-लम्बी बाते करते गए, डिंग पर डिंग हाकते गए. आप खुद को कभी सद्गुरु साबित किये, कभी ज्ञानी, कभी भक्त तो कभी कुछ. मैं तो आपकी बातों का पॉइंट तू पॉइंट व्याख्या किया. मैं तो अपने तरफ से कुछ कहा ही नहीं. यह तो आपके अंदर का चोर है कि आप मेरी बातों का जवाब देने के बजाय इधर-उधर की बाते कर रहे हैं. आप निरुत्तर हो गए हैं. बस यहीं अंतर होता है इकठ्ठा किये हुए ज्ञान और अनुभव-अनुभूति में. इसे एक उदाहरण द्वारा आपके सामने रखता हूँ....... १. एक जंगल में एक बकरी अपने मेमने के साथ एक छोटे से गुफा में रहती थी. एक दिन उसे जंगल से बाहर कुछ काम से जाना था. अतः खूंखार जानवर से बचने के लिए मेमने को सिखा के गयी कि यदि कोई जानवार गुफा के अन्दर से पूछे कि कौन है अन्दर? तो तुम कहना कि एक शावक ..........यहाँ क्या कर रहे हो? तुम कहना जंगल पर राज्य........यह सिखाकर बकरी जंगल से बाहर चली गयी........उसके जाने के एक सियार उधर से गुजरा और गुफे को देखकर आवाज दिया....कौन है अन्दर ?...अन्दर से आवाज़ आई.......शावक !......यहाँ क्या कर रहे हो.....? आवाज आई जंगल पर राज्य!........क्या खाते हो?.........मेमने के मुंह से झट से आवाज आई घास........!.......यह उसका सिखाया हुआ नहीं बल्कि अनुभव और अनुभूति द्वारा अर्जित ज्ञान था...........!...यह सुनकर सियार गुफा में घुसा और मेमने को खा गया...........! मेरे कहने का बस मतलब यही है कि आपको कितना भी सिखा दिया जाय, पढ़ा दिया जाय....जो आपकी स्वाभाविक प्रवृति है, अनुभूति है और अनुभव है.....उसे बदला नहीं जा सकता ...........आशा करता हूँ कि यह कहानी आपको पसंद आई होगी........अब यह मत पूछियेगा कि यह कहानी किस किताब में या गुरु के पास मिलेगी क्योंकि दुनिया के किसी भी जगह यह नहीं मिल सकती क्योंकि यह मेरी अनुभूति है मेरा अनुभव है.....और हमेशा नए वक्त के साथ एक नयी कहानी का सृजन करते रहता हूँ,,,,,,,,,,अपने अनुभवों........से ......जहाँ गीता और कुरआन ख़त्म होते हैं मैं वहाँ से शुरू होता हूँ........आपको यकीं नहीं होगा.....यकीं करना भी नहीं चाहिए...यही बात तो आपके सामने रखना चाहता हूँ कि आप किसी भी बाह्य ज्ञान को सत्य न माने बल्कि अपनी अनुभव और अनुभूति से जो मिलता है........बस वही सत्य है.......औए सत्य को कभी माना नहीं जा सकता, कभी समझा नहीं जा सकता, किसी किताब में या ग्रन्थ में नहीं लिखा जा सकता ...........

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

"जिस अवस्था से गुजर रहे हैं.उसे मै अपने छात्र जीवन में ही पर कर लिया था" कौन सी अवस्था और कौन गुज़र रहा है...?? सारी यात्रा और अवस्था झूठ है, मन के व्यायाम है 'plus ca change c'est la meme chose' ..!! "आप भ्रम में जी रहे हैं कि आप बहुत बड़े ज्ञानी हैं.आप केवल शब्दों के सौदागर हैं" किसने ये अफवाह फैलाई है कि सूफ़ी ज्ञानी है...?? जहां तक भ्रम में जीने का सवाल है, मैं आप से सहमत हूँ..! "आप केवल मनोरंजन और बौद्धिक कसरत करते हैं" ये बात भी सच है..!! "आप का लेख पढ़ने के बाद कुछ भी याद नहीं रहता " शुभ है.! "मै उधो कि अवस्था पर कर गोपी की अवस्था में हूँ" ये बात तो आपकी बिल्कुल झूठ है, मेरे समर्थन की अपेक्षा न करें...! "अर्थ का अनर्थ किया गया है" अहो..वो परम अर्थ था..अनर्थ नहीं..!! "मेरी समझ से ये मानसिक विकृति है" ये आपकी व्यक्तिगत समझ का मामला है, मैं कुछ नहीं कहूँगा !! "कसरत करने की कसम खा रखी है " मैं कोई बातों का धनी नहीं, जब चहुँ कसम तोड़ दूं...!! "आप के ब्लॉग पर कुछ कहना ही बेकार है" कहना बेकार तो है लेकिन आप करुणावश कहते रहिए...!! "प्रेम और शुभ कामनाओ का भी मजाक उड़ाते है" मज़ाक उड़ाने के लिए माफ़ी चाहता हूँ...!!"जिस ज्ञानी में मानवता न हो उसकी सारी ऊँची बातें बेकार हैं." आप कह रहे हैं तो ठीक ही कह रहे होंगे...!!! "आप का जबाब भी एक तरह का शोषण होता है" हम्म हो सकता है..मुझे नहीं पता..| "इंसान और इंसानियत की कद्र करना पहले सीखें" मैं अपनी पूरी ज़िन्दगी में एक ही बार स्कूल गया था वो भी भाई को छोड़ने....कहां से सीखूं...कोई सुक्षाव दें कृपया..??? "बाद में साक्षी भाव और ऊँचे ज्ञान की बात कीजियेगा" ...हज़रत जिसे प्यार हुआ है वो प्यार की ही बाते करेगा...यहां आप गलती मैं हैं, I talk what I am...!! "बहुत से ज्ञानियों के साथ मैंने वर्षों बिताये हैं" मुमकिन है, लेकिन सांगत से रंगत बदल जाए ज़रूरी तो नहीं..!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

आप ने कमेंट में सिर्फ आलोचना के मकसद से ही आलोचना की है.आज आप ज्ञान की जिस अवस्था से गुजर रहे हैं.उसे मै अपने छात्र जीवन में ही पर कर लिया था.आप भ्रम में जी रहे हैं कि आप बहुत बड़े ज्ञानी हैं.आप केवल शब्दों के सौदागर हैं.आप केवल मनोरंजन और बौद्धिक कसरत करते हैं.आप का लेख पढ़ने के बाद कुछ भी याद नहीं रहता है,जबकि अच्छे लेख कि ये खासियत है कि कुछ विचारने को बचे.अपने कमेंट में मैंने ये कहा था कि मै उधो कि अवस्था पर कर गोपी की अवस्था में हूँ.आप का मनोरंजन मात्र इसी बात में है कि कमेंट या लेख में जो कहा गया है उसके अर्थ का अनर्थ किया जाये.ये कोई ज्ञानी के लक्षण नहीं हैं.मेरे कमेंट के जबाब में आप ने जो कुछ भी कहा है वो मात्र अर्थ का अनर्थ किया गया है.ऐसा करके आप मानसिक आनंद महसूस करते होंगे,लेकिन मेरी समझ से ये मानसिक विकृति है.यदि आप ने सीधे से बात न कर मात्र बौद्धिक कसरत करने की कसम खा रखी है तो आप के ब्लॉग पर कुछ कहना ही बेकार है.प्रेम और शुभ कामनाओ का भी मजाक उड़ाते है.जिस ज्ञानी में मानवता न हो उसकी सारी ऊँची बातें बेकार हैं.आप का जबाब भी एक तरह का शोषण होता है.आप इंसान और इंसानियत की कद्र करना पहले सीखें,फिर बाद में साक्षी भाव और ऊँचे ज्ञान की बात कीजियेगा.बहुत से ज्ञानियों के साथ मैंने वर्षों बिताये हैं.वो आप से ऊँची ज्ञान की बातें करते थे,लेकिन इंसान और इंसानियत के प्रेमी थे.आप हर शब्द का हर कमेंट का और हर व्यक्ति का इमोशनल शोषण कर मानसिक आनंद लेते हैं.हर एक को दुःख पहुंचाने और मित्रता से लेकर अच्छे सेंटिमेंट्स तक हर चीज को नष्ट करने की बजाय सृजन करने में अपनी ऊर्जा व्यय कीजिये.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

मनोज जी- सब से पहले मेरा प्रचार-प्रसार करने के लिए हृदय से धन्यवाद | आपका कमेंट पढ़ कर मैं सच में दुविधा में हूँ, आप मेरा विरोध करने आये हैं या मेरा समर्थन कर रहे हैं, आपके कमेंट से ऐसा लग रहा है जैसे मेरे बारे में अफवाह फैला कर आप लोगों को मुझ में उत्सुक करना चाहते हैं...अगर आप यही चाहते हैं तो एक बार फिर से शुक्रिया, क्योंकि इस काम के लिए मुझे बहुत से लोगों की ज़रुरत है, आज कल मुश्किल से मैं अपना विरोधी ढूंढ पता हूँ.. एक शिप्रा जी आई थीं वो भी न जाने कहाँ चली गईं...!! लेकिन यदि आप मेरा विरोध करने आएं हैं..तो आप गलत ढंग से विरोध कर रहे हैं, जो मैंने कहा नहीं उसे मेरे मुंह में ठूस रहे हैं...मैं ने कहा था 'किसी महिला ने मेरा विरोध नहीं किया है', आप भारत मंच या फेसबुक दोनों पर देख लीजिये स्त्रियां मेरे समर्थन में हैं..!! आप निश्चिन्त रहें मैं कुछ भी नहीं हटाना हूँ, बल्कि मैं तो चाहूंगा कि आप मेरे ब्लॉग लिंक को सब जगह फैला दें...! अगर आप ऐसा करते हैं तो मैं आपका सदा आभारी राउंगा...!!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

सद्गुरुजी नमस्कार- न तो मुझे ज्ञानी होने से परहेज है न ही अज्ञानी, मैं रिन्दों रिंद हूँ, आशिकों में आशिक..!! आस्तिकता और नास्तिकता एक दूसरे से भिन्न नहीं है...दोनों में आपको एक झूठ को मानना होता है, भगवान को माना करने के लिए भी तो भगवान को मानना होगा न ??? 'उपलब्धि' बाजार की भाषा है.. 'मैं ये था और मैं ये हो गया' बदलाब और रूपांतरण में भेद है... सम्बोधि छलांग है 'कुछ' से न 'कुछ' में.. कार्मिक बदलाब या विकास हमारे अंदर सूक्ष्म अहंकार पैदा करता है, आप अपने मन का दर्शन करें...'मैं भक्त हूँ' ये भक्त होने का अहंकार है..ये अकड़ है..!! आपकी निंदा नहीं कर रहा हूँ, लेकिन ये कहना कि 'मैं अज्ञानी हूँ' होशियारी है.. ये आपको लोगों का इज़ज़त तो दिला सकता है पर बोध नहीं...!! मुद्दा ये नहीं है कि लोग आपको क्या मानते हैं, लोगों की मौज़ है कोई आपको सद्गुरु मानता है कोई नहीं मानता है, लेकिन सवाल ये है कि आप खुद को क्या मानते हैं...'मन की समस्या ये है कि ये पहले तो लोगों को धोखा देता है फिर खुद को ही धोखा देने लगता है' | मैं आपसे जो कुछ भी कहता हूँ प्रेमवश कहता हूँ |

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

१.आप गलतफहमी में जी रहे हैं. आप आज भी अशांत है वरना आपके अन्दर इतनी छटपिटाहत नहीं होती जो आपकी बातों से स्पष्ट प्रकट होता है. जिस अवस्था में आज आप हैं उस अवस्था में १७ साल पहिले (१३ वर्ष की आयु में) था. जो कि मेरी मुर्खता और पागलपन के सिवा कुछ नहीं था. परन्तु आज मैं ज्ञानी हूँ, यह भी कहना मेरी मुर्खता के सिवा कुछ नहीं. जब कोई ज्ञानी या फिर मुर्ख होता है तो अपने तरफ एक सीमा खिचता है, एक विशेषण उपयोग करता हैं. जहाँ तक मेरा अनुभव है इंसान को किसी विशेषण की आवश्यकता नहीं क्योंकि वो जो है बस वो है. विशेष बनने की ढोंग कर सकता है परन्तु विशेष कभी नहीं हो सकता. २. आप का कहना, "आप लोग परम ज्ञानी हैं आप लोगों से अब मै क्या कहूं.जबाब देता मै लेकिन अब मै उधो की बजाय गोपी बने रहने में ही आनंद ओर शांति महसूस करता हूँ." मतलब कि आप उधौ भी बन सकते हैं और वक्त पड़ने पर बहुत कुछ बन सकते हैं. मतलब की आप परिस्थितयों के वशीभूत है. यह स्पष्ट करता है कि आप अन्दर से बहुत अशांत है, दुखी है. ३. आप का कहना, "एक बात ओर मै आप लोगों से कहूंगा की मैंने कभी किसी से नहीं कहा की मुझे गुरु मानो,लेकिन जो लोग मानते हैं मै उन्हें मना भी नहीं करता." मतलब आप को झूठ के साथ जीने की आदत है, गलतफहमी में जीने की आदत है. क्योंकि आप स्वीकार करते हैं कि लोग आप को गुरु मानते हैं अर्थात आप गुरु नहीं और यदि हैं तो मानने का सवाल ही नहीं उठता. कभी सूरज को नहीं माना जा सकता कि वो सूरज है, कभी खुशबू को नहीं माना जाता, कभी माता-पिता को नहीं माना जाता. क्यों? क्योंकि जो है उसे क्या मानना? और जो मानते हैं वो भक्ति में नहीं मान्यवर गलतफहमी में, मुर्खता में, झूठ में. आप भक्ति में जिस दिन होंगे. उस दिन व्यक्त ही नहीं कर पाएंगे. कभी आपने सुना है क्या ? 'मैं' के रहते मरना, क्योंकि मरा हुआ व्यक्ति कभी कह ही नहीं सकता कि मैं मर गया. कभी देखा है क्या आप बारिश की बूंद को समुन्दर में गिरकर पृथक होते हुए. वो फिर समुन्दर हो जाता है. ऐसी ही कुछ भक्ति है. आप भक्ति में होते तो यहाँ प्रतियोगिता खेलने योग्य नहीं रहते. ४. आप का कहना, "आप लोगों की पता नहीं कैसी दिव्य दृस्टि है कि प्रकृति की हर चीज को यहाँ तक कि शराबी जुआरी को भी गुरु साबित कर दोगे, लेकिन एक इंसान जो लोगों को अच्छी शिक्षा दे रहा है उसके आगे अपना ज्ञान बखान कर उसका विरोध करते हो." मतलब आप भक्ति में है और आपको इस बात का होश है कि आप एक जुआरी या फिर शाराबी से बेहतर है. आपकी जिस बात को देखा जाय उसमे अभिमान नज़र आता है. क्या यह संभव है, भक्ति और अभिमान दोनों का एक साथ होना? सबसे बड़ी बात यह कि आप भक्ति में रहकर लोगों को शिक्षा दे रहे हैं. यह तो और असंभव है. आप इस बात का यकीं करें या न करें एक जुआरी या शराबी आपसे बेहतर शिक्षा देता है और वो भी अहंकार रहित. यह अलग बात है कि उससे कौन क्या लेता है? फिर कभी किसी की किसी से इस तरह तुलना मत करियेगा. क्योंकि हरेक चीज की अपनी उपयोगिता है. मुझे तो समझ में यह नहीं आ रहा है कि वो कौन मुर्ख है जो आपको गुरु या भक्त बना दिए? क्या गुरु या भक्त बनाया भी जाता है और माना भी जाता है. इससे हास्यपद और क्या बात हो सकती है? ५.आपका कहना, " आप से कौन कह रहा कि आप मेरे विचारों को माने और आप के विचारों को भी मानने न मानने के लिए मै स्वतंत्र हूँ." आप यह बात हमसे क्यों कह रहे हैं क्योंकि अभी आप ऊपर के पक्तियों में बोल रहे हैं कि मुझे कोई गुरु माने उसे रोक भी नहीं सकता. तो जो आपको गुरु नहीं माने उससे आपकी यह नाराजगी क्यों? जहाँ तक रही बात मानने और न मानने की. तो यह दोनों ही काम मूर्खों का है. ६. आपका कहना, "मै अपने मित्र सूफी जी के ब्लॉग पर आता हूँ.और वो भी मेरे ब्लॉग पर आते हैं.ये एक सामान्य सी बात है." यह कौन सी बात हुई. आप कमेंटों के व्यापारी है क्या? कि कोई आपको देगा तो आप उसे देंगे. यह व्यापार बंद करिए. यह तो वही बात हुई कि एक व्यापारी बोले कि फलाने ८० रूपया दिए हैं अतः उनको एक किलों पियाज़ दूंगा और आप रूपया नहीं दिए हैं आपको नहीं दूंगा. यह तो भक्तों का काम नहीं है और मैं जहाँ तक समझता हूँ यह कार्य ज्ञानियों का भी नहीं तो आप जो हैं उसकों स्वीकार क्यों नहीं करते? ७. आप का कहना, "रही बात कमेंट कि तो मै आप लोगों को बताना चाहूंगा कि बहुत से लोग ये शिकायत करते हैं.कमेंट देर से मेरे पास पहुंचते हैंऔर नही भी पहुंचते हैं.मै इस सम्बन्ध में जागरण परिवार से बात करूँगा." जहाँ तक बात रही इस समस्या कि तो यह संभव है और आपके पूरी बात में बस इन्हीं वाक्यों में कुछ सच्चाई झलक रही है. ८. आपका कहना, "आप सब के लिए अपने सादर प्रेम और भुभकमनाओं सहित" आपके इस बात में भी कटुता और द्वेअश नज़र आता है.....................आप अपना अनमोल समय व्यापार के अलावा दिनेश जी और मेरे लिए दिए................उसके लिए हार्दिक आभार!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरणीय सूफी ध्यान मुहम्मद जी,सादर प्रेम.ये ठीक है कि आप ज्ञानी और नास्तिक हैं और मैं अज्ञानी और भक्त हूँ.मै आप से कह चूका हूँ कि अज्ञानता ही मेरी परम उपलब्धि है.कभी बहुत पहले मै भी ज्ञानी और नास्तिक हुआ करता था.ज्ञान से बहुत सी चीजों को जाना,परन्तु शांति नहीं मिली फिर अचानक जीवन में परिवर्तन हुआ,बहुत से संतों का सानिध्य मिला और भक्ति में ऐसी शांति और शक्ति देखि कि मेरी विचाधारा बदल गई.मै तो उलटवासी हूँ.ज्ञान से अज्ञान कि ओर चला और अपनी खोपड़ी ज्ञान से खाली कर ली,जो मुसीबत ओर अशांति की जड़ बनी हुई थी.ज्ञानियों का मै आज भी आदर करता हूँ,लेकिन अब प्रभावित भक्तों से होता हूँ.वैसे तो इस मंच पर बहुत से ज्ञानी हैं,लेकिन मै आप के लेखों को पढ़ना पसंद करता हूँ.पढ़ के चुपचाप भी चले जाता हूँ ओर कभी आप से बतिया भी लेता हूँ.विचारधारा में भिन्नता होते हुए भी मेरा आप का प्रेम बरक़रार रहेगा.आदरणीय दिनेश आस्तिक जी को ओर आदरणीय अनिल कुमार अलीन जी को मेरा सादर प्रेम.आप लोग परम ज्ञानी हैं आप लोगों से अब मै क्या कहूं.जबाब देता मै लेकिन अब मै उधो की बजाय गोपी बने रहने में ही आनंद ओर शांति महसूस करता हूँ.एक बात ओर मै आप लोगों से कहूंगा की मैंने कभी किसी से नहीं कहा की मुझे गुरु मानो,लेकिन जो लोग मानते हैं मै उन्हें मना भी नहीं करता.आप लोगों की पता नहीं कैसी दिव्य दृस्टि है कि प्रकृति की हर चीज को यहाँ तक कि शराबी जुआरी को भी गुरु साबित कर दोगे, लेकिन एक इंसान जो लोगों को अच्छी शिक्षा दे रहा है उसके आगे अपना ज्ञान बखान कर उसका विरोध करते हो.आप से कौन कह रहा कि आप मेरे विचारों को माने और आप के विचारों को भी मानने न मानने के लिए मै स्वतंत्र हूँ.मै अपने मित्र सूफी जी के ब्लॉग पर आता हूँ.और वो भी मेरे ब्लॉग पर आते हैं.ये एक सामान्य सी बात है.रही बात कमेंट कि तो मै आप लोगों को बताना चाहूंगा कि बहुत से लोग ये शिकायत करते हैं.कमेंट देर से मेरे पास पहुंचते हैंऔर नही भी पहुंचते हैं.मै इस सम्बन्ध में जागरण परिवार से बात करूँगा.आप सब के लिए अपने सादर प्रेम और भुभकमनाओं सहित.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

एक बात तो पूछना ही भूल गया.....................वो यह कि आप वही महापुरुष हैं न! जो बोला था कि वो मेरे ब्लॉग को दुरुस्त करने के लिए जेजे परिवार से विनती करेगा. पर आप जेजे के फीडबैक पर गए भी थो इसलिए, " sadguruji के द्वारा November 16, 2013 आदरणीय जागरण जंक्शन परिवार,इतना सरल सेक्युरिटी कोड बनाने के लिए बहुत-बहुत बधाई.अब कमेंट आसानी से जा आ रहा है.आप का बहुत-बहुत धन्यवाद." मतलब अपने स्वार्थ के लिए और आप खुद को लोगों से सद्गुरु कहलाना चाहते हैं. लम्बी-लम्बी हाकने से कोई महापुरुष नहीं बन जाता. अपने क्रियापलापों का कार्य अध्ययन कीजिये. तब पता चलेगा कि आप एक सधारण पुरुष कहलाने के भी लायक नहीं है. आप सत्य कि बात कह रहे हैं.............? कि सत्य से कोशों दूर भाग रहे हैं. आप अच्छी तरह जानते हैं कि जब मैं जेजे ब्लॉग पर अवतरित हूँगा तो आपका धंधा बंद हो जायेगा.......! यदि कोई जरा भी समझदार व्यक्ति होगा तो आपके बहकावे में नहीं आएगा.....! क्योंकि आपके ऊपर जो नकली ज्ञान का हौज बना था. हम दोनों उसे तोड़ दिए हैं. अब कूड़ा-करकट साफ़ नज़र आने लगा है. ये अलग बात है कि कुछ मूर्खों को नज़र नहीं आये..... ै2

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

सद्गुरु जी, आप...........! अच्छा हुआ कि आप यहाँ मिल गए वरना आप तो दुर्लभ हो गए है. आप सबके कमेन्ट को अवरोध करके रखे हैं ताकि जो आपके समर्थन में हो उसे पब्लिकली उजागर कर सके और जो सच हो अर्थात आपके इच्छा के विरुद्ध उसे रोका जा सके. क्या आपको लगता है कि आँख बंद कर लेने सूरज डूब जाएगा? नहीं न, तो आप फिर किसको धोखा दे रहे हैं खुद को या फिर सत्य को. आप भगवान् के भक्त और इस सृष्टि के भी भक्त है,.....मतलब तीन इकाई ..............हाँ...............हाँ......................हाँ.............................यहाँ एक की बात हो रही हैं और आप उसे तीन कर दिए ............मतलब यहाँ सत्य की बात हो रही है........और आप सब झूठ कर दिए.....................अभी आपने कहाँ मन की बात ................हाँ.............हाँ.............हाँ.............मन की सारी बाते झूठ होती है. क्या आपको यह भी नहीं पता? चलिए आपकी ही बात सही है. तो क्या इस सृष्टि और भगवान् के आप ही भक्त है........? तो और सब क्या है? सिर्फ आप ही का मन सही है? और हाँ.................इसके आगे भी सत्य तो उसे आप प्रकट कर दीजिये!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

आदरणीय सद्गुरुजी, नमस्कार...!! "मै आप को तार्किक दृष्टि से एक अच्छा लेख" लेख तार्किक नहीं बौद्धिक है, मैं कुछ सिद्ध नहीं कर रहा हूँ सिर्फ इशारा कर रहा हूँ, "-आँखों से जो दीखता है" आँखों से दिखने और न दिखने का सवाल ही नहीं है, मैं न तो दृश्य को सत्य कह रहा हूँ न ही अदृश्य को... 'देखने वाले' को छोड़ कर कुछ भी सत्य नहीं है.. भक्त की कल्पना है भगवान, जबतक भक्त भगवान से मुक्त नहीं होता उसकी भक्ति पूरी नहीं होती...अगर आप भक्ति मार्ग की बात करेंगे तो मैं कहूंगा..'सिवाय भक्त के सब झूठ है, ये अलग बात है कि भगवान एक 'उपयोगी झूठ' है..! जैसे बच्चा 'ग से गणेश' पढता है वैसे ही भक्त शुरू शुरू में 'भगवान' पढता है.... आप अपनी झूठ के साथ स्थिर रहें, मैं छोड़ने के लिए भी नहीं कहूंगा ..क्यों ये आखरी झूठ है, और सब से उपयोगी भी....!! "आप जितना जानते हैं" फिर आप गलती में हैं...'जानकारी जानने वाले से अलग नहीं है', मैं जानकारी नहीं हूँ, मैं जानने वाला हूँ, 'और सिवाय जानने वाले के सब जानकारी कूड़ा-कचरा है...|

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

आदरणीय सदगुरु जी, सादर प्रमाण। आपसे निवेदन है कि मेरी एक समस्या का निदान करें। ऐसा कोई उपाय बताये जिससे मैं आपकी पोस्ट पर अपने विचार व्यक्त कर सकूँ और वह दृष्टिगोचर भी हो। संभवतः मैं आपके ईश्वर के कोप का भाजन बना हुआ हूँ। आपकी पोस्ट पर की गई मेरी प्रतिक्रिया आपके ईश्वर की तरह अदृश्य रहती है। कहीं मेरी यह प्रतिक्रिया ही तो ईश्वर नहीं है। कृपया मेरी शंका का समाधान करें। संभवतः आप  ऐसे पहले और अंतिम सतगुरु हैं जिसके श्रीचरणों में मैनें अपनी समस्या का प्रस्तुत किया है। क्योंकि मैं गुरु शिष्य की परंपरा में विश्वास नहीं रखता। मैं मानता हूँ कि हमारा अनुभव ही सबसे बड़ा और सच्चा गुरु होता है जो न हो हमें छलता है और न ही धोखा  देता है। एक बार और निवेदन करता हूँ कि मुझ अज्ञानी की बातों के मजाक में न उड़ा दें।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

आदरणीय सूफी ध्यान मुहम्मद जी.सादर प्रेम.आप का मै पढ़ा.पिछले लेख भी मै पढ़ा था.हम सभी लोग समय रूपी वाहन पर सवार होकर सफ़र ही तो कर रहे हैं और इस सफ़र के आप भी मेरे एक साथी हैं.इस लेख में कमेंट करने योग्य मुझे कुछ मिला,इसीलिए कमेंट कर रहा हूँ.सबसे पहले तो मै आप को तार्किक दृष्टि से एक अच्छा लेख लिखने के लिए बधाई दूंगा.विपश्यना मै भी पसंद करता हूँ,उसके लिए भी बधाई दूंगा.भगवान और इस सम्पूर्ण सृष्टि का भक्त होने के नाते अपने मन की बात भी कहूंगा-आँखों से जो दीखता है,वही सत्य नहीं है.इस सृष्टि का ९०% सत्य जो आँखों से नहीं दीखता है,वो भी सत्य है.ये बात अलग है कि तर्क कि दृष्टि से जो आप ने जान लिया है,बस उसी को सच मान लिया है,आप स्वीकार करें या न करें परन्तु सच ये है कि आप जितना जानते हैं उसके आगे भी बहुत कुछ है.अपनी शुभकामनाओं सहित.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीय.....................ब्लाक तो नहीं परन्तु उससे भी बड़ा कदम उठाया गे है जेजे द्वारा. वो यह कि मेरे ब्लॉग के सॉफ्ट वेयर में फेर-बदल कर दिया गया जिससे कोई मेरे नाम पर क्लिक करता है तो मेरे ब्लॉग न पहुंचकर जेजे के होम पेज पर पहुँच जाता है. वो इसलिए ताकि मेरे पाठकगण मेरे आलेख तक पहुँच नहीं पाए और धीरे-धीरे मेरी लोकप्रियता कम हो जाए. इस तरह जेजे परिवार को भी कोई दोष नहीं देगा और वो सबकी नज़र में अच्छा बना रहेगा. उनकी यह सोच काफी हद तक कामयाब भी हुई क्योंकि फीडबैक पर कमसे कम दसों शिकायतों के करने के बाद भी मेरे ब्लॉग को दुरुस्त नहीं किया गया. तो मैं पिछले १० महीनों से इस पर लिखना बंद कर दिया था..................बाकी सब तो आप खुद देख रहे हैं.................आपके समर्थन के आभार!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

निःशब्द!..........................बहुत खूब. तुम्हारे इस आलेख से एक घटना याद आ गयी. एक शहर में एक ब्राह्मण रहा करता था. वो हर रोज सुबह को स्नान-ध्यान करने के बाद भगवान् को भोग कराने के लिए घर की छत पर एक थाली में भोजन छोड़ जाया करता था. बगल के पेड़ पर रहने वाला एक बन्दर छत पर आकर उसे खा जाता और बदले में उसके लिए एक फल तोड़ कर थाली में रख देता. बन्दर उसकी नज़र में भगवान् और फल प्रसाद हो गया. एक दिन वो बन्दर थाली के भोजन खा तो गया पर पेड़ पर सारे फल ख़त्म हो जाने के कारण उसे फल नहीं दे सका. इसपर ब्राहमण क्रोधित होकर उस बन्दर को लाठी डंडे से मारा डाला. इस प्रकार भक्त के हाथों भगवान् की मृत्यु हो गयी...........................आशा करता हूँ....... कहानी पसंद आई होगी.

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

जो कोई भी जीवन के इस कड़वे सत्य को जानना चाहता हो उसको सब से पहले खुद की खुदाई करनी चाहिए, जिसने एक आदमी को जान लिया उसने पूरी मनुष्यजाति को जान लिया समझो.., जो एक की सचाई है वो सब की है, यहाँ कोई खास नहीं है | कोई ये मत सोचे के ‘मैं तो स्पेशल केस हूँ’, ‘मैं तो अवतार हूँ’, ‘मैं तो यूनिक हूँ’, ‘मैं तो ऋषि हूँ’, ‘मैं तो धार्मिक हूँ’, ‘मैं तो ख़ुदा का स्पेशल बन्दा हूँ’… नहीं यहां सब एक है- प्रकृति किसी के साथ भेद भाव नहीं करती है, ऐसा नहीं है अस्तित्व को किसी से कम प्रेम है किसी से ज्यादा… यहाँ तुम/हम इतने ही खास है जितने कि कोई ‘कृष्ण’, क्राइस्ट, महावीर या मोहम्मद हैं | अस्तित्व में बुद्ध और बुद्धू में कोई बुनियादी भेद नहीं है…| भेद हमारी अज्ञानता की वजह से दीखता है, जिस दिन हमारी दृष्टि साफ़ होने लगती है भेद मिटने लगता है…| ‘हर ज़र्रा अपनी जगह अफ़ताब है’ .................................मियाँ, बहुत खूब................लाजवाब....................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: seemakanwal seemakanwal

सार्थक और अर्थपूर्ण कमेंट....................हाँ....................हाँ............................कुछ हद तक. फिलहाल आपकी बातों को यही छोड़कर दी की ओर रुख करता हूँ......................................................... दी, आपका कहना,"युगांतरकारी पुरुषों को उनका सम्मान ज़रा देर से मिलता है..कृष्ण अर्जुन संवाद को "गीता" का रूप लेने मे हज़ारों साल लग गये.गीता क़ुरान की बातचीत अगर बकवास होती तो आज उसको ये सम्माननीय स्थान ना प्राप्त होता" आपकी इस बात का सम्मान करता हूँ पर सवाल यह उठता है कि जिस तरह का सम्मान गीता और कृष्ण के प्रति लोगों का है. क्या वो उसके इच्छुक थे? गीता और कुरआन की बातचीत बकवास तो नहीं परन्तु जिस सम्मान की आप बात कर रही हैं वो बकवास जरुर है. आपका कहना, "वहाँ किसी ने लड़ लड़ कर अपने लिए स्थान नही माँगा बल्कि उपयोगिता समझ मे आने से खुद बखुद दर्जा मिला...उसी तरह आपको अपने विचारों को स्थान दिलाने के लिए लड़ने की ज़रूरत नही है, वे प्रासंगिक होंगे तो लोग खुद बखुद अहमियत समझेंगे." क्या आपने कभी एक बात समझने की कोशिश की हैं कि जब तक ये महापुरुष जीवित थे तबतक लोगों को उनकी बाते प्रासंगिक क्यों नहीं लगी? प्रांसगिक लगने में वर्षों क्यों लग गए? कारण स्पष्ट है कि चाहें कृष्ण का समय हो या फिर सूफी ध्यान मुहम्मद का. हरेक समय में इनका भीड़ द्वारा विरोध किया गया और आने वाले समय में भी किया जाएगा. परन्तु बुद्धिमान इनके समर्थन में कल भी रहे हैं और आज भी हैं फिर आने वाले कल में भी रहेंगे. जहाँ तक रहा सवाल लोगों के लिए प्रासंगिक होने का तो वो तभी होता हैं जब उससे लोगों का स्वार्थ सिद्ध होता है या फिर उसके आड़ में अपने सारी कुकृत्यों को आसानी से छुपाये जा सके और ये लोग जो खुद को धार्मिक या फिर गीता और कुरआन को आदर्श मानते हैं, अच्छी तरह जानते थे कि कृष्ण और मुहम्मद के रहते हुए यह सब आसानी से नहीं हो पायेगा. यही कारण है कि गीता और कुरआन को प्रासंगिक होने में वर्षों लग गए. पर सवाल उठता है कि क्या यही प्रासंगिकता का स्वरुप है. आपका कहना, " अभी आप की सूफ़िगिरी अधूरी है क्योंकि आप व्यक्तिगत आक्षेप से भड़क उठते हैं.....ये सूफ़ियों का नहीं बल्कि अघोरियों का काम है.. ऐसा तब होता है जब कोई जानबूझ कर क्रोध में उतरा हो बाहर से थोपा गया क्रोध सूफ़ी के दरवाज़े तक नही पहुच सकता...." आपकी ये बात जरुर यहाँ अप्रासंगिक है क्योंकि सूफी ध्यान मुहम्मद के आलेख से यह कहीं नहीं झलकता कि सूफीगिरी अधूरी है या फिर पूरी है. वह आलेख सभी के लिए प्रासंगिक है. ये अलग बात है कि फिलहाल लोगों का उससे स्वार्थ सिद्ध नहीं हो पा रहा. अतः आपका ये कहना बेतुक्का के सिवा कुछ नहीं. बाकी आपकी बातों से सहमत हूँ.....................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

आदरणीय, सूफी ध्यान मुहम्मद जी ने नाम बदल लिया (1) आपने अपना नाम कब से बदल लिया? मुझे तो पता था कि आपका नाम ‘सूफी ध्यान मुहम्मद’ है!! शिप्रा पाराशर कब से हो गया?खैर..थोड़ा अजीब है लेकिन अपने नाम का कोई और भी देखकर अच्छा लग रहा है...बस ये लड़कियों वाले नाम का एक लड़का देखना बहुत अजीब है....पर कोई नहीं...नाम तो नाम है.... अब मुद्दे पर आते हैं.. ” आपको क्या लगता है महानुभाव, मजे लेना सिर्फ आपको ही आता है..’ध्यान रहित’ सूफी ध्यान मुहम्मद जी, यह तो आपको मेरे पहले ब्लॉग से ही समझ जाना चाहिए था कि उसके बाद मैं जो भी जवाब दूंगी, बस मजे लेने के लिए. क्योंकि आपके ब्लॉग को प्रतिक्रिया (‘प्रतिक्रिया’ के संबंध में आपके विचारों पर हमारे विचार समझाना ही बेवकूफी है) देने लायक तो मैं यूं भी नहीं समझती. फिर भी जवाब (आपके शब्दों में) दिया...ताकि आपको आपकी वास्तविक जगह (भले ही ‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’ को आप चरितार्थ करें और इसे न मानें..और समझकर भी आप नहीं समझें...फिर भी) समझा सकूं. पर उसका जवाब (आपकी तरफ से) तो मैं मजे लेने के लिए ही चाहती थी. वैसे ही जैसे ‘स्वान’ को छोटा पत्थर उठाकर मार दो..और वह आवाजें करता रहेगा..लोग यह सब मजे लेने के लिए ही तो करते हैं! मैं भी वही करती हूं... मुझे लगा शायद आप समझ गए होंगे कि उसके बाद या तो मैं जवाब दूंगी नहीं या दूंगी तो केवल मजे लेने के लिए. अफसोस आप इसे भी नहीं समझ सके. और बता भी दिया कि समझे नहीं. कोई नहीं...आप देते रहें जवाब..हम भी देते रहेंगे..क्योंकि तर्क में सीमाएं होती हैं...कुतर्क में तो कुछ भी बोल सकते हैं...” तो कुतर्कों की श्रेणी में कुतर्क शुरू करते हैं एक बार फिर से आपके महान् उद्धरणों से ही... “जी अवश्य सुनी है..लेकिन किन्ही और अर्थों में, लोगों ने गलत अर्थ दे दिया है इस कहावत को..|” हर बात के दो पहलू होते है। खुशी हुई जानकर...कि आप दूसरे पहलू को भी समझते हैं। पर उससे उसके ‘पहले (एक और पहलू) का अस्तित्व नहीं मिट सकता..उसे अनदेखा नहीं कर सकते.. “जो जानता है वो सोचता नहीं है, और जो सोचता है वो जानता नहीं है…! “ सूफी जी! सूफी जी! सूफी जी!...उफ्फ! आपसे यही उम्मीद थी..और उसे न तोड़ते हुए उम्मीदों पर खरा उतरे हैं आप! ‘खुशफहमी’ कहते हैं वैसे ऐसे हालात को!...’सोचने’ और ‘जानने’ की प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है। ‘सोचने’ और ‘जानने’ में एक ‘अन्योन्याश्रय संबंध’ है। इसे थोड़ा खींचना पड़ेगा...क्योंकि मुझे पूरा विश्वास है आप इसे समझेंगे नहीं... पहला, ‘सोचने’ की प्रक्रिया के बिना ‘जानना’ संभव नहीं. क्योंकि ‘सोच’ ‘बुद्धि’ का परिचायक है (अब चाहे कैसी भी बुद्धि हो..छोटी-बड़ी, बुद्धिमान-बेवकूफ)..लेकिन ‘सोच’ सबमें होगी. उसी सोच के अनुसार हम बातें ग्रहण करते हैं. जहां तक ‘जानने’ का सवाल है..हे ज्ञानी महानुभाव! ‘सोच के बिना तो जानना संभव ही नहीं!’ ‘जिस खाली दिमाग शैतान का घर’ का आपने उल्लेख किया है....वह शैतान भी तो सोच ही है...’ वह सोच ही तो है जो आपमें जानने की कौतूहल पैदा करता है..यह सोच ही तो है जो आपमें ‘थोड़ा-बहुत’ ‘फ्रायड’ और ‘रजनीश’ को पढ़ने का शौक पैदा करता है. यह सोच ही तो है जो आपको 24000 किताबें पढ़कर ‘खुद में ‘सबकुछ जान लेने का वहम’ पैदा करता है. देखिए! हर जगह सोच ही है..सूफी जी (माफ करना भाई, अभी ‘शिप्रा जी’ बोलने की आदत नहीं पड़ी है..एक तो यूं ही किसी का बदला हुआ नाम लेकर उसे बुलाना थोड़ा मुश्किल होता है..उसपर भी अपने ही नाम से किसी और को बुलाना.....थोड़ा अजीब होता है..इसलिए इसकी आदत डालने में थोड़ा वक्त लगेगा...लेकिन 2-3 कमेंट और लिखूं अगर तो शायद आदत पड़ जाए...)! खासकर जहां भी ‘जानने’ (ज्ञान) और ‘जानने की प्रक्रिया (ज्ञान पाने की प्रक्रिया)’ है, वहां ‘सोच’ जरूर है. हैरानी हो रही है...’सोचकर’...सचमुच! आश्चर्यजनक! बेहद आश्चर्यजनक!...आप तो अपने आप को ज्ञानी बताते हैं! हे दैव! कृपया बताएं कि आपने ‘सोचे बिना’ इतना जाना कैसे?...किस प्रकार इतना ज्ञान अर्जित किया...या कहीं...यह ज्ञान ‘अल्पज्ञान’ तो नहीं!...नहीं, नहीं! अब यह कैसे मैं सोचूं...कि आप ‘अल्पज्ञान’ को ही ‘ज्ञान’ समझ रहे हैं...कि आपको दोनों के बीच का अंतर ही नहीं पता! खैर, दोनों ही अर्थों में हमारे लिए तो आगे आप बात करने लायक नहीं..आगे पढ़ूं भी कैसे...उतना समय भी कैसे दूं इतना लंबा उत्तर पढ़ने में..जब मुझे पता है कि आप तो बात करने के लायक ही नहीं! अगर आप बिना सोचे ही 24000 किताबें पढ़ सकते हैं...भले ही बिना समझे उसे बस read किया हो. आपकी महानता की तुलना में मैं ‘तुच्छ अज्ञान’ प्राणी कहां मुकाबला कर पाऊंगी. दूसरी सूरत में, अगर आप अल्पज्ञान (बेवकूफी) के शिकार हैं....तो भी ऐसे में हम अपने से ‘छोटे’ लोगों से बात करना अपनी तौहीन समझते हैं.... आगे अपनी (‘ज्ञान भरी’) समझदारी से आप खुद समझ सकते हैं..अब नहीं कह सकती...कि....’समझ तो तुम गए ही होगे!’..क्योंकि आपकी समझ के एक और उथलेपन का अंदाजा हो गया है..फिर भी एक सरसरी निगाह डाली आपके पूरे जवाब पर...सोचा आपने मेरे लिए इतनी मेहनत की है..मेहनत की कद्र करनी चाहिए..साथ ही ‘experience’ के लिए भी...ताकि ‘अल्पज्ञान’ का level समझ सकूं और भविष्य में (अगर जरूरत पड़ी) अल्पज्ञानियों की श्रेणी का वर्गीकरण करते हुए उनसे बात कर सकूं! खैर, उम्मीद से परे...’बकवाद’ में भी कुछ नया नहीं लिखा आपने...वही सब पुरानी बातें...जिनका जवाब मैं पहले ब्लॉग में ही दे चुकी हूं. ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ का पहला पहलू एक बार फिर आपको समझने की जरूरत है. द्सरा पहलू समझा है अच्छी बात है... लेकिन छोड़कर चलना अच्छी बात नहीं..पहले पहला पहलू तो पूरा समझ लीजिए...कहीं 24000 किताबें भी इसी तरह छोड़-छोड़कर तो नहीं पढ़ी?... कोई नहीं ..’आंख वाला प्रकाश के बारे में भले न सोचे’...लेकिन दिन में भी सोनेवालों को भी दिन गुजर जाने का अफसोस नहीं करना चाहिए. जब जागो तभी सवेरा होता है...इसलिए वो 24000 किताबें अगर आपने ‘छोड़-छोड़कर’ पढ़ी हों और आज भी यही आदत हो...तो कोई बात नहीं ‘ध्यान जी’...50000 पहुंचने से पहले आज से ही इसे पूरा-पूरा पढ़ने की आदत डाल लें..निश्चय ही ‘अल्पज्ञान’ सुधार में लाभ होगा... लेकिन इसमें एक अंदेशा और है...दरअसल होता क्या है...कि अगर आंखों वाला कोई बहुत वक्त तक आंखें मूंदे रहे तो उसे अंधेरे की आदत पड़ जाती है..आंखें खोलने के बाद प्रकाश के वेग को वह सहन कर पाता..ऐसे वक्त में प्रकाश के वेग को सहन न कर पाने के कारण प्राणी के अंधों सा गिड़ने-पड़ने की संभावना होती है... लेकिन यह बस थोड़े वक्त की बात होती है...उस थोड़े समय के कष्ट को सहन कर वह प्राणी वापस प्रकाश किरणों के साथ सामान्य हो जाता है और एक सामान्य जीवन जीने लगता है..किताबें जल्दी-जल्दी छोड़कर पढ़ने के संबंध में भी यह एक ग्रहणीय बात होगी...शुरुआत में यह बहुत बोरिंग लगेगा लेकिन धीरे-धीरे जब आपको इसके लाभ दिखने लगेंगे तो आपको भी यह अच्छा लगने लगेगा... **(शायद शब्दों की सीमा के कारण पूरा जवाब एक में पोस्ट नहीं हो रहा...कल बहुत कोशिश की पर हुआ नहीं...इसलिए अब इसे दो पोस्ट में बांटना पड़ रहा...आगे दूसरे पोस्ट में...) दूसरा पोस्ट: http://shipraparashar.jagranjunction.com/2013/11/17/%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%AB%E0%A5%80-%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%B9%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A6-%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%A8-2/

के द्वारा: Shipra Parashar Shipra Parashar

आदरणीय, सूफी ध्यान मुहम्मद जी ने नाम बदल लिया (1) आपने अपना नाम कब से बदल लिया? मुझे तो पता था कि आपका नाम ‘सूफी ध्यान मुहम्मद’ है!! शिप्रा पाराशर कब से हो गया?खैर..थोड़ा अजीब है लेकिन अपने नाम का कोई और भी देखकर अच्छा लग रहा है...बस ये लड़कियों वाले नाम का एक लड़का देखना बहुत अजीब है....पर कोई नहीं...नाम तो नाम है.... अब मुद्दे पर आते हैं.. ” आपको क्या लगता है महानुभाव, मजे लेना सिर्फ आपको ही आता है..’ध्यान रहित’ सूफी ध्यान मुहम्मद जी, यह तो आपको मेरे पहले ब्लॉग से ही समझ जाना चाहिए था कि उसके बाद मैं जो भी जवाब दूंगी, बस मजे लेने के लिए. क्योंकि आपके ब्लॉग को प्रतिक्रिया (‘प्रतिक्रिया’ के संबंध में आपके विचारों पर हमारे विचार समझाना ही बेवकूफी है) देने लायक तो मैं यूं भी नहीं समझती. फिर भी जवाब (आपके शब्दों में) दिया...ताकि आपको आपकी वास्तविक जगह (भले ही ‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’ को आप चरितार्थ करें और इसे न मानें..और समझकर भी आप नहीं समझें...फिर भी) समझा सकूं. पर उसका जवाब (आपकी तरफ से) तो मैं मजे लेने के लिए ही चाहती थी. वैसे ही जैसे ‘स्वान’ को छोटा पत्थर उठाकर मार दो..और वह आवाजें करता रहेगा..लोग यह सब मजे लेने के लिए ही तो करते हैं! मैं भी वही करती हूं... मुझे लगा शायद आप समझ गए होंगे कि उसके बाद या तो मैं जवाब दूंगी नहीं या दूंगी तो केवल मजे लेने के लिए. अफसोस आप इसे भी नहीं समझ सके. और बता भी दिया कि समझे नहीं. कोई नहीं...आप देते रहें जवाब..हम भी देते रहेंगे..क्योंकि तर्क में सीमाएं होती हैं...कुतर्क में तो कुछ भी बोल सकते हैं...” तो कुतर्कों की श्रेणी में कुतर्क शुरू करते हैं एक बार फिर से आपके महान् उद्धरणों से ही... “जी अवश्य सुनी है..लेकिन किन्ही और अर्थों में, लोगों ने गलत अर्थ दे दिया है इस कहावत को..|” हर बात के दो पहलू होते है। खुशी हुई जानकर...कि आप दूसरे पहलू को भी समझते हैं। पर उससे उसके ‘पहले (एक और पहलू) का अस्तित्व नहीं मिट सकता..उसे अनदेखा नहीं कर सकते.. “जो जानता है वो सोचता नहीं है, और जो सोचता है वो जानता नहीं है…! “ सूफी जी! सूफी जी! सूफी जी!...उफ्फ! आपसे यही उम्मीद थी..और उसे न तोड़ते हुए उम्मीदों पर खरा उतरे हैं आप! ‘खुशफहमी’ कहते हैं वैसे ऐसे हालात को!...’सोचने’ और ‘जानने’ की प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है। ‘सोचने’ और ‘जानने’ में एक ‘अन्योन्याश्रय संबंध’ है। इसे थोड़ा खींचना पड़ेगा...क्योंकि मुझे पूरा विश्वास है आप इसे समझेंगे नहीं... पहला, ‘सोचने’ की प्रक्रिया के बिना ‘जानना’ संभव नहीं. क्योंकि ‘सोच’ ‘बुद्धि’ का परिचायक है (अब चाहे कैसी भी बुद्धि हो..छोटी-बड़ी, बुद्धिमान-बेवकूफ)..लेकिन ‘सोच’ सबमें होगी. उसी सोच के अनुसार हम बातें ग्रहण करते हैं. जहां तक ‘जानने’ का सवाल है..हे ज्ञानी महानुभाव! ‘सोच के बिना तो जानना संभव ही नहीं!’ ‘जिस खाली दिमाग शैतान का घर’ का आपने उल्लेख किया है....वह शैतान भी तो सोच ही है...’ वह सोच ही तो है जो आपमें जानने की कौतूहल पैदा करता है..यह सोच ही तो है जो आपमें ‘थोड़ा-बहुत’ ‘फ्रायड’ और ‘रजनीश’ को पढ़ने का शौक पैदा करता है. यह सोच ही तो है जो आपको 24000 किताबें पढ़कर ‘खुद में ‘सबकुछ जान लेने का वहम’ पैदा करता है. देखिए! हर जगह सोच ही है..सूफी जी (माफ करना भाई, अभी ‘शिप्रा जी’ बोलने की आदत नहीं पड़ी है..एक तो यूं ही किसी का बदला हुआ नाम लेकर उसे बुलाना थोड़ा मुश्किल होता है..उसपर भी अपने ही नाम से किसी और को बुलाना.....थोड़ा अजीब होता है..इसलिए इसकी आदत डालने में थोड़ा वक्त लगेगा...लेकिन 2-3 कमेंट और लिखूं अगर तो शायद आदत पड़ जाए...)! खासकर जहां भी ‘जानने’ (ज्ञान) और ‘जानने की प्रक्रिया (ज्ञान पाने की प्रक्रिया)’ है, वहां ‘सोच’ जरूर है. हैरानी हो रही है...’सोचकर’...सचमुच! आश्चर्यजनक! बेहद आश्चर्यजनक!...आप तो अपने आप को ज्ञानी बताते हैं! हे दैव! कृपया बताएं कि आपने ‘सोचे बिना’ इतना जाना कैसे?...किस प्रकार इतना ज्ञान अर्जित किया...या कहीं...यह ज्ञान ‘अल्पज्ञान’ तो नहीं!...नहीं, नहीं! अब यह कैसे मैं सोचूं...कि आप ‘अल्पज्ञान’ को ही ‘ज्ञान’ समझ रहे हैं...कि आपको दोनों के बीच का अंतर ही नहीं पता! खैर, दोनों ही अर्थों में हमारे लिए तो आगे आप बात करने लायक नहीं..आगे पढ़ूं भी कैसे...उतना समय भी कैसे दूं इतना लंबा उत्तर पढ़ने में..जब मुझे पता है कि आप तो बात करने के लायक ही नहीं! अगर आप बिना सोचे ही 24000 किताबें पढ़ सकते हैं...भले ही बिना समझे उसे बस read किया हो. आपकी महानता की तुलना में मैं ‘तुच्छ अज्ञान’ प्राणी कहां मुकाबला कर पाऊंगी. दूसरी सूरत में, अगर आप अल्पज्ञान (बेवकूफी) के शिकार हैं....तो भी ऐसे में हम अपने से ‘छोटे’ लोगों से बात करना अपनी तौहीन समझते हैं.... आगे अपनी (‘ज्ञान भरी’) समझदारी से आप खुद समझ सकते हैं..अब नहीं कह सकती...कि....’समझ तो तुम गए ही होगे!’..क्योंकि आपकी समझ के एक और उथलेपन का अंदाजा हो गया है..फिर भी एक सरसरी निगाह डाली आपके पूरे जवाब पर...सोचा आपने मेरे लिए इतनी मेहनत की है..मेहनत की कद्र करनी चाहिए..साथ ही ‘experience’ के लिए भी...ताकि ‘अल्पज्ञान’ का level समझ सकूं और भविष्य में (अगर जरूरत पड़ी) अल्पज्ञानियों की श्रेणी का वर्गीकरण करते हुए उनसे बात कर सकूं! खैर, उम्मीद से परे...’बकवाद’ में भी कुछ नया नहीं लिखा आपने...वही सब पुरानी बातें...जिनका जवाब मैं पहले ब्लॉग में ही दे चुकी हूं. ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ का पहला पहलू एक बार फिर आपको समझने की जरूरत है. द्सरा पहलू समझा है अच्छी बात है... लेकिन छोड़कर चलना अच्छी बात नहीं..पहले पहला पहलू तो पूरा समझ लीजिए...कहीं 24000 किताबें भी इसी तरह छोड़-छोड़कर तो नहीं पढ़ी?... कोई नहीं ..’आंख वाला प्रकाश के बारे में भले न सोचे’...लेकिन दिन में भी सोनेवालों को भी दिन गुजर जाने का अफसोस नहीं करना चाहिए. जब जागो तभी सवेरा होता है...इसलिए वो 24000 किताबें अगर आपने ‘छोड़-छोड़कर’ पढ़ी हों और आज भी यही आदत हो...तो कोई बात नहीं ‘ध्यान जी’...50000 पहुंचने से पहले आज से ही इसे पूरा-पूरा पढ़ने की आदत डाल लें..निश्चय ही ‘अल्पज्ञान’ सुधार में लाभ होगा... लेकिन इसमें एक अंदेशा और है...दरअसल होता क्या है...कि अगर आंखों वाला कोई बहुत वक्त तक आंखें मूंदे रहे तो उसे अंधेरे की आदत पड़ जाती है..आंखें खोलने के बाद प्रकाश के वेग को वह सहन कर पाता..ऐसे वक्त में प्रकाश के वेग को सहन न कर पाने के कारण प्राणी के अंधों सा गिड़ने-पड़ने की संभावना होती है... लेकिन यह बस थोड़े वक्त की बात होती है...उस थोड़े समय के कष्ट को सहन कर वह प्राणी वापस प्रकाश किरणों के साथ सामान्य हो जाता है और एक सामान्य जीवन जीने लगता है..किताबें जल्दी-जल्दी छोड़कर पढ़ने के संबंध में भी यह एक ग्रहणीय बात होगी...शुरुआत में यह बहुत बोरिंग लगेगा लेकिन धीरे-धीरे जब आपको इसके लाभ दिखने लगेंगे तो आपको भी यह अच्छा लगने लगेगा... **(शायद शब्दों की सीमा के कारण पूरा जवाब एक में पोस्ट नहीं हो रहा...कल बहुत कोशिश की पर हुआ नहीं...इसलिए अब इसे दो पोस्ट में बांटना पड़ रहा...आगे दूसरे पोस्ट में...) दूसरा पोस्ट: http://shipraparashar.jagranjunction.com/2013/11/17/%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%AB%E0%A5%80-%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%B9%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A6-%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%A8-2/

के द्वारा: Shipra Parashar Shipra Parashar

आदरणीय, सूफी ध्यान मुहम्मद जी ने नाम बदल लिया (1) आपने अपना नाम कब से बदल लिया? मुझे तो पता था कि आपका नाम ‘सूफी ध्यान मुहम्मद’ है!! शिप्रा पाराशर कब से हो गया?खैर..थोड़ा अजीब है लेकिन अपने नाम का कोई और भी देखकर अच्छा लग रहा है...बस ये लड़कियों वाले नाम का एक लड़का देखना बहुत अजीब है....पर कोई नहीं...नाम तो नाम है.... अब मुद्दे पर आते हैं.. ” आपको क्या लगता है महानुभाव, मजे लेना सिर्फ आपको ही आता है..’ध्यान रहित’ सूफी ध्यान मुहम्मद जी, यह तो आपको मेरे पहले ब्लॉग से ही समझ जाना चाहिए था कि उसके बाद मैं जो भी जवाब दूंगी, बस मजे लेने के लिए. क्योंकि आपके ब्लॉग को प्रतिक्रिया (‘प्रतिक्रिया’ के संबंध में आपके विचारों पर हमारे विचार समझाना ही बेवकूफी है) देने लायक तो मैं यूं भी नहीं समझती. फिर भी जवाब (आपके शब्दों में) दिया...ताकि आपको आपकी वास्तविक जगह (भले ही ‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’ को आप चरितार्थ करें और इसे न मानें..और समझकर भी आप नहीं समझें...फिर भी) समझा सकूं. पर उसका जवाब (आपकी तरफ से) तो मैं मजे लेने के लिए ही चाहती थी. वैसे ही जैसे ‘स्वान’ को छोटा पत्थर उठाकर मार दो..और वह आवाजें करता रहेगा..लोग यह सब मजे लेने के लिए ही तो करते हैं! मैं भी वही करती हूं... मुझे लगा शायद आप समझ गए होंगे कि उसके बाद या तो मैं जवाब दूंगी नहीं या दूंगी तो केवल मजे लेने के लिए. अफसोस आप इसे भी नहीं समझ सके. और बता भी दिया कि समझे नहीं. कोई नहीं...आप देते रहें जवाब..हम भी देते रहेंगे..क्योंकि तर्क में सीमाएं होती हैं...कुतर्क में तो कुछ भी बोल सकते हैं...” तो कुतर्कों की श्रेणी में कुतर्क शुरू करते हैं एक बार फिर से आपके महान् उद्धरणों से ही... “जी अवश्य सुनी है..लेकिन किन्ही और अर्थों में, लोगों ने गलत अर्थ दे दिया है इस कहावत को..|” हर बात के दो पहलू होते है। खुशी हुई जानकर...कि आप दूसरे पहलू को भी समझते हैं। पर उससे उसके ‘पहले (एक और पहलू) का अस्तित्व नहीं मिट सकता..उसे अनदेखा नहीं कर सकते.. “जो जानता है वो सोचता नहीं है, और जो सोचता है वो जानता नहीं है…! “ सूफी जी! सूफी जी! सूफी जी!...उफ्फ! आपसे यही उम्मीद थी..और उसे न तोड़ते हुए उम्मीदों पर खरा उतरे हैं आप! ‘खुशफहमी’ कहते हैं वैसे ऐसे हालात को!...’सोचने’ और ‘जानने’ की प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है। ‘सोचने’ और ‘जानने’ में एक ‘अन्योन्याश्रय संबंध’ है। इसे थोड़ा खींचना पड़ेगा...क्योंकि मुझे पूरा विश्वास है आप इसे समझेंगे नहीं... पहला, ‘सोचने’ की प्रक्रिया के बिना ‘जानना’ संभव नहीं. क्योंकि ‘सोच’ ‘बुद्धि’ का परिचायक है (अब चाहे कैसी भी बुद्धि हो..छोटी-बड़ी, बुद्धिमान-बेवकूफ)..लेकिन ‘सोच’ सबमें होगी. उसी सोच के अनुसार हम बातें ग्रहण करते हैं. जहां तक ‘जानने’ का सवाल है..हे ज्ञानी महानुभाव! ‘सोच के बिना तो जानना संभव ही नहीं!’ ‘जिस खाली दिमाग शैतान का घर’ का आपने उल्लेख किया है....वह शैतान भी तो सोच ही है...’ वह सोच ही तो है जो आपमें जानने की कौतूहल पैदा करता है..यह सोच ही तो है जो आपमें ‘थोड़ा-बहुत’ ‘फ्रायड’ और ‘रजनीश’ को पढ़ने का शौक पैदा करता है. यह सोच ही तो है जो आपको 24000 किताबें पढ़कर ‘खुद में ‘सबकुछ जान लेने का वहम’ पैदा करता है. देखिए! हर जगह सोच ही है..सूफी जी (माफ करना भाई, अभी ‘शिप्रा जी’ बोलने की आदत नहीं पड़ी है..एक तो यूं ही किसी का बदला हुआ नाम लेकर उसे बुलाना थोड़ा मुश्किल होता है..उसपर भी अपने ही नाम से किसी और को बुलाना.....थोड़ा अजीब होता है..इसलिए इसकी आदत डालने में थोड़ा वक्त लगेगा...लेकिन 2-3 कमेंट और लिखूं अगर तो शायद आदत पड़ जाए...)! खासकर जहां भी ‘जानने’ (ज्ञान) और ‘जानने की प्रक्रिया (ज्ञान पाने की प्रक्रिया)’ है, वहां ‘सोच’ जरूर है. हैरानी हो रही है...’सोचकर’...सचमुच! आश्चर्यजनक! बेहद आश्चर्यजनक!...आप तो अपने आप को ज्ञानी बताते हैं! हे दैव! कृपया बताएं कि आपने ‘सोचे बिना’ इतना जाना कैसे?...किस प्रकार इतना ज्ञान अर्जित किया...या कहीं...यह ज्ञान ‘अल्पज्ञान’ तो नहीं!...नहीं, नहीं! अब यह कैसे मैं सोचूं...कि आप ‘अल्पज्ञान’ को ही ‘ज्ञान’ समझ रहे हैं...कि आपको दोनों के बीच का अंतर ही नहीं पता! खैर, दोनों ही अर्थों में हमारे लिए तो आगे आप बात करने लायक नहीं..आगे पढ़ूं भी कैसे...उतना समय भी कैसे दूं इतना लंबा उत्तर पढ़ने में..जब मुझे पता है कि आप तो बात करने के लायक ही नहीं! अगर आप बिना सोचे ही 24000 किताबें पढ़ सकते हैं...भले ही बिना समझे उसे बस read किया हो. आपकी महानता की तुलना में मैं ‘तुच्छ अज्ञान’ प्राणी कहां मुकाबला कर पाऊंगी. दूसरी सूरत में, अगर आप अल्पज्ञान (बेवकूफी) के शिकार हैं....तो भी ऐसे में हम अपने से ‘छोटे’ लोगों से बात करना अपनी तौहीन समझते हैं.... आगे अपनी (‘ज्ञान भरी’) समझदारी से आप खुद समझ सकते हैं..अब नहीं कह सकती...कि....’समझ तो तुम गए ही होगे!’..क्योंकि आपकी समझ के एक और उथलेपन का अंदाजा हो गया है..फिर भी एक सरसरी निगाह डाली आपके पूरे जवाब पर...सोचा आपने मेरे लिए इतनी मेहनत की है..मेहनत की कद्र करनी चाहिए..साथ ही ‘experience’ के लिए भी...ताकि ‘अल्पज्ञान’ का level समझ सकूं और भविष्य में (अगर जरूरत पड़ी) अल्पज्ञानियों की श्रेणी का वर्गीकरण करते हुए उनसे बात कर सकूं! खैर, उम्मीद से परे...’बकवाद’ में भी कुछ नया नहीं लिखा आपने...वही सब पुरानी बातें...जिनका जवाब मैं पहले ब्लॉग में ही दे चुकी हूं. ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ का पहला पहलू एक बार फिर आपको समझने की जरूरत है. द्सरा पहलू समझा है अच्छी बात है... लेकिन छोड़कर चलना अच्छी बात नहीं..पहले पहला पहलू तो पूरा समझ लीजिए...कहीं 24000 किताबें भी इसी तरह छोड़-छोड़कर तो नहीं पढ़ी?... कोई नहीं ..’आंख वाला प्रकाश के बारे में भले न सोचे’...लेकिन दिन में भी सोनेवालों को भी दिन गुजर जाने का अफसोस नहीं करना चाहिए. जब जागो तभी सवेरा होता है...इसलिए वो 24000 किताबें अगर आपने ‘छोड़-छोड़कर’ पढ़ी हों और आज भी यही आदत हो...तो कोई बात नहीं ‘ध्यान जी’...50000 पहुंचने से पहले आज से ही इसे पूरा-पूरा पढ़ने की आदत डाल लें..निश्चय ही ‘अल्पज्ञान’ सुधार में लाभ होगा... लेकिन इसमें एक अंदेशा और है...दरअसल होता क्या है...कि अगर आंखों वाला कोई बहुत वक्त तक आंखें मूंदे रहे तो उसे अंधेरे की आदत पड़ जाती है..आंखें खोलने के बाद प्रकाश के वेग को वह सहन कर पाता..ऐसे वक्त में प्रकाश के वेग को सहन न कर पाने के कारण प्राणी के अंधों सा गिड़ने-पड़ने की संभावना होती है... लेकिन यह बस थोड़े वक्त की बात होती है...उस थोड़े समय के कष्ट को सहन कर वह प्राणी वापस प्रकाश किरणों के साथ सामान्य हो जाता है और एक सामान्य जीवन जीने लगता है..किताबें जल्दी-जल्दी छोड़कर पढ़ने के संबंध में भी यह एक ग्रहणीय बात होगी...शुरुआत में यह बहुत बोरिंग लगेगा लेकिन धीरे-धीरे जब आपको इसके लाभ दिखने लगेंगे तो आपको भी यह अच्छा लगने लगेगा... **(शायद शब्दों की सीमा के कारण पूरा जवाब एक में पोस्ट नहीं हो रहा...कल बहुत कोशिश की पर हुआ नहीं...इसलिए अब इसे दो पोस्ट में बांटना पड़ रहा...आगे दूसरे पोस्ट में...) दूसरा पोस्ट: http://shipraparashar.jagranjunction.com/2013/11/17/%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%AB%E0%A5%80-%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%B9%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A6-%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%A8-2/

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आदरणीय, सूफी ध्यान मुहम्मद जी ने नाम बदल लिया http://shipraparashar.jagranjunction.com/2013/11/17/%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%AB%E0%A5%80-%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%B9%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A6-%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%A8/ http://shipraparashar.jagranjunction.com/2013/11/17/%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%AB%E0%A5%80-%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%B9%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A6-%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%A8-2/ (1) आपने अपना नाम कब से बदल लिया? मुझे तो पता था कि आपका नाम ‘सूफी ध्यान मुहम्मद’ है!! शिप्रा पाराशर कब से हो गया?खैर..थोड़ा अजीब है लेकिन अपने नाम का कोई और भी देखकर अच्छा लग रहा है...बस ये लड़कियों वाले नाम का एक लड़का देखना बहुत अजीब है....पर कोई नहीं...नाम तो नाम है.... अब मुद्दे पर आते हैं.. ” आपको क्या लगता है महानुभाव, मजे लेना सिर्फ आपको ही आता है..’ध्यान रहित’ सूफी ध्यान मुहम्मद जी, यह तो आपको मेरे पहले ब्लॉग से ही समझ जाना चाहिए था कि उसके बाद मैं जो भी जवाब दूंगी, बस मजे लेने के लिए. क्योंकि आपके ब्लॉग को प्रतिक्रिया (‘प्रतिक्रिया’ के संबंध में आपके विचारों पर हमारे विचार समझाना ही बेवकूफी है) देने लायक तो मैं यूं भी नहीं समझती. फिर भी जवाब (आपके शब्दों में) दिया...ताकि आपको आपकी वास्तविक जगह (भले ही ‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’ को आप चरितार्थ करें और इसे न मानें..और समझकर भी आप नहीं समझें...फिर भी) समझा सकूं. पर उसका जवाब (आपकी तरफ से) तो मैं मजे लेने के लिए ही चाहती थी. वैसे ही जैसे ‘स्वान’ को छोटा पत्थर उठाकर मार दो..और वह आवाजें करता रहेगा..लोग यह सब मजे लेने के लिए ही तो करते हैं! मैं भी वही करती हूं... मुझे लगा शायद आप समझ गए होंगे कि उसके बाद या तो मैं जवाब दूंगी नहीं या दूंगी तो केवल मजे लेने के लिए. अफसोस आप इसे भी नहीं समझ सके. और बता भी दिया कि समझे नहीं. कोई नहीं...आप देते रहें जवाब..हम भी देते रहेंगे..क्योंकि तर्क में सीमाएं होती हैं...कुतर्क में तो कुछ भी बोल सकते हैं...” तो कुतर्कों की श्रेणी में कुतर्क शुरू करते हैं एक बार फिर से आपके महान् उद्धरणों से ही... “जी अवश्य सुनी है..लेकिन किन्ही और अर्थों में, लोगों ने गलत अर्थ दे दिया है इस कहावत को..|” हर बात के दो पहलू होते है। खुशी हुई जानकर...कि आप दूसरे पहलू को भी समझते हैं। पर उससे उसके ‘पहले (एक और पहलू) का अस्तित्व नहीं मिट सकता..उसे अनदेखा नहीं कर सकते.. “जो जानता है वो सोचता नहीं है, और जो सोचता है वो जानता नहीं है…! “ सूफी जी! सूफी जी! सूफी जी!...उफ्फ! आपसे यही उम्मीद थी..और उसे न तोड़ते हुए उम्मीदों पर खरा उतरे हैं आप! ‘खुशफहमी’ कहते हैं वैसे ऐसे हालात को!...’सोचने’ और ‘जानने’ की प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है। ‘सोचने’ और ‘जानने’ में एक ‘अन्योन्याश्रय संबंध’ है। इसे थोड़ा खींचना पड़ेगा...क्योंकि मुझे पूरा विश्वास है आप इसे समझेंगे नहीं... पहला, ‘सोचने’ की प्रक्रिया के बिना ‘जानना’ संभव नहीं. क्योंकि ‘सोच’ ‘बुद्धि’ का परिचायक है (अब चाहे कैसी भी बुद्धि हो..छोटी-बड़ी, बुद्धिमान-बेवकूफ)..लेकिन ‘सोच’ सबमें होगी. उसी सोच के अनुसार हम बातें ग्रहण करते हैं. जहां तक ‘जानने’ का सवाल है..हे ज्ञानी महानुभाव! ‘सोच के बिना तो जानना संभव ही नहीं!’ ‘जिस खाली दिमाग शैतान का घर’ का आपने उल्लेख किया है....वह शैतान भी तो सोच ही है...’ वह सोच ही तो है जो आपमें जानने की कौतूहल पैदा करता है..यह सोच ही तो है जो आपमें ‘थोड़ा-बहुत’ ‘फ्रायड’ और ‘रजनीश’ को पढ़ने का शौक पैदा करता है. यह सोच ही तो है जो आपको 24000 किताबें पढ़कर ‘खुद में ‘सबकुछ जान लेने का वहम’ पैदा करता है. देखिए! हर जगह सोच ही है..सूफी जी (माफ करना भाई, अभी ‘शिप्रा जी’ बोलने की आदत नहीं पड़ी है..एक तो यूं ही किसी का बदला हुआ नाम लेकर उसे बुलाना थोड़ा मुश्किल होता है..उसपर भी अपने ही नाम से किसी और को बुलाना.....थोड़ा अजीब होता है..इसलिए इसकी आदत डालने में थोड़ा वक्त लगेगा...लेकिन 2-3 कमेंट और लिखूं अगर तो शायद आदत पड़ जाए...)! खासकर जहां भी ‘जानने’ (ज्ञान) और ‘जानने की प्रक्रिया (ज्ञान पाने की प्रक्रिया)’ है, वहां ‘सोच’ जरूर है. हैरानी हो रही है...’सोचकर’...सचमुच! आश्चर्यजनक! बेहद आश्चर्यजनक!...आप तो अपने आप को ज्ञानी बताते हैं! हे दैव! कृपया बताएं कि आपने ‘सोचे बिना’ इतना जाना कैसे?...किस प्रकार इतना ज्ञान अर्जित किया...या कहीं...यह ज्ञान ‘अल्पज्ञान’ तो नहीं!...नहीं, नहीं! अब यह कैसे मैं सोचूं...कि आप ‘अल्पज्ञान’ को ही ‘ज्ञान’ समझ रहे हैं...कि आपको दोनों के बीच का अंतर ही नहीं पता! खैर, दोनों ही अर्थों में हमारे लिए तो आगे आप बात करने लायक नहीं..आगे पढ़ूं भी कैसे...उतना समय भी कैसे दूं इतना लंबा उत्तर पढ़ने में..जब मुझे पता है कि आप तो बात करने के लायक ही नहीं! अगर आप बिना सोचे ही 24000 किताबें पढ़ सकते हैं...भले ही बिना समझे उसे बस read किया हो. आपकी महानता की तुलना में मैं ‘तुच्छ अज्ञान’ प्राणी कहां मुकाबला कर पाऊंगी. दूसरी सूरत में, अगर आप अल्पज्ञान (बेवकूफी) के शिकार हैं....तो भी ऐसे में हम अपने से ‘छोटे’ लोगों से बात करना अपनी तौहीन समझते हैं.... आगे अपनी (‘ज्ञान भरी’) समझदारी से आप खुद समझ सकते हैं..अब नहीं कह सकती...कि....’समझ तो तुम गए ही होगे!’..क्योंकि आपकी समझ के एक और उथलेपन का अंदाजा हो गया है..फिर भी एक सरसरी निगाह डाली आपके पूरे जवाब पर...सोचा आपने मेरे लिए इतनी मेहनत की है..मेहनत की कद्र करनी चाहिए..साथ ही ‘experience’ के लिए भी...ताकि ‘अल्पज्ञान’ का level समझ सकूं और भविष्य में (अगर जरूरत पड़ी) अल्पज्ञानियों की श्रेणी का वर्गीकरण करते हुए उनसे बात कर सकूं! खैर, उम्मीद से परे...’बकवाद’ में भी कुछ नया नहीं लिखा आपने...वही सब पुरानी बातें...जिनका जवाब मैं पहले ब्लॉग में ही दे चुकी हूं. ‘अधजल गगरी छलकत जाय’ का पहला पहलू एक बार फिर आपको समझने की जरूरत है. द्सरा पहलू समझा है अच्छी बात है... लेकिन छोड़कर चलना अच्छी बात नहीं..पहले पहला पहलू तो पूरा समझ लीजिए...कहीं 24000 किताबें भी इसी तरह छोड़-छोड़कर तो नहीं पढ़ी?... कोई नहीं ..’आंख वाला प्रकाश के बारे में भले न सोचे’...लेकिन दिन में भी सोनेवालों को भी दिन गुजर जाने का अफसोस नहीं करना चाहिए. जब जागो तभी सवेरा होता है...इसलिए वो 24000 किताबें अगर आपने ‘छोड़-छोड़कर’ पढ़ी हों और आज भी यही आदत हो...तो कोई बात नहीं ‘ध्यान जी’...50000 पहुंचने से पहले आज से ही इसे पूरा-पूरा पढ़ने की आदत डाल लें..निश्चय ही ‘अल्पज्ञान’ सुधार में लाभ होगा... लेकिन इसमें एक अंदेशा और है...दरअसल होता क्या है...कि अगर आंखों वाला कोई बहुत वक्त तक आंखें मूंदे रहे तो उसे अंधेरे की आदत पड़ जाती है..आंखें खोलने के बाद प्रकाश के वेग को वह सहन कर पाता..ऐसे वक्त में प्रकाश के वेग को सहन न कर पाने के कारण प्राणी के अंधों सा गिड़ने-पड़ने की संभावना होती है... लेकिन यह बस थोड़े वक्त की बात होती है...उस थोड़े समय के कष्ट को सहन कर वह प्राणी वापस प्रकाश किरणों के साथ सामान्य हो जाता है और एक सामान्य जीवन जीने लगता है..किताबें जल्दी-जल्दी छोड़कर पढ़ने के संबंध में भी यह एक ग्रहणीय बात होगी...शुरुआत में यह बहुत बोरिंग लगेगा लेकिन धीरे-धीरे जब आपको इसके लाभ दिखने लगेंगे तो आपको भी यह अच्छा लगने लगेगा... **(शायद शब्दों की सीमा के कारण पूरा जवाब एक में पोस्ट नहीं हो रहा...कल बहुत कोशिश की पर हुआ नहीं...इसलिए अब इसे दो पोस्ट में बांटना पड़ रहा...आगे दूसरे पोस्ट में...) दूसरा पोस्ट: http://shipraparashar.jagranjunction.com/2013/11/17/%E0%A4%B8%E0%A5%82%E0%A4%AB%E0%A5%80-%E0%A4%A7%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%B9%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AE%E0%A4%A6-%E0%A4%9C%E0%A5%80-%E0%A4%A8%E0%A5%87-%E0%A4%A8-2/

के द्वारा: Shipra Parashar Shipra Parashar

sarita sinha 56 minutes ago संदीप जी...ये सच है कि आपके आलेख बकवास नही होते वरन उनमे एक गूढ़ार्थ छुपा होता है..फिर भी व्यक्ति विशेष का नाम लेने से आप चक्कर मे फँस गये..युगांतरकारी पुरुषों को उनका सम्मान ज़रा देर से मिलता है..कृष्ण अर्जुन संवाद को "गीता" का रूप लेने मे हज़ारों साल लग गये..गीता क़ुरान की बातचीत अगर बकवास होती तो आज उसको ये सम्माननीय स्थान ना प्राप्त होता ....वहाँ किसी ने लड़ लड़ कर अपने लिए स्थान नही माँगा बल्कि उपयोगिता समझ मे आने से खुद बखुद दर्जा मिला...उसी तरह आपको अपने विचारों को स्थान दिलाने के लिए लड़ने की ज़रूरत नही है, वे प्रासंगिक होंगे तो लोग खुद बखुद अहमियत समझेंगे....व्यक्ति से ही समाज बना है...चार घरों से चार व्यक्ति शिक्षित हो कर आयेंगे तो एक शिक्षित समाज अपने आप बन जाएगा..समाज एकअमूर्त अवधारणा है, जबकि परिवार मूर्त है...इसीलिए कोई ना तो समाज से शादी कर सकता है और ना ही शिक्षा दे सकता है...हम परिवार की परिकल्पना करके समाज का निर्माण करते हैं..आप बिगड़े कब हैं जो आपको सुधरने की चाह लगी है...अभी आप की सूफ़िगिरी अधूरी है क्योंकि आप व्यक्तिगत आक्षेप से भड़क उठते हैं.....ये सूफ़ियों का नहीं बल्कि अघोरियों का काम है.. ऐसा तब होता है जब कोई जानबूझ कर क्रोध में उतरा हो बाहर से थोपा गया क्रोध सूफ़ी के दरवाज़े तक नही पहुच सकता.... हाँ, आपकी पोस्ट हटाना एक भीरू निर्णय है....मेरे विचार से सब को अपने अपने द्वारा अर्जित पुण्य पाप का लेखा जोखा जानने का अधिकार है और जो अपनी आंतरिक भावनाओं को दूसरे के सामने रख कर और उस पर चर्चा परिचर्चा कर के ही पाया जा सकता है.... मेरा आडमिन से अनुरोध है कि जब तक शिप्रा जी विरोध ना करें तब तक उक्त पोस्ट को स्वस्थ परिचर्चा के लिए खोल दिया जाए....क्योंकि "तोता कितनी भी संस्कृत सीख ले, कोन्चे जाने पर टें टें ही करता है".....अर्थात बातचीत के द्वारा ही किसी की असलियत को जाना जा सकता है.

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

मियां, गलत लड़की से तुम पंगा ले रहे हो..!! ऐसे ही तुम्हारी TRP डाउन चल रही है..! फस गए तुम, तुम गए अब काम से...अच्छी मुसीबत तुमने मोल ले ली..!! इनका काम ही है तुम जैसे असामाजिक तत्वों को चुन चुन कर सबक सीखना..!! जेजे से पंगा लिए तुम मैं ने कुछ नहीं बोला तुमको, लेकिन इस बार चुप नहीं रहूँगा मैं, अभी भी मौका है, माफ़ी मांग लो शिप्रा जी से..!! वैसे ये तुमको माफ़ तो नहीं करेंगी क्योंकि अगर इनको एक बार गुस्सा आ जाता है तो फिर ये तीन दिन तक शांत नहीं होती हैं..!! लेकिन तुम अपनी तरफ से कोशिश कर के देख लो कहीं बात बन जाये...!! मुझे इनके द्वारा तुम्हारी फ़ज़ीहत होता देख कर अच्छा नहीं लगेगा..., मैं दिल पर ले लूंगा फिर बातों को..!! चलो अब इनको सॉरी बोलो...!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

अनिल कुमार जी,नमस्कार,.....विगत एक वर्ष से मैं हर दिन यही बात सोचती थी कि पोस्ट डिलीट करवाना कोई छोटी बात नहीं थी , आप उस घटना को भूल कर मुझसे प्रेमपूर्वक सामान्य वार्तालाप कैसे कर लेते हैं...आज आप कि इस प्रतिक्रिया से मुझे मेरी बात का जवाब मिला....मुझे सब याद है लेकिन आप भूल रहे हैं..मेरा किसी महिला मुक्ति मोर्चा से कोई सम्बन्ध नहीं है मैं इस किस्म के ढोंग में विश्वास नहीं रखती ...मुझे आपकी उस पोस्ट में व्यक्त विचार निहायत घटिया फूहड़ और वाहियात लगे ...फिर भी 48 घंटों तक मैं ने किसी बुद्धिजीवी की आवाज़ का इंतज़ार किया लेकिन जब देखा कि लोग अंधे हो कर हाँ में हाँ मिला रहे हैं तो मैं ने बिना किसी की सलाह लिए अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर जे जे के फीडबैक पर उस पोस्ट को हटाने के लिए लिखा...उस समय मुझे ये याद नहीं था कि मैं स्त्री हूँ या पुरुष ..सिर्फ गलत बात दिखाई दे रही थी....और हाँ .....आपकी उस पोस्ट की कॉपी अभी भी मेरे पास मौजूद है इसलिए ये तो भूल कर भी मत घोषित करियेगा कि वो किस बारे में थी....ऑनर किलिंग था या क्या टॉपिक था ??कहिये याद है या मैं याद दिलाऊँ........ ये बात केवल उसी विशेष पोस्ट के लिए थी शेष मैं हमेशा आपके लेखन की प्रशंसक रही हूँ....लेकिन दुःख है कि आपकी प्रतिभा का न जाने किस कारणवश क्षरण हो रहा है...... समर्थ किसे कह रहे हैं....कोई यहाँ समर्थ नहीं है...खुद मेरे इतने विरोधी यहाँ मौजूद हैं , क्यूंकि मैं कोई गलत बात होती देख कर खामखा उसमे कूद पड़ती हूँ चाहे उससे मेरा मतलब हो या नहीं.......गन्दी आदत है, छोड़ना चाहती हूँ, प्रार्थना करिये कि छूट जाये......

के द्वारा: sinsera sinsera

के द्वारा: Shipra Parashar Shipra Parashar

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सूफी ध्यान मुहम्मद जी को समर्पित एक और ब्लॉग…..(http://shipraparashar.jagranjunction.com/2013/11/15/%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%97-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%B8%E0%A4%BE-%E0%A4%AD%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%B9/) पाठकों के लिए: पहली बात तो आपको ध्यान दिला दूं..कि मैं कोई गुमनाम नहीं…मेरा नाम शिप्रा पाराशर है….कमेंट का तो मुझे नहीं पता…शायद यह जंक्शन की प्रोब्लेम है…कल आपके पोस्ट पर भी कमेंट न जाने के कारण इसे मुझे अपने पोस्ट में शामिल करना पड़ा…और आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि मैं जागरण जंक्शन मंच पर पिछले 6 माह से रजिस्टर्ड हूं…यह और बात है कि समय की कमी के कारण ब्लॉग पर कोई पोस्ट नहीं डाल सकी थी…संयोग कहें या मेरा अहोभाग्य…आपका जवाब ही मेरा पहला ब्लॉग पोस्ट बन गया है…और अब दूसरा भी…क्योंकि कमेंट पोस्ट में हाइलाइटेड शब्द आप देख नहीं पाएंगे…शुक्रिया तो मैं क्या कहूं…आगे…. यहां मैं अपनी तरफ से कोई कहावत नहीं कह रही..आपके ही ब्लॉग पर आपके ही द्वारा उपयोग किया ‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’ इस्तेमाल करना एकदम सही लग रहा है. शायद आपने मेरा जवाबी ब्लॉग ध्यान से नहीं पढ़ा या शायद उसे पढ़कर आपके दिमाग के अंदर भरे भूसे में आग लग गई है कि आप ऐसी बेतुकी बातें कर रहे हैं. बेसिर-पैर की बातें कौन कह रहा है यह तो आपको भी पता होगा…आप अपनी इन लाइनों को एक बार फिर ध्यान से पढ़िए…आप खुद ही समझ जाएंगे कि यह आपकी किस मानसिक अवस्था का आभास कराती है. तो आप महिला हैं…पक्का..या ये भी मानना ही पड़ेगा…??? चलिए ये भी मान लेता हूँ…लेकिन मैं आप को पूर्ण-स्त्री नहीं मान सकता हूँ, उम्म्म क्या करें….क्या करें…हाँ…एक काम करता हूँ, आपको मैं एक ऐसी स्त्री मान लेता हूँ जिसका चित्त पुरुषों जैसा है…ये सही रहेगा…!!! भाई आपकी यह थीसिस क्या है हमें समझ नहीं आई. खैर यह आपकी किसी मानसिक अवस्था का आभास कराती है…. कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको ‘बेसिर-पैर की बातों’ का अर्थ ही पता नहीं..उफ्फ..तब तो वैसे भी कुछ नहीं कह सकते… आप कह रही हैं तो झूठ थोड़े न कह रही होंगी मैं आपके पीछे घटी किसी घटना का वर्णन नहीं कर रही कि झूठ या सच बताउंगी..और आप मुझपर विश्वास दिखाकर इसे सच मानने का एहसान जता रहे हैं. भाई जब विचारों की बात आती है तो केवल ‘सही और गलत’ हो सकता है..’झूठ या सच’ नहीं! खैर…आपसे अपेक्षित हो सकता है यह सब… अपनी खुली आँखों से जो पहली चीज मैं देख रहा हूँ वो ये है कि न तो आप महिला हैं और न ही कोई ब्लॉगर, सेकंड थिंग- आपकी समझदानी बहुत छोटी है..सच कह रहा हूँ, मैं आपके दिमाग के अंदर देख सकता हूँ सब खली है…वहाँ कुछ भी नहीं है…हो सके तो इसमें थोडा भूसा बार लीजिये क्योंकि खाली मन शैतान का घर होता है, सुना तो होगा ही आपने ये कहावत !! हे अंतर्यामी! यह तो मैंने कल ही मान लिया था कि आप अंतर्यामी हैं…फिर भी मेरी उस उक्ति के स्पष्टीकरण के लिए धन्यवाद! पहली बात के लिए भी भाई मेरे…क्या कहूं…मेरा पहला जवाब दुबारा कहना चाहूंगी..( भाई आपकी यह थीसिस क्या है हमें समझ नहीं आई. खैर यह आपकी किसी मानसिक अवस्था का आभास कराती है.) अन्य बातों के बारे में भी क्या कहूं… मेरे ब्लॉग पर जो कुछ लिखा था कल, आपने शायद उसे ध्यान से पढ़ा ही नहीं…या शायद यह सब आप ‘अपने विषय में लिखना चाहते होंगे…पर लिख न सके होंगे तो यहां पेस्ट कर दिया.. और ये क्या उलूल-जुलूल बच्चों जैसी पोस्ट लिखा है आपने, न इस पोस्ट का कोई सिर है न ही पैर है… छोटी समझ में अक्सर बड़ी बातें समझ नहीं आतीं..कोई बात नहीं हमें आपकी अवस्था का भान है. …’What a joke..!!! Are you alright or have become senseless…???? If I am answering you..I can’t say that I’m alright Mr. Sufi Dhyan Muhammad…But I wanted to ask you the same question… …’What a joke..!!! Are you alright or have become senseless…???? ऐसा अनर्गल, बेतुका, बेहूदा, बेमतलब का पोस्ट मैं ने आज तक नहीं पढ़ा था..! यह भी शायद अपने ही पोस्ट के लिए कहना चाहते होंगे…अक्सर हम जिन बातों को अपने लिए स्वीकार नहीं कर पाते, किसी से संबद्ध कर बोल देते हैं…कोई बात नहीं हम समझ सकते हैं. आप अगर मुझे से तार्किक और सांगत जवाब की अपेक्षा करती हैं तो सब से पहले अपनी पहचान को सार्वजानिक कीजिये और फिर मुझ से बात कीजिये..!!! नमुनागिरी मुझे पसंद है लेकिन इससे ज्यादा नहीं…!!! सूफी जी…सूफी जी…सूफी जी…पहली बार आपकी किसी बात से सहमत हूं ..”नमूनागिरी मुझे पसंद है लेकिन इससे ज्यादा नहीं”…भाई मेरे, इतना समय लगा टाइप करने में..आपके बहुमूल्य सवालों के जवाब देने में…और आपने उसे ध्यान से पढ़ा नहीं!…यह उम्मीद तो वाकई नहीं थी आपसे.. किस तरह समझाऊं कि मुझे आपसे तार्किक बातों और तर्कसंगत जवाबों की अपेक्षा नहीं है….आपके ब्लॉग पर इमाम हुसैन क़ादरी जी का कमेंट पढ़ा था…उसके कुछ शब्द उपयोग करना चाहूंगी…..”ध्यान जी…किस ध्यान में हैं”….और कहना चाहूंगी… “ध्यान जी…किस ध्यान में हैं!”…एक बार ध्यान से मेरा जवाब तो पढ़ लिया होता!…फिर ‘तार्किक और तर्कसंगत जवाबों की अपेक्षा’ का सवाल करते… सब आपकी महान लेख पर हंस रहे हैं….!!! समझ तो तुम गए ही होगे!” एक ही बात बार-बार दुहराना अच्छा तो नहीं लग रहा लेकिन क्या करूं…इसलिए फिर से कहना चाहूंगी… ”यह भी शायद अपने ही पोस्ट के लिए कहना चाहते होंगे…अक्सर हम जिन बातों को अपने लिए स्वीकार नहीं कर पाते, किसी से संबद्ध कर बोल देते हैं…कोई बात नहीं हम समझ सकते हैं”..जहां तक आपका सवाल है… समझ तो तुम गए ही होगे!

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सूफी ध्यान मुहम्मद जी को समर्पित एक और ब्लॉग.....(http://shipraparashar.jagranjunction.com/2013/11/15/%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%B8%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%97-%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82-%E0%A4%AD%E0%A5%82%E0%A4%B8%E0%A4%BE-%E0%A4%AD%E0%A4%B0%E0%A4%BE-%E0%A4%B9/) पाठकों के लिए: पहली बात तो आपको ध्यान दिला दूं..कि मैं कोई गुमनाम नहीं...मेरा नाम शिप्रा पाराशर है....कमेंट का तो मुझे नहीं पता...शायद यह जंक्शन की प्रोब्लेम है...कल आपके पोस्ट पर भी कमेंट न जाने के कारण इसे मुझे अपने पोस्ट में शामिल करना पड़ा...और आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि मैं जागरण जंक्शन मंच पर पिछले 6 माह से रजिस्टर्ड हूं...यह और बात है कि समय की कमी के कारण ब्लॉग पर कोई पोस्ट नहीं डाल सकी थी...संयोग कहें या मेरा अहोभाग्य...आपका जवाब ही मेरा पहला ब्लॉग पोस्ट बन गया है...और अब दूसरा भी...क्योंकि कमेंट पोस्ट में हाइलाइटेड शब्द आप देख नहीं पाएंगे...शुक्रिया तो मैं क्या कहूं...आगे.... यहां मैं अपनी तरफ से कोई कहावत नहीं कह रही..आपके ही ब्लॉग पर आपके ही द्वारा उपयोग किया ‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’ इस्तेमाल करना एकदम सही लग रहा है. शायद आपने मेरा जवाबी ब्लॉग ध्यान से नहीं पढ़ा या शायद उसे पढ़कर आपके दिमाग के अंदर भरे भूसे में आग लग गई है कि आप ऐसी बेतुकी बातें कर रहे हैं. बेसिर-पैर की बातें कौन कह रहा है यह तो आपको भी पता होगा…आप अपनी इन लाइनों को एक बार फिर ध्यान से पढ़िए...आप खुद ही समझ जाएंगे कि यह आपकी किस मानसिक अवस्था का आभास कराती है. तो आप महिला हैं…पक्का..या ये भी मानना ही पड़ेगा…??? चलिए ये भी मान लेता हूँ…लेकिन मैं आप को पूर्ण-स्त्री नहीं मान सकता हूँ, उम्म्म क्या करें….क्या करें…हाँ…एक काम करता हूँ, आपको मैं एक ऐसी स्त्री मान लेता हूँ जिसका चित्त पुरुषों जैसा है…ये सही रहेगा…!!! भाई आपकी यह थीसिस क्या है हमें समझ नहीं आई. खैर यह आपकी किसी मानसिक अवस्था का आभास कराती है.... कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको ‘बेसिर-पैर की बातों’ का अर्थ ही पता नहीं..उफ्फ..तब तो वैसे भी कुछ नहीं कह सकते... आप कह रही हैं तो झूठ थोड़े न कह रही होंगी मैं आपके पीछे घटी किसी घटना का वर्णन नहीं कर रही कि झूठ या सच बताउंगी..और आप मुझपर विश्वास दिखाकर इसे सच मानने का एहसान जता रहे हैं. भाई जब विचारों की बात आती है तो केवल ‘सही और गलत’ हो सकता है..’झूठ या सच’ नहीं! खैर...आपसे अपेक्षित हो सकता है यह सब... अपनी खुली आँखों से जो पहली चीज मैं देख रहा हूँ वो ये है कि न तो आप महिला हैं और न ही कोई ब्लॉगर, सेकंड थिंग- आपकी समझदानी बहुत छोटी है..सच कह रहा हूँ, मैं आपके दिमाग के अंदर देख सकता हूँ सब खली है…वहाँ कुछ भी नहीं है…हो सके तो इसमें थोडा भूसा बार लीजिये क्योंकि खाली मन शैतान का घर होता है, सुना तो होगा ही आपने ये कहावत !! हे अंतर्यामी! यह तो मैंने कल ही मान लिया था कि आप अंतर्यामी हैं...फिर भी मेरी उस उक्ति के स्पष्टीकरण के लिए धन्यवाद! पहली बात के लिए भी भाई मेरे...क्या कहूं...मेरा पहला जवाब दुबारा कहना चाहूंगी..( भाई आपकी यह थीसिस क्या है हमें समझ नहीं आई. खैर यह आपकी किसी मानसिक अवस्था का आभास कराती है.) अन्य बातों के बारे में भी क्या कहूं... मेरे ब्लॉग पर जो कुछ लिखा था कल, आपने शायद उसे ध्यान से पढ़ा ही नहीं...या शायद यह सब आप ‘अपने विषय में लिखना चाहते होंगे...पर लिख न सके होंगे तो यहां पेस्ट कर दिया.. और ये क्या उलूल-जुलूल बच्चों जैसी पोस्ट लिखा है आपने, न इस पोस्ट का कोई सिर है न ही पैर है… छोटी समझ में अक्सर बड़ी बातें समझ नहीं आतीं..कोई बात नहीं हमें आपकी अवस्था का भान है. …’What a joke..!!! Are you alright or have become senseless…???? If I am answering you..I can’t say that I’m alright Mr. Sufi Dhyan Muhammad…But I wanted to ask you the same question… …’What a joke..!!! Are you alright or have become senseless…???? ऐसा अनर्गल, बेतुका, बेहूदा, बेमतलब का पोस्ट मैं ने आज तक नहीं पढ़ा था..! यह भी शायद अपने ही पोस्ट के लिए कहना चाहते होंगे...अक्सर हम जिन बातों को अपने लिए स्वीकार नहीं कर पाते, किसी से संबद्ध कर बोल देते हैं...कोई बात नहीं हम समझ सकते हैं. आप अगर मुझे से तार्किक और सांगत जवाब की अपेक्षा करती हैं तो सब से पहले अपनी पहचान को सार्वजानिक कीजिये और फिर मुझ से बात कीजिये..!!! नमुनागिरी मुझे पसंद है लेकिन इससे ज्यादा नहीं…!!! सूफी जी...सूफी जी...सूफी जी...पहली बार आपकी किसी बात से सहमत हूं ..”नमूनागिरी मुझे पसंद है लेकिन इससे ज्यादा नहीं”...भाई मेरे, इतना समय लगा टाइप करने में..आपके बहुमूल्य सवालों के जवाब देने में...और आपने उसे ध्यान से पढ़ा नहीं!...यह उम्मीद तो वाकई नहीं थी आपसे.. किस तरह समझाऊं कि मुझे आपसे तार्किक बातों और तर्कसंगत जवाबों की अपेक्षा नहीं है....आपके ब्लॉग पर इमाम हुसैन क़ादरी जी का कमेंट पढ़ा था...उसके कुछ शब्द उपयोग करना चाहूंगी.....”ध्यान जी...किस ध्यान में हैं”....और कहना चाहूंगी... “ध्यान जी...किस ध्यान में हैं!”...एक बार ध्यान से मेरा जवाब तो पढ़ लिया होता!...फिर ‘तार्किक और तर्कसंगत जवाबों की अपेक्षा’ का सवाल करते... सब आपकी महान लेख पर हंस रहे हैं….!!! समझ तो तुम गए ही होगे!” एक ही बात बार-बार दुहराना अच्छा तो नहीं लग रहा लेकिन क्या करूं...इसलिए फिर से कहना चाहूंगी... ”यह भी शायद अपने ही पोस्ट के लिए कहना चाहते होंगे...अक्सर हम जिन बातों को अपने लिए स्वीकार नहीं कर पाते, किसी से संबद्ध कर बोल देते हैं...कोई बात नहीं हम समझ सकते हैं”..जहां तक आपका सवाल है... समझ तो तुम गए ही होगे!

के द्वारा: Shipra Parashar Shipra Parashar

आदरणीय जागरण जंक्शन परिवार के संपादक महोदय जी तो आप नहीं हैं लेकिन मान लेने में क्या बुराई है, चलिए मैं आपको थोड़ी देर के लिए जागरण जंक्शन का नुमाइंदा मान लेता हूँ, मान लेने में क्या दिक्कत है, जब मैं खुद को बुद्धिमान मान सकता हूँ तो आपको परम-बुद्धिमान मानने में क्या कठनाई है..?? आप का ये चुटकुला यहां बहुत सही बैठता है "समझ तो तुम गए ही होगे!”, है न...??? तो आप महिला हैं...पक्का..या ये भी मानना ही पड़ेगा...??? चलिए ये भी मान लेता हूँ...लेकिन मैं आप को पूर्ण-स्त्री नहीं मान सकता हूँ, उम्म्म क्या करें....क्या करें...हाँ...एक काम करता हूँ, आपको मैं एक ऐसी स्त्री मान लेता हूँ जिसका चित्त पुरुषों जैसा है...ये सही रहेगा...!!! अब मुद्दे पर आते हैं...तो आप ये सावित करना चाहती हैं कि वास्तव में मैं एक पागल, तुच्छ बुद्धि वाला इंसान हूँ, जिसको अपने ज्ञानी होने का भ्रम हो गया है..जो अज्ञानवश कुछ से कुछ बक रहा है..यही न ??? अरेरेरे.. इसमें इतना चिल्ल-पों मचाने की क्या ज़रुरत है...?? आप कह रही हैं तो झूठ थोड़े न कह रही होंगी, इतना सब कुछ मान लिया आपके बारे में, तो इतनी छोटी सी बात नहीं मानूंगा क्या, हद हो गयी... आप की सारी बाते सच है..! मैं वही हूँ जो आपने मुझे समझा है ! आपने लेख लिख कर मेरी आँखें खोल दी..और अब मैं अपनी खुली आँखों से वो सब देख सकता हूँ जो अब तक देखने में असक्षम था...अपनी खुली आँखों से जो पहली चीज मैं देख रहा हूँ वो ये है कि न तो आप महिला हैं और न ही कोई ब्लॉगर, सेकंड थिंग- आपकी समझ-दानी बहुत छोटी है..सच कह रहा हूँ, मैं आपके दिमाग के अंदर देख सकता हूँ सब खाली है...वहाँ कुछ भी नहीं है...हो सके तो इसमें थोडा भूसा भर लीजिये क्योंकि 'खाली मन शैतान का घर होता है', सुना तो होगा ही आपने ये कहावत...?? !! क्या सोचती/सोचते हैं आप, ये मुंह छिपा कर ब्लॉग लिख कर और कमेंट कर के आप मेरे प्रशनों का जवाब दे रही/रहे हैं...किस के आँखों में धूल झोंक रही हैं आप तथाकथित महिला जी...??? और ये क्या उलूल-जुलूल बच्चों जैसी पोस्ट लिखा है आपने, न इस पोस्ट का कोई सिर है न ही पैर है... मैंने जागरण जंक्शन परिवार को चुनौती दिया था न कि उनसे गुड्डे-गुड्डी का खेल खेलने के लिए बोला था...!!! 'विद्वान पुरुष ऐसा होता है...., समझदार आदमी वैसा होता है...., ये कहावत वैसा होता है...., तो वो कहावत वैसा होता है...., हम ये करते हैं तो तुम वो करते हो..., समझदार आदमी का ये लक्षण नहीं होता है..., तो हम फल लगे पेड़ पर पत्थर मारते हैं..., बात उससे की जाती है…जो बात करने लायक हो, आपको महिलाओं का कमेंट चाहिए, तो मैं महिला हूँ..इत्यादि, इत्यादि...’What a joke..!!! Are you alright or have become senseless...???? मनोवैज्ञानिक जवाहरलाल जी से बोलूं आपकी तबियत चेक करने के लिए...??? माननीय टीचर जी, गलती हो गयी मुझ से माफ़ी दे दजिए....!!! और आप अपना जॉब जरी रखिये..! ऐसा अनर्गल, बेतुका, बेहूदा, बेमतलब का पोस्ट मैं ने आज तक नहीं पढ़ा था..!! आप अगर मुझे से तार्किक और संगत जवाब की अपेक्षा करती हैं तो सब से पहले अपनी पहचान को सार्वजानिक कीजिये और फिर मुझ से बात कीजिये..!!! नमुनागिरी मुझे पसंद है लेकिन इससे ज्यादा नहीं...!!! मेरा और मेरे पाठकों का मनोरंजन करने के लिए धन्यवाद, पी.एस- मैंने अपने दोस्तों को क्या बोल कर आपका लेख पढ़वाया है, जानती हैं आप...??? सब आपकी महान लेख पर हंस रहे हैं....!!! 'समझ तो तुम गए ही होगे!'

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

(सूफी जी की सेवा में, अधजल गगरी छ्लकत जाय (http://shipraparashar.jagranjunction.com/2013/11/14/%E0%A4%85%E0%A4%A7%E0%A4%9C%E0%A4%B2-%E0%A4%97%E0%A4%97%E0%A4%B0%E0%A5%80-%E0%A4%9B%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A4%A4-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%AF-2/) सूफी जी से विशेष अनुरोध है कि इसे पढ़क्र हमें अनुग्रहीत करें!) पाठकों के लिए.... (आदरणीय महानतम विद्वान् (सिर्फ अपनी नजरों में) सूफी ध्यान मुहम्मद जी, प्रणाम! सादर नमस्कार! चरण स्पर्श! ‘आपने अधजल गगरी छ्लकत जाय’ वाली कहावत सुनी होगी. आप जैसे 24000 ग्रंथों के पठयिता से यह अदना सी कहावत न पढ़े जाने की सोच रखने की गुस्ताखी तो नहीं कर सकती. किंतु हे ‘पुरुषार्थ’ इस अदना सी कहावत का अर्थ आप समझ नहीं पाए!...यह सोचकर हैरान हूं. हे सूफी जी महाराज, आपकी बड़ी इच्छा थी कि कोई महिला आपकी ‘निहायती बीमार सोच’ पर प्रतिक्रिया दे. आपने स्वयं को ‘स्वयं ही’ महान् घोषित कर दिया. किंचित यह जान पड़ता है कि महानता की चोटी से कभी आपका परिचय नहीं हुआ. अब तक के आपके मधुर, महान शब्दों से आपकी बस इतनी ही महानता का ज्ञात कर पा रही हूं. इसलिए कह नहीं सकती कि किन महान पुरुषों के संपर्क में आपने महानता की परिभाषा समझी. ऐसा जान पड़ता है कि जिनकी भी वेश-भूषा, वाणी-व्यवहार से महानता की सीढ़ियां चढ़ने लायक आप खुद को समझ सके शायद वे पूरी तरह आपको उस परिभाषा से परिचित कराना भूल गए होंगे. कोई बात नहीं. जीवन में जानने और समझने की प्रक्रिया अनवरत चलती रहती है! आप तो खुद महाज्ञानी हैं. किंतु हे ‘नारी आकांक्षा के अंतर्यामी महान सूफी (जैसा कि आपका नाम भी सूफी है) पुरुष’! आपको शायद यह अब तक समझ नहीं आया कि बुद्धिमान केवल उसी जगह प्रतिक्रिया देते हैं जहां उन्हें गंभीर सोच होने का अंदाजा हो. आपके लेख की विषयवस्तु और आलेख पर राय देने, राय कायम करने की बात तो बाद में आती है, सर्वप्रथम तो आपका ‘निर्लज्ज’ व्यक्तित्व ही हर तरफ जिराफ की तरह गर्दन ऊंची कर अपने उथलेपन का ढ़िंढ़ोरा पीट रहा है. बात उससे की जाती है...’जो बात करने लायक हो’. वरना तो कीचड़ के साथ खेलते!..कभी देखा है किसी को रोजमर्रा कीचड़ से खेलते हुए? कीचड़ के साथ खेला नहीं जाता ‘स्व-सम्मानित’ सूफी जी! क्योंकि सबको पता है कंचन पानी में कंकड़ फेंककर उसकी स्थिरता में आया परिवर्तन हमारी आंखों को लुभा सकता है..किंतु काले कीचड़ में पत्थर फेंककर केवल अपने दामन पर काले दाग का निशान ही दिख सकते हैं जो वस्तुत: दामन पर दाग नहीं होता बल्कि उस कीचड़ का चरित्र है जो कंचन पानी के संपर्क में आकर धुल जाता है. ठीक वैसे ही जैसे सज्जनों के संपर्क से मन के मैल धुल जाया करते हैं..’लेकिन मैल जो कीचड़ की तरह धूल पड़ने से बनी हो..जिसका वास्तविक रंग ही मैला हो उसे कितना भी रगड़-रगड़ कर नहला लो, गोरा नहीं बना सकते’...जिसका स्वभाव ही काला हो उससे उज्ज्वल, धवल प्रकाश की उम्मीद तो नहीं कर सकते. इसलिए जहां तक महिलाओं द्वारा ‘आपके बुद्धिजीवी समान ब्लॉग’ पर प्रतिक्रिया न देने का सवाल है शायद मेरे उपरोक्त शब्दों में आप समझ गए होंगे. बुद्धिजीवियों में ‘अति उच्च पदस्थ’ ‘माननीय सूफी जी’! शायद आपकी याददाश्त से बातें खो गईं कि ‘तुच्छ’ की बातों से कोई इत्तफाक न रखते हुए भी उससे बात करना, उसकी बेतुकी बातों का जवाब देना कोई ‘उच्च श्रेणी’ का मनुष्य पसंद नहीं करता... सामान्य भाषा में आपने सुना होगा या कभी प्रयोग भी किया होगा ‘छोटे लोगों के मुंह नहीं लगते’. ऐसा इसलिए क्योंकि उसके पास एक छोटी बुद्धि होगी जिसे ‘बुद्धि’ की श्रेणी में न रखकर ‘बेवकूफी’ की श्रेणी में रखा जाता है...और इसी बुद्धि के साथ वह ‘छोटा आदमी’ बिना कोई विचार किए कुछ भी बोल देगा यह उस ‘उच्च-श्रेणी’ के इंसान को पता होता है. इसलिए उस ‘छोटे आदमी’ को किसी प्रतिक्रिया-परिणाम से कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन उस ‘बड़े व्यक्तित्व को तो फर्क पड़ेगा, बेकार की बात में उसका कीमती वक्त बर्बाद होगा. इसलिए अपना समय और सोच किसी ‘मूढ़’ के आगे बर्बाद करने की व्यर्थता को वह भली-भांति समझता है. हालांकि आपके समान ‘उत्कृष्ट विचारक, बुद्धिजीवी’ से हम उपरोक्त शब्दों में ‘छोटा’ शब्द से ‘नौकर’ ‘गरीब’ आदि अर्थ लगाने की ‘उथली सोच’ की उम्मीद नहीं है किंतु फिर भी (क्योंकि आप स्व-घोषित विद्वान हैं) हम समझाना चाहेंगे कि और प्राणी ‘तुच्छ’ केवल अपनी ‘तुच्छ सोच’ से बनता है. ‘चावल का एक दाना ही काफी होता है जानने के लिए कि चावल पका है अथवा कच्चा ही है अब तक’! सबको मालूम है कि ‘फलों से लदा पेड़ पत्थर तो खा लेता है लेकिन अपनी तारीफ में खुद कुछ बोलता नहीं, उसका मीठा फल खाकर वही पत्थर मारने वाले लोग उसकी तारीफ करते हैं. ठीक उसी प्रकार जैसे ‘पानी से भरा हुआ घड़ा शांति से साथ चलता है लेकिन आधा भरा घड़ा हमेशा छलक-छलक कर पानी से भरे होने का दंभ भरता रहता है. आपकी तुलना में मैं निरक्षर हूं. 24000 किताबें नहीं पढ़ी होंगी शायद या शायद कुछेक जो पढ़ी होंगी गिनकर नहीं पढ़ी. इसलिए अपनी ज्ञान की यथार्थता के संबंध में आपकी तरह इस तरह की कोई पुष्टि नहीं कर सकती. लेकिन मेरी छोटी बुद्धि (मैं उम्मीद करती हूं जो क्षुद्र बुद्धि नहीं होगी), जो निहायत कुछ किताबी ज्ञान और उनसे कुछ ज्यादा पारिस्थितिक ज्ञान रखती है, के अनुसार मुझे लगता है सज्जनों के आदर्श व्यवहार को पारिभाषित करने के लिए ये प्रसंग प्रयोग किए जाते हैं. जब आपकी तारीफ में आपके अपने कोमल शब्द और उन कोमल शब्दों में इस मंच के अन्य कथित ‘उच्च प्रभावशाली बुद्धिजीवियों सद्गुरु जी, सरिता जी, आदि के लिए उपयोग किए गए ‘सम्मानित’ शब्द चीख-चीख कर खुद ही आपकी सज्जनता का ‘महिमा-गान कर रहे हैं...तो आपके ‘बुद्धिजीवी’ (उपर्युक्त पैराग्राफ शब्दों के आधार पर उम्मीद है खुद के लिए उपयुक्त बुद्धिजीवियों की श्रेणी समझकर आप खुद तय कर लेंगे. आपके ज्ञान पर हम इतना भरोसा तो हम कर सकते हैं कि आप गलत श्रेणी का चुनाव खुद के लिए नहीं करेंगे’) होने पर शक का तो कोई सवाल ही नहीं पैदा होता. अब जब समझ आ गया है कि इस जगह बुद्धि की गुंजाइश कितनी है तो भैंस के आगे बीन बजाकर अपना वक्त बर्बाद क्यों किया जाए. यह शायद इस मंच के अधिकांश बुद्धिजीवी समझते हैं. महिला बुद्धिजीवी भी. सरिता जी, सद्गुरु जी, सत्यशील जी जैसे यहां उपस्थित बुद्धिजीवी शायद सुधारात्मक प्रक्रिया में विश्वास रखते हैं. यह सज्जनों की विशेषता होती है. शायद इसीलिए उन्होंने भावनाओं को समझकर उसमें सुधार होने की गुंजाइश ढूंढ़ने की गलती की. खैर गलतियां कर इंसान सीखता है. उन्हें समझ आ गया होगा कि भैंस के आगे बीन सचमुच नहीं बजानी चाहिए, वह अपनी ही धुन में पगुराता रहेगा. कोई असर नहीं होगा. ‘इच्छा तो नहीं है लेकिन आखिरी दफा सोचा मूढ़ के सामने मैं भी थोड़ी देर के लिए मूढ़ बनकर उसे सम्मान दे दूं’..सृष्टि का नियम है एक मौका हर किसी को अपनी तरफ से देनी चाहिए..... तो आप बात कर रहे थे बलात्कार की’!...और बलात्कार से संबंधित स्त्री-पुरुष की सोच-इच्छा आदि आदि की! महात्मन्! आपको सत् सत् नमन!....कि आप ‘बलात्कार करने और बलात्कार करवाने की चाह रखने विषय’ पर इतनी लंबी चर्चा-चिंतन के लिए अपना कीमती वक्त निकाल पाए. वरना तो ‘बलात्कार करने और बलात्कार करवाने की इच्छा करने’ के अलावे भी दुनिया में कई अति महत्वपूर्ण कार्य हैं...शायद यही सोचकर यहां या इस विषय पर आपके महान विचार पढ़ने वालों ने प्रतिक्रिया देने के संबंध में सोचा होगा कि ‘कुछ सार्थक करना बेहतर है, बजाय चिकने घड़े पर पानी डालकर उसे गीला करने की कोशिश करने के’. विश्वास करना चाहिए! इसलिए जिसने 24000 ग्रंथों को कंठ किया हो उससे अब इतनी उम्मीद तो कर सकते हैं कि अपनी बुद्धिजीवी सोच (क्षुद्र, तुच्छ सोच) पर महिलाओं की प्रतिक्रिया न मिलने का कारण समझ सकें. आज के अति व्यस्त वक्त में हर किसी के पास वक्त की कमी है. कोई इन महान विचारों की छाया में अपने विचारों की शाखाओं को मारना नहीं चाहता. जहां तक बात बलात्कार की है ‘स्त्रियों के मन को पढ़ने वाले, स्त्रियों के मन के भावों को समझ सकने वाले अकाट्य विद्वान सूफी जी’! शायद आपको ‘प्रेम प्रदर्शन’ और ‘बल-प्रदर्शन’; ‘प्रेम-आग्रह’ और ‘दुराग्रह’ में फर्क नहीं पता. कृपया इन शब्दों के शाब्दिक अर्थ से परे ‘गूढ़-अर्थ’ को समझने की चेष्टा में अपने चित्त की बुद्धिमत्ता में हलचल लाते हुए उसे थोड़ा दौड़ाएं. अगर मैं ‘मूढ़ बुद्धि’ पर समय गंवाते हुए एक मिनट के लिए मूढ़ बन भी जाती लेकिन आपका पूरा ब्लॉग ध्यानपूर्वक पढ़ा नहीं था...हां, एक सरसरी निगाह दौड़ाई थी. आश्चर्य नहीं हुआ, ज्यादा वक्त नहीं दिया क्योंकि हमें पता नहीं था कि ‘राह चलते ऐसे हजारों बुद्धिजीवियों में एक आपके’ इस मंच पर आ जाने से ‘थोड़ा शोर’ मच सकता है. खैर श्वान के आने से थोड़ी देर के लिए हलचल हो सकती है लेकिन हर किसी को पता है ‘श्वान श्वान है’. हमें पता न था कि हजारों मनचले, राह चलते (क्षुद्र) बुद्धिजीवियों के शब्दों को इस मंच पर ‘अकथ मेहनत’ से इतने सारे शबदों में लिखकर हमें पढ़ने का जो मौका आपने दिया, वह बस कुछ लम्हों का था और आगे उन्हें पढ़ना हमें नसीब न होगा. वरना आप जैसे बुद्धिजीवी (स्व-घोषित) के सम्मान में उन शब्दों को ‘quote’ करते हुए जरूर व्याख्या करते. पागल कभी नहीं कहता कि वह पागल है. वह सबको पागल कहता है. मूर्ख हमेशा सबको बेवकूफ और खुद को बुद्धिमान कहता है. पर आप उनमें थोड़ी ऊंची प्रजाति के हैं शायद..तभी तो आपको लगा कि सद्गुरु जी सरिता जी या इनके समान जागरण मंच के अन्य स्तरीय लेखक आपकी श्रेणी की बुद्धिमत्ता (तुच्छ) को छू नहीं सकेंगे. हां कोई अदना सा लेखक जो आपके स्तर पर गिर सकता हो, ऐसा कर सकता है. इसलिए आपकी नजर में उन ‘अदना’ लोगों को बहस से बाहर करते हुए सीधे इन बड़े लेखकों को चुनौती दे डाली. वैसे हे महात्मन्! आपको बताना की गुस्ताखी कर रहे हैं एक होती है ’बुद्धि’ और दूसरी होती है ‘दुष्ट बुद्धि’. यह हम किस संदर्भ में कह रहे हैं यह अब किस तरह समझाएं लेकिन जंक्शन पर ही एक चुटकुला पढ़ा था.. जिसकी लाइनें थीं..”समझ तो तुम गए ही होगे!” अंत में, सादर प्रणाम! आपके जवाबी शब्दों के कुछ महानतम शब्द हैं: “अगर वो पत्रकार हैं तो मैं भी कोई चरवाहा नहीं हूँ” “मैं जेजे से दिन में ही निपट सकता था, लेकिन मैं ने ऐसा नहीं किया सिर्फ आपकी खातिर…” “मैंने कोई पांच साल मीडिया के लिए काम किया है…फिल्म इंडस्ट्री में आने से पहले मैं दिल्ली में न्यूज़ चैनल के लिए ही काम करता था…!” “बर्षों से मैं तथाकथित गुरुओं की बखिया उधेरता आ रहा हूँ, कोई भी दो चार मिनट से ज्यादा टिक नहीं पता है!” “ मशाल ले कर के समुंदर को डराने की इनकी पुरानी आदत हैं…” “आश्चर्य तो ये है कि इस बार ये अकेले हैं….पता नहीं इनके गण्यमान्य साथी जन कहाँ दुबके हुए हैं.” “अभी तक इन लोगों ने गुटबाजी शुरू नही की है… ये लोग मुझ पर ऐसे हमला करते हैं जैसे कोई भेड़ का झुण्ड शेर पर हमला करे…!” - “अगर मैंने अपने लेख से महिलाओं का अपमान किया है तो क्यों किसी महिला ने मेरे खिलाफ आवाज़ नहीं उठाया…??? सरिता जी ने तो मेरे लेख पर कमेंट किया था…उन्होंने शिकायत क्यों नहीं की…?? “ “कहाँ से आपने पत्रकारिता किया है…?? मेरे कई पत्रकार मित्र हैं मैं ने उनसे भी लेख को पढवाया किसी ने भी मेरे लेख को आपत्तिजनक जनक नहीं बताया, आपने किस दिव्य-दृष्टि से मेरे लेख को पढ़ा बताएंगे आप…??? आपके जागरण में काम कर चुकी मेरी एक महिला मित्र ने मेरे लेख को पढ़ा उन्हें कुछ गलत नहीं लगा, आपने कौन सी अलौकिक दृष्टि का इस्तेमाल किया लेख को पढने के वक़्त बताएँगे आप…??? बचपन से ले कर आज तक मैंने कोई चौबीस हज़ार किताब पढ़ा होगा, दुनिया के एक से बढ़ कर के विवादस्पद लोगों को मैं ने पढ़ा है, मुझे तो किसी भी दृष्टिकोण से मेरे लेख में कुछ गलत और अपमानजनक नहीं लगा, किस आधार पर आपने मुझ से मेरे लेख को हटाने के लिए बोला मैं वो जानना चाहता हूँ…?? और मैं आपको आश्वासन देता हूँ कि इन छुट-भैये लेखकों को छोड़ कर किसी भी बरिष्ट पत्रकार या लेखक ने अगर मेरे लेख के एक भी वाक्य को असंगत या अनर्गल सावित कर दिया तो मैं लिखना छोड़ दूंगा, ता-उम्र कलम को हाथ तक नहीं लगाऊंगा..,|” “अगर आपके जागरण परिवार के लेखकों और संपदकगण में थोड़ी भी प्रतिभा है तो मेरे चुनौती को स्वीकार करें और सामने आ कर मुझ से बहस करें…मैं उनके दलीलों को सुनना चाहता हूँ | मैं जानना चाहता हूँ कि आपका आधार क्या है..???” “और आदरणीय जवाहर लाल सिंह जी, क्या हाल हैं आपके, सब खैरियत..??? आप तो अब मनोचिकित्सक हो गए हैं, बधाई हो… लोगों से बगैर मिले ही पता कर लेते है कि वो कैसा है, आप तो फ्रायड के भी गुरु निकले, घर बैठे बैठे पता कर लिया कि सूफी ध्यान मुहम्मद ‘सिरफिरा’ है…गुड..!! आपने जब मेरा इलाज कर ही दिया है तो मैं सोचता हूँ कि आप को आपकी फीस भी भेज ही दूँ…क्या लेना पसंद करेंगे आप कैश या चेक…??? अपना पता भेज दीजिये गा मैं पैसा भिजवा दूंगा…!! आपने अच्छा ही किया लेखन छोड़ कर मनोवैज्ञानिक बन गए वैसे भी लेखन-वेखन आपके बस की …… (बंकि तो आप समझ ही गए होंगे, मनोवैज्ञानिक जो ठहरे)…!!!!!” “‘अब पाठकों से दो शब्द….!!’ मज़े लो भाई आप लोग, अगर आप लोगों को बैंड सुनने का शौक है तो मुझे बैंड बजाने का, मधुमक्खी के छत्ते पर मैं ने पत्थर मार दिया है, अभी सब सो रहे होंगे, कल सुबह मेरे लेख को पढ़ते ही ‘भन्नभनाने’ लगेंगे… कुछ लोगों को आग भी लग जाएगी, आप लो अपना हाथ सेक लीजियेगा …ठंड का समय है गर्मी का मज़ा लीजिये…! देखते हैं कल का सूरज क्या नया हंगामा ले कर अता है…!!!!” उम्मीद है हमारे उपरोक्त शब्दों में आपकी उच्च बुद्धि यहां ‘quote’ हर वाक्यांश का हल ढूंढ़ लेगी. (किताबें पढ़कर जवाब तो ढूंढे ही होंगे आपने). अगर कोई जवाब भूलवश छूट गई हो तो हम उसका जवाब जरूर देंगे. पर अपना समय इसपर व्यर्थ गंवाने का अफसोस हमें हमेशा रहेगा.

के द्वारा: Shipra Parashar Shipra Parashar

मुनीश जी, नमस्कार..!! मैं उत्तेजित इसलिए हूँ क्योंकि 'I can speak fire when I am heated.'...!! कभी कभी उत्तेजित होना ज़रूरी हो जाता है, अपने दिनकर की वो कविता पढ़ी होगी 'शक्ति और क्षमा', दिनकर कहते हैं... 'सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है।'..!!! उत्तेजना ज़रूरी है, रसेल का वचन है, 'गलत लगों से ज्यादा सही लोगों की चुप्पी ने दुनियां को ज्यादा नुक्सान पहुँचाया है', जो गलत करते हैं वो हमेशा कांफिडेंट रहते अपने कृत्य को लेकर, जबकि बुद्धिमान संशय में रहता है... जिसका परिणाम ये होता है कि मुर्ख जमात बना लेते हैं, और बुद्धिमान अकेले रह जाते हैं..!! हमारी विनम्रता घातक है, हमें विनम्र नहीं बोल्ड लोगों की ज़रुरत है | विवेकानंद सही थे जब उन्होंने कहा "हमें अभी आनंद के भी आंसू नहीं चाहिए, बहुत रो लिया है हम ने"..| ग़लत विचारों का लोग सदियों सदियों से प्रचार कर रहे हैं..और सही लोग चुप बैठे रह जाते हैं... चोर जोर से बोल रहा शरीफ लोग चुप बैठे हैं, मैं ऐसी शराफत को नपुंसकता कहता हूँ...शांति हमारा स्व्भाव होना चाहिए मज़बूरी या कमज़ोरी नहीं..... बहस ज़रूरी है...मैं किसी भी परिवारवाद के पक्ष में नहीं हूँ, सभी 'वाद' के विरोध में हूँ, मुशील से तो परिवार से पीछा छूटा है यहाँ भी परिवार के चक्कर में मत बंधिये...ये बंधन राजनीती के हैं, सत्य मुक्त होता है, अकेला होता है, वो किसी परिवार, धर्म, और देश का गुलाम नहीं होता है...परिवार सत्य से जुड़ सकता है सत्य परिवार से समझोता नहीं कर सकता है...समझोता राजनीती है..... जिस किसी भी पत्रकार या संपादक ने मुझ से मेरे लेख को हटाने को कहा मुझे पूरा हक़ है कि मैं उनसे सवाल करूं....| मैं अपनी विद्वता का प्रदर्शन नहीं करना चाहता हूँ मैं बस एक अवेयरनेस लाना चाहता हूँ... इस देश के पत्रकारों की स्थिति somnambulist जैसी है, नींद में इनको पता ही नहीं चल रहा है कि ये क्या कर रहे हैं...| भीड़ की गुलामी करते हैं ये लोग, इनका अपना कोई बुद्धि या विवेक है ही नहीं...!!! चार लोगों ने मेरे खिलाफ शिकायत क्या कर दिया इनके आँखों पर पट्टी पड़ गयी...मुझे सद्गुरु का दुःख समझ में आता है, उन्होंने बेचारे ने कोई चार बार मेरे लेख को पढ़ा भी उनको कुछ समझ नहीं आया तो फिर उन्होंने मेरा विरोध किया, मैंने उनके 'ध्यान' के बारे में कही गयी बातों को गलत ठहरा दिया सो मुझे उनकी तिलमिलाहट समझ में आती है...ऐसे ही इस देश में आसाराम के बाद संतों का धंधा मंदा चल रहा, बेचारे सब के सब शक़ के दायरे में हैं...इस नाज़ुक हालत में अगर कोई उनकी पोल खोल करने लगे तो उनकी बौखलाहट जायज है...!! मैं सद्गुरु के प्रति सहानुभूति प्रगट करता हूँ...!! लेकिन जेजे परिवार को क्या हो गया था...क्या उन्होंने मेरे लेख को हटाने से पहले उसको एक बार ठीक से पढ़ लेना भी ज़रूरी नहीं समझा...?? मैं समझ सकता हूँ कि एक पत्रकार को ध्यान की समझ नहीं होगी, उन्होंने ने सद्गुरु को बेस्ट ब्लॉगर बना दिया, चलता है...!! लेकिन मैं तो कोई ऊँची ऊँची बाते नहीं फेक रहा था...सीधी सरल बात कही थी...निष्पक्षभाव से बलात्कार का मानसिक विश्लेषण किया था...दिन को दिन बोला था रात को रात बोला था फिर इनको ये बात क्यों नहीं हजम हुई...??? (आपका विवेकपूर्ण कमेंट पढ़ कर अच्छा लगा)

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

श्रीमान बुद्धिमान जी, ये सम्बोधन इसलिए लिखा है क्योंकि जहांतक मेरी याद दाश्त काम कर रही है आप सूफी होने से पहले वाइजमैन थे खैर सब कुछ परिवर्तनशील है मैं आपके उन लेखों को पढ़ने से वंचित रह गया जिनके कारण आप फिर एक बार चर्चा में हैं पता नहीं कैसे आपके ज्ञान सागर में मैं हर बार गोटा लगाने से रह जाता हूँ शायद यही विधि का विधान है कि मैं आपका विवादित लेख न पढूं इसलिए इस पर चर्चा भी नहीं कर पाउँगा . लेकिन मैं जे जे के उस निर्णय के विरोध में अवश्य हूँ जिसके कारण आपको वो लेख हटाने पड़े. संदीप जी जहां तक मुझे ध्यान है, ध्यान मोहम्मद जी को इस नाम से भी पुकारा जा सकता है, जहां तक मुझे लगता है हर व्यक्ति के ज्ञान का दायरा सीमित है, और सब उसी दायरे में रह कर अपने अपने ढंग से अपने अथाह ज्ञान का प्रदर्शन कर रहे हैं . निश्चित ही आप भी उत्तेजित हो गए हैं और जे जे परिवार को चुनौती दे रहे हैं, तो क्या आप उस परिवार से अलग हैं या परिवार में विदवता सिद्ध करने कि बहस करना चाहते हैं . आपने बहुत से प्रश्न किये हैं कुछ उत्तेजना में अधिक लगते हैं मुझे ये नहीं पता कि ये उत्तेजना क्यों और किसलिए ? क्योंकि कम से कम आप जैसे असीमित ज्ञान के भण्डार व्यक्ति से उत्तेजना और चुनौती जैसे वाक्यों कि अपेक्षा कम ही कि जाती है ये मैं कोई व्यंग नहीं कर रहा हूँ बल्कि मुझे लगता है कि वो दोनों लेख भले ही उनमें जो भी लिखा गया हो के लिए आप मंच को वाद विवाद का मैदान नहीं बना सकते अब आप ये मत सोचियेगा कि मैं कोई पत्थर खा के भन्नाई हुई मधुमक्खी हूँ . क्योंकि मैं नहीं चाहता कि आपके ज्ञान का असीमित दायरा सीमित दायरे में बांध जाए इसलिए इधर आ गया

के द्वारा: munish munish

खुद को सद्गुरु बताने वाले मान्यवर! जब फोड़ा इलाज़ से बाहर हो जाता है तो उसका ऑपरेशन करना नितांत ही आवश्यक हो जाता है. ऐसा ही कुछ स्थिति हो गयी है भारत में जहाँ खुद को सद्गुरु एवं स्वामी बताने वाले लोग फोड़े का रूप ले लिए है. ऐसे में यदि ऑपरेशन नहीं किया गया तो हमारे समाज के लिए घातक सिद्ध होगा और इसका प्रमाण आये दिन स्वामियों और बाबाओं के कृत्यों से मिल रहा है. फिलहाल आपसे दो चार बातें करते हैं. गुरु का मतलब पता है महाशय! गुरु अपने आप में पूर्ण होता है, गुरु न ही सच्चा होता है और न ही झूठा तो फिर खुद को या अपने गुरु को सद्गुरु कहना सिद्ध करता है कि आप लोगों को बेवकूफ बना रहे हैं. आप कह रहे हैं कि आप 'गम्भीर' है. यह इंगित करता है कि आप बीमार है. अतः किसी मनोचिकित्सक से दिखाइये इस बिमारी का इलाज़ वही सही से कर सकता है. और आप क्या मूर्खों की तरह बात कर रहे है कि "आप ने मेरी ही नहीं मेरे प्राणप्रिय गुरुओं की भी निंदा की है.ये मै बर्दास्त नहीं कर सकता" महाशय कभी आपने सुना है क्या कि अँधेरा के आने से उजाला कम हो जाता है. हाँ यह तभी सम्भव है जब वहाँ उजाला न रहे. मतलब कि आप और आपके गुरु दोनों ही अँधेरे के प्रतीक है न कि उजाले का. अंत में आपसे बस इतना ही कहना चाहूंगा कि आप एक समय एक, बहुत समय में बहुत लोगों को चुतिया बना सकते हैं. परन्तु!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!हरेक समय हरेक व्यक्ति को चुतिया नहीं बना सकते............

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

"गीता का अघ्याय छठा पहले दो तीन बार पढ़ लीजिये" कृष्ण कब से ध्यानी हो गए...और गीता कब से प्रमाणिक किताब हो गया...?? मैं न तो कृष्ण को ध्यानी मानता हूँ न ही गीता को प्रमाणिक, गीता में सिवाय इधर उधर की बैटन के और कुछ भी नहीं है...वैसे भी गीता मुझ से नहीं कही गयी थी..कृष्ण ने अर्जुन से कहा था सो अर्जुन जाने और कृष्ण जाने...मुझे गीता और रामायण में क्या लिखा है उससे क्या लेना! "केवल किताबी ज्ञान और ज्ञानी ध्यानी होने का झूठा अहंकार,आत्म सम्मोहित होकर बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी में जी रहे हैं आप?" ... किताबों में ज्ञान कहाँ से आता है...??? किताबें क्या असमान से टपकती हैं....??? और मैं ने कब कहा की मैं ध्यानी और ज्ञानी हूँ....??? दूसरी बात, आप कहते हैं 'झूठा अहंकार' तो आप ये सोचते हैं 'सच्चा अहंकार' भी होता है...? अगर होता है तो इसके बारे में जानना चाहूंगा...कृपया बताएं की 'सच्चा अहंकार' क्या होता है ....?? "आप ने अपने आप को सारे संतों से यहाँ तक की आचार्य रजनीश से भी बड़ा मान लिया है" ...मैं छोटा कब था जो मैं ने खुद को बड़ा मान लिया है, न तो मैं किसी से छोटा हूँ न कोई मुझ से बड़ा है....और न ही कोई संत है और न ही कोई पापी है....दूसरी बात मैं ने आपके तथाकथित संतों और आपके विचारों का विरोध किया है न कि आपका और संतों का...!!! गलत को गलत नहीं बोलूं तो और क्या बोलूं...?? क्या आप चाहते हैं कि मैं झूठ बोलूं...? आपने गलत लिखा तो मैं उसको कैसे सच बोलूं...आप ऐसा क्यों मान के चल रहे हैं की गलत होने में कोई बुराई है...??? 'सद्गुरु' होने से कोई सही नहीं हो जाता है...!!! "ये आप नहीं आप की ईर्ष्या और अहंकार बोल रही है"... हो सकता है कि आप सही हों, लेकिन न तो मुझे अपने ईर्षालु होने से कोई परेशानी है और न ही अहंकारी होने से...मैं अपने सरे गुणो और अवगुणो को सहजता से स्वीकारता हूँ,,,,अगर मैं अहंकारी हूँ तो अहंकारी ही सही...संघर्ष मेरा स्वभाव नहीं है...जीवन जैसा है मुझे कबूल है...! "क्या ऐसे लेख लिखना स्वस्थ मानसिकता है?".... कभी स्वस्थ बीमार से मिले हैं आप..??? बीमार का मतलब ही होता है जो स्वस्थ नहीं है...फिर आप स्वस्थ मानसिकता का सवाल कहाँ से उठा रहे हैं...?? मन का मतलब ही होता अस्वथ, जैसे स्वस्थ बिमार आदमी नहीं होता है वैसे ही स्वस्थ मन जैसा कुछ नहीं होता है...!!! "आप ने पुरुष की तुलना शेर से और औरतों की तुलना गधा से की है"..... आपने उल्टा समझ लिया, मैं पुरुष की तुलना गधे से की थी न की स्त्री की...!!! "यही आप का ज्ञान और साक्षीभाव है?" ... तो आप ये मानते हैं कि साक्षी में भी कोई चुनाव होता है...??? "आप बलात्कार पीड़ित औरतों का मजाक उड़ाया है" ..अगर मज़ाक ही उड़ाई है तो इसमें क्या दिक्कत है...औरतें मर्दों का मज़ाक उड़ातीं हैं मैंने औरतों का मज़ाक उड़ाया है...क्या बुराई है इसमें...ये बिलकुल प्रकिर्तिक और स्वस्थ है ....न तो मैं खुद को श्रेष्ट और औरतों को निकृष्ट मानता हूँ....न औरतें मुझ से अलग हैं और न ही मैं औरतों से अलग हूँ...हम इंटर-बीइंग हैं...!!! "आप के मुताबिक मंच के सारे ब्लागर मुर्ख हैं और बस आप ही एक ज्ञानी हैं" अगर मेरे ज्ञानी होने से सब मूर्खः हो जाते हैं तो शायद ऐसा ही है...लेकिन मुर्ख होना कोई बुरी बात तो नहीं मुझे मूर्खों से उतना ही प्रेम है जितना ज्ञानियों से ....सब प्यारे हैं...!!! "आप को सम्मान देने का मतलब ये नहीं है कि आप हम सब को अपमानित करें" ..आप मुझे अपमानी करने के लिए स्व्तंत्र हैं...आप मुझे सम्मान दे कर के मुझसे झूठ का समर्थन नहीं करवा सकते हैं...!!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

आदरणीय सूफी ध्यान मुहम्मद जी,दिन भर की व्यस्तता बाद अब मै खाली हुआ हूँ.मैंने आप का कमेंट पढ़ा है.अब मै गम्भीर हूँ,मेरा जबाब सुनकर बाद में ये मत कहना कि मैंने गहरा मजाक किया था.आप ने मेरी ही नहीं मेरे प्राणप्रिय गुरुओं की भी निंदा की है.ये मै बर्दास्त नहीं कर सकता.आप ने मेरे जबाब का इंतजार भी नहीं किया और मेरे नाम से ब्लॉग पोस्ट कर दिया.क्या है आप के पोस्ट और कमेंट में?केवल किताबी ज्ञान और ज्ञानी ध्यानी होने का झूठा अहंकार,आत्म सम्मोहित होकर बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी में जी रहे हैं आप?आप ने अपने आप को सारे संतों से यहाँ तक की आचार्य रजनीश से भी बड़ा मान लिया है.मेरे ब्लॉग "उलटा कुआं गगन में,तिसमें जरै चिराग" की व्याख्या यदि गलत है तो सही व्याख्या करके जबाब देते.ये जबाब देने का सही तरीका था.आप जानते हैं कि ऐसा आप नहीं कर पाएंगे.आप को सम्मान देने का मतलब ये नहीं है कि आप हम सब को अपमानित करें.मैंने आप के लेख "चमेली ने चमन का बलात्कार किया" को पढ़ा,क्या ऐसे लेख लिखना स्वस्थ मानसिकता है?आप बलात्कार पीड़ित औरतों का मजाक उड़ाया है,जिसे मेरी बात पर विश्वास न हो वो ये लेख पढ़ के देखे.इसी लेख के एक कमेंट में आप ने आदरणीय सरिता सिन्हा जी को अपमानित किया है.आप ने पुरुष की तुलना शेर से और औरतों की तुलना गधा से की है.यही आप का ज्ञान और साक्षीभाव है?आप के मुताबिक मंच के सारे ब्लागर मुर्ख हैं और बस आप ही एक ज्ञानी हैं.आप ने जागरण परिवार को अपराधी कहा है,क्योंकि उसने मुझे "बेस्ट ब्लागर ऑफ़ दी वीक" चुना है.ये आप नहीं आप की ईर्ष्या और अहंकार बोल रही है.आप की ग़लतफ़हमी मै दूर कर करना चाहूंगा कि महोदय मै जीवन में इतने सम्मान और पद पा चूका हूँ कि मुझे अब कोई पद या सम्मान नहीं चाहिए.मैंने किसी से ये सम्मान माँगा था?मेरे बहुत से ब्लॉग पब्लिश हुए हैं.आप ने पहले कभी ये मुद्दा क्यों नहीं उठया?इसी समय क्यों ये मुद्दा यथाय है,जब "बेस्ट ब्लागर ऑफ़ दी वीक" चुना गया है?क्योंकि आप को अच्छा नहीं लग रहा है और ईर्ष्या हो रही है.आप ही ये पदवी ले लीजिये,मुझे नहीं चाहिए.अंत में जो सवाल आप ने पूछा है उसका जबाब दे रहा हूँ.“मन का एकाग्र हो जाना ध्यान है और मन का निर्विचार हो जाना समाधी है”आप ने कभी ध्यान समाधी लगाया है.लगाये होते तो ये सवाल खड़ा नहीं करते.गीता का अघ्याय छठा पहले दो तीन बार पढ़ लीजिये,फिर मुझसे इस विषय में बहस कीजियेगा.वैसे आप की जानकारी के लिए बता दूँ कि ध्यान-समाधी कई तरह की है.पता नहीं आप को उसका अनुभव है की नहीं,होता तो ये सवाल खड़ा नहीं करते.रत को सोते समय मन एकाग्र हो ध्यान में बदल जाता है और गहरी निद्रा,जिसमे मन निर्विचार हो जाता है,वो प्राकृतिक समाधी कहलाती है,जो प्राकृतिक रूप से सबको सुलभ है.इसका तो अनुभव आप को हुआ होगा?अंत में मौन होते हुए अपनी शुभकामनाओ सहित.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

आदरणीय सूफी ध्यान मुहम्मद जी,दिन भर की व्यस्तता बाद अब मै खाली हुआ हूँ.मैंने आप का कमेंट पढ़ा है.अब मै गम्भीर हूँ,मेरा जबाब सुनकर बाद में ये मत कहना कि मैंने गहरा मजाक किया था.आप ने मेरी ही नहीं मेरे प्राणप्रिय गुरुओं की भी निंदा की है.ये मै बर्दास्त नहीं कर सकता.आप ने मेरे जबाब का इंतजार भी नहीं किया और मेरे नाम से ब्लॉग पोस्ट कर दिया.क्या है आप के पोस्ट और कमेंट में?केवल किताबी ज्ञान और ज्ञानी ध्यानी होने का झूठा अहंकार,आत्म सम्मोहित होकर बहुत बड़ी ग़लतफ़हमी में जी रहे हैं आप?आप ने अपने आप को सारे संतों से यहाँ तक की आचार्य रजनीश से भी बड़ा मान लिया है.मेरे ब्लॉग "उलटा कुआं गगन में,तिसमें जरै चिराग" की व्याख्या यदि गलत है तो सही व्याख्या करके जबाब देते.ये जबाब देने का सही तरीका था.आप जानते हैं कि ऐसा आप नहीं कर पाएंगे.आप को सम्मान देने का मतलब ये नहीं है कि आप हम सब को अपमानित करें.मैंने आप के लेख "चमेली ने चमन का बलात्कार किया" को पढ़ा,क्या ऐसे लेख लिखना स्वस्थ मानसिकता है?आप बलात्कार पीड़ित औरतों का मजाक उड़ाया है,जिसे मेरी बात पर विश्वास न हो वो ये लेख पढ़ के देखे.इसी लेख के एक कमेंट में आप ने आदरणीय सरिता सिन्हा जी को अपमानित किया है.आप ने पुरुष की तुलना शेर से और औरतों की तुलना गधा से की है.यही आप का ज्ञान और साक्षीभाव है?आप के मुताबिक मंच के सारे ब्लागर मुर्ख हैं और बस आप ही एक ज्ञानी हैं.आप ने जागरण परिवार को अपराधी कहा है,क्योंकि उसने मुझे "बेस्ट ब्लागर ऑफ़ दी वीक" चुना है.ये आप नहीं आप की ईर्ष्या और अहंकार बोल रही है.आप की ग़लतफ़हमी मै दूर कर करना चाहूंगा कि महोदय मै जीवन में इतने सम्मान और पद पा चूका हूँ कि मुझे अब कोई पद या सम्मान नहीं चाहिए.मैंने किसी से ये सम्मान माँगा था?मेरे बहुत से ब्लॉग पब्लिश हुए हैं.आप ने पहले कभी ये मुद्दा क्यों नहीं उठया?इसी समय क्यों ये मुद्दा यथाय है,जब "बेस्ट ब्लागर ऑफ़ दी वीक" चुना गया है?क्योंकि आप को अच्छा नहीं लग रहा है और ईर्ष्या हो रही है.आप ही ये पदवी ले लीजिये,मुझे नहीं चाहिए.अंत में जो सवाल आप ने पूछा है उसका जबाब दे रहा हूँ.“मन का एकाग्र हो जाना ध्यान है और मन का निर्विचार हो जाना समाधी है”आप ने कभी ध्यान समाधी लगाया है.लगाये होते तो ये सवाल खड़ा नहीं करते.गीता का अघ्याय छठा पहले दो तीन बार पढ़ लीजिये,फिर मुझसे इस विषय में बहस कीजियेगा.वैसे आप की जानकारी के लिए बता दूँ कि ध्यान-समाधी कई तरह की है.पता नहीं आप को उसका अनुभव है की नहीं,होता तो ये सवाल खड़ा नहीं करते.रत को सोते समय मन एकाग्र हो ध्यान में बदल जाता है और गहरी निद्रा,जिसमे मन निर्विचार हो जाता है,वो प्राकृतिक समाधी कहलाती है,जो प्राकृतिक रूप से सबको सुलभ है.इसका तो अनुभव आप को हुआ होगा?अंत में मौन होते हुए अपनी शुभकामनाओ सहित.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

भाई...........................साहब मैं गुरूजी के तो बारे में नहीं परन्तु जे जे परिवार के बारे में जरुर कहना चाहूंगा. वो ये कि इनकी यह सोच है कि कुछ विशेष विचार रखने वाले ही लोग इस मंच पर टिक पाते है. जैसे कि अंधाधुंध परम्पराओं का समर्थन करने वाले, जे जे कीतारीफ़ करने वाले इत्यादि. मैं अपनी ही बात करता हूँ. इनको मेरा यहाँ लिखना पसंद नहीं क्योंकि इन्हें सच बर्दाश्त नहीं होता. इस लिए जे जे परिवार द्वारा मेरे ब्लॉग के सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी कर दिया गया ताकि मेरा कोई भी आलेख मेरे पाठकगणों तक नहीं पहुँच पाये और इस तरह धीरे-धीरे मेरे पाठकगण कम होते गए. आप इनके फीडबैक पेज पर जाकर देखिये. यदि ऐसा नहीं तो फिर मेरे कई शिकायतों के बाद भी मेरी समस्या का समाधान अभी तक नहीं हुआ. इससे जे जे परिवार के पूरी टीम का क्रियाकलाप संदिग्ध होता है...............

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

"विपरीत परिस्थितियों को झेलते हुए भी कार्पोरेट और अन्य क्षेत्रों में पुरुषों से भी आगे निकल गयी हैं." पहला सवाल- किसने कहा है स्त्रियों से के वो पुरुषों से आगे निकलें...?? पुरुषों से प्रतिस्पर्धा करने का मतलब ये हुआ कि जो भी पुरुष कर रहे हैं वो सही है...! साडी दुनियां में स्त्रियों के सर पर पुरुष का अनुकरण करने का भूत सवार है...ये नितांत रूप से पागलपन है...ये अंधानुकरण है ये तो ऐसे हुए जैसे शेर गधा से रेस लगाये और जीत जाये...और बोले "विपरीत परिस्थितियों को झेलते हुए भी मैं गधों से आगे निकल गया'' लानत है..!!!अरे गधा, गधा है शेर, शेर है दोनों में भला क्या तुलना ! अपने पुरुषों से स्त्रियों की तुलना करके स्त्रियों का अपमान किया है और पुरुषों का मज़ाक उड़ाया है...ये अशोभनीय और निंदनीय है...! कम से कम आप से तो ये अपेक्षित नहीं था...!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

आपका लेख मेरे "निकलो न बेनकाब " के सीक्वल जैसा प्रतीत होता है लेकिन बहुत से बिंदुओं पर थोडा विरोधाभास भी है..समाज में बहुत सी स्त्रियां ऐसी भी हैं जो चुपचाप अपना काम करना चाहती हैं या विपरीत परिस्थितियों को झेलते हुए भी कार्पोरेट और अन्य क्षेत्रों में पुरुषों से भी आगे निकल गयी हैं..भारत में ही आज इंदिरा नुई, चंदा कोचर, वनिता नारायण जैसी सिद्ध स्त्रियां है जिन के जीवनचरित पर कोई प्रश्नचिन्ह नहीं है...सीधी सी बात है, जिन्हों ने अपना एक लक्ष्य सेट कर रखा है उनको फिर स्त्री पुरुष, दिखावा , दोहरी मानसिकता नखरे चोंचले जैसे दुर्गुणों से अपने को बचते हुए सफलता के सोपान प्राप्त करती हैं....

के द्वारा: sinsera sinsera

आपने ने लेख को बार बार पढ़ने योग्य समझा मेरा प्रयास सफल हुआ ! जिन विचारों को आपने ऊपर पढ़ा है वो मेरी बपौती नहीं है, उन पर मेरा कोई अधिपत्य नहीं, मैं किसी भी विचार को अपना विचार नहीं मानता हूँ, विचार कभी भी मौलिक नहीं होता है, अतः विचारों पर किसी का अधिकार नहीं होता है ...इसिलए आप उनकी निंदा करें या तारीफ उससे मुझे कोई लेना देना नहीं है! आपने सिर्फ ओशो को पढ़ा है इसिलए आपको ऐसा लगता है कि मैं ओशो की बैटन को दोहरा रहा हूँ लेकिन अगर आप Thich Nhat Hanh, Emile Coue, Alan Watts, D.T. Suzuki, G.E. Moore, J.Krishanmurti,etc को पढ़ेंगे तो आपको लगेगा की ओशो उनकी विचारों को दोहरा रहे हैं... लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं है... आप जिसको विचार कहते हैं मैं उसको अंतर-दृष्टि या बोध कहता हूँ..! अगर मैं आग को जलने वाला और बर्फ को ठंडक देने वाला कहता हूँ तो ये मेरा विचार नहीं है... जो भी आग मैं हाथ डाल कर देखेगा वो यही कहेगा कि आग जलाता है...आप ये नहीं कह सकते हैं कि वो किसी के विचार को दोहरा रहा है...हम शब्दों को पढ़ कर धोखे में आ जाते हैं...! मैं बोध से जीता हूँ विचारों से नहीं...मैं ने बलात्कार या स्त्री के बारे में जो कुछ भी कहा है वो मेरी अंतर्दृष्टि है...आगर आप थोड़े सजग होकर देखेंगे तो आप भी वही कहेंगे जो मैं ने कहा है, हमारे शब्द और कहने के ढंग अगल हो सकते हैं लेकिन तथ्य में कोई भिन्नता नहीं होगी, अभिव्यक्ति का भेद होगा बस...! मैं अपनी बात को और अस्पष्ट तरीके से कहना चाहता हूँ.... बलात्कार एक ऐसा कृत्य है जो हमें पसंद नहीं है, इसका मतलब ये नहीं है कि बलात्कार पाप है, और बलात्कार करने वाला पापी !...हो सकता है कि ऐसा वक्त आये जब लोगों को बलात्कार पसंद आने लगे, वैसे अगर मनोवैज्ञानिक की माने तो अधिकतर महिलाओं को बलात्कार का कृत्य अच्छा लगता है, सामान्य सेक्स एक्ट से उनको बलात्कार me ज्यादा आनंद का अनुभव होता है....और ये बात मुझे भी रुचता है, क्योंकि अगर किसी पुरुष को बलात्कार करने me मज़ा आता है तो कोई कारण नहीं है स्त्री को इसमें आनंद नहीं आता हो....!!! दोषी कोई नहीं है, और न ही कुछ गलत हो रहा है...गलत सही की धारणा हमारी अज्ञानता का परिणाम है...बलात्कार बस बलात्कार है न तो इसमें कुछ सही है न ही गलत, न तो ये पाप कर्म है न ही पुन्य...! ज़रूरी नहीं है जो चीज हमें अच्छा न लगे वो गलत हो...हमें बलात्कार पसंद नहीं है, इसका मतलब ये नहीं है के ये पाप है या जो लोग बलात्कार करते हैं वो पापी हैं... किसी स्त्री को पत्नी बना कर जो लोग सेक्स करते हैं क्या आप को लगता है वो बलात्कार नहीं है...???, हर पति बलात्कारी है ! हम जब किसी स्त्री को वासना की दृष्टि से देखते हैं वो बलात्कार नहीं है ??? इसको ऐसे समझिये जब भी आपको ये बोध हो के आप किसी स्त्री को देख रहे हैं तो समझिये आप बलात्कार कर रहे हैं...क्योंकि जिसकी दृष्टि शुद्ध है उसको न तो कोई स्त्री दीखता है न ही कोई पुरुष...! बलात्कार के कई प्रकार हैं, उनमे से कुछ को हम सही मानते हैं और कुछ को गलत, लेकिन ये सब हमारी मान्यता का खेल है...सही गलत कुछ भी नहीं....!! ठीक यही बात हत्या के साथ है...जब हम देश भक्ति के नाम पर किसी की हत्या कर देते हैं तो वो हमें सही लगता है...लेकिन अगर पैसे के लिए कोई किसी की हत्या कर दे तो हमें गलत लगता है...इसका क्या मतलब हुआ....??? सही गलत और पाप पुण्य के चक्कर से निकालिये..तथ्य को देखने की कोशिश कीजिए...समझ समाधान है...सजा नहीं !!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

आदरणीय सूफी ध्यान मुहम्मद जी,इस मंच पर काफी दिनों बाद पुन: एक नया लेख लेकर आये हैं.मै आप के लेख को कई बार पढ़ा.अब मुझे लगने लगा है कि आप के और ओशो के विचारों की भिन्नता ख़त्म हो गई है.मुझे लगता है कि बहुत से लोग इसलेख को पढ़ेंगे और चुपचाप ब्लॉग से चले जायेंगे.लेकिन मै यूँ ही जाने वाला नहीं.निंदा और प्रशंसा भी लेख की नहीं करूँगा.ये फंसने वाला काम है.मै आप से लेख के एक अनछुए पहलू की चर्चा करूँगा कि बलात्कार को आपने नार्मल बताया है.सामूहिक बलात्कार और बलात्कार के बाद लड़की या महिला की हत्या करने जैसे जघन्य कृत्य की चर्चा क्यों नहीं की है?क्या ऐसे अपराधियों को भी छोड़ देना चाहिए?पश्चिमी देशों के रहन-सहन के मुताबिक आप का लेख है,परन्तु भारतीय लोगों के रहन-सहन के अनुकूल नहीं है.शुभरात्रि और शुभकामनाओं सहित.

के द्वारा: sadguruji sadguruji

के द्वारा: Madan Mohan saxena Madan Mohan saxena

"अगर सिर्फ बुद्धिमान ही बनना है तो मन के प्रति होश से भरें, चुनावरहित होश, लेकिन अगर सुंदर होना है तो शरीर के प्रति होश साधें, शरीर की जितनी भी क्रियाएं आप यंत्रवत करते हैं उसे होश से भर कर करने लगे, शरीक को देखें, उसे अनुभव करे, वो सब काम जो जल्दबाजी में करते हैं उसे थोड़ा धीरे करें | अगर आप प्रेमपूर्ण होना चाहते हैं तो भावों के प्रति होश साधें, क्रोध, घृणा, प्रेम, लोभ, भूख, प्यास, काम इन सब के प्रति सजग हो जाएँ, किसी भी प्रकार का दखल न दे बस जो हो रहा है उसे जानते रहें, उसके प्रति साक्षी रहे | और तीनों एक साथ चाहते हैं, बुद्धिमान भी होना है, सुंदर भी दिखना है और प्रेमपूर्ण भी होना है तो मन, शरीर और भाव तीनो के प्रति एक साथ भी जागरूक हुआ जा सकता है |" पूरे लेख का सार यही है.लेख का विषय सामान्य है परन्तु साक्षी भाव में रहने का सन्देश अच्छा लगा.

के द्वारा: सद्गुरुजी सद्गुरुजी

के द्वारा: yatindranathchaturvedi yatindranathchaturvedi

Alaikum Salaam! अगर आपने मेरा नाम देख कर नमस्कार करने का ढंग बदला है तो आपका नमस्कार अधुरा है , मेरे नाम में 'ध्यान' भी है | "में नहीं जानती की बापू सही हैं या गलत " अच्छा है कि आपने नहीं जानते हैं, लेकिन जानने की ज़रुरत भी क्या है ??? अच्छा हो कि हम ये जानने की कोशिश करें कि 'हम सही हैं या गलत'..| "जब तक किसी भी घटना को स्वयं अपनी आँखों से न देख लो और कानों से न सुन लो तब तक किसी का यकीन नहीं करना चाहिए" बुद्धिमान पुरुष वो है जो अपनी आँखों और कानों की विश्वसनीयता पर संदेह करने लगता है, हम आँख के मद्ध्य्म से देखते हैं, आँख बस एक उपकरण है, देखने वाला पीछे छुपा है, देखने वाला उपकरण से जो, जब और जैसा देखना चाहे देख सकता है |

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

प्रिय भाई मुहम्मद सलाम वालेकुम यह तो में नहीं जानती की बापू सही हैं या गलत क्योंकि जब तक किसी भी घटना को स्वयं अपनी आँखों से न देख लो और कानों से न सुन लो तब तक किसी का यकीन नहीं करना चाहिए हाँ इतना में जरुर कहूँगी की आशाराम के भक्त जो उनकी आज बुराई कर रहे हैं वो नमकहराम जरुर हैं क्योंकि जब तक बापू उन्हें मालपुआ खिलाते रहे तब तक वह खाते रहे और चुपचाप बैठे रहे और जब बापू ने दान पानी डालना बंद कर दिया तो गद्दारी करनी शुरू कर दी मीडिया में उनकी खबरें सुनकर बुराई करने सामने आ गए एक कहावत है अंधे को क्या चाहिए दो आँख येही इस जनता का हाल है में ना तो बापू की भक्त हूँ ना तो बापू की दुश्मन लेकिन इन गद्दारों को देखकर मुझे क्रोध जरुर आ रहा है धन्यवाद श्रीमती पुष्प पाण्डेय

के द्वारा: smtpushpapandey smtpushpapandey

समझ कभी नहीं सुधरेगा, सुधरने का कोई उपाय नहीं है | सुधारना समाज के स्वभाव के विपरीत है | जैसे अस्पताल में हमेशा बीमार लोग ही रहेंगे, पागल खाना में हमेशा पागल ही रहेंगे, जेल में हमेशा कैदी/अपराधी ही रहेंगे, ठीक उसी प्रकार, समझ में हमेशा मंद्बुधि, कमज़ोर, डरपोक, मानसिकरूप से अस्वस्थ लोग ही रहेंगे...समाज बड़ा अस्पताल है, बड़ी जेल है, बड़ा पागलखाना है | जैसे ही कोई स्वस्थ हो जाता है वो अस्पताल से बहार हो जाता है, जैसे ही कोई ठीक हो जाता है वो पागलखाने से निकल जाता है | इसीलिए समजा को तो सुधारने की बात ही मत करो... जो व्यक्ति भी स्वस्थ हो जाता है वो समाज से बहार हो जाता है, बुद्ध, महावीर, कृष्ण, जीसस, मोहम्मद, मूसा किसी समाज के हिस्सा नहीं थे, ये वो लोग थे जो पूर्ण रूप से स्वस्थ हो कर समझ से अलग हो गए थे | स्वस्थ समाज जैसी कोई चीज़ नहीं होती, जैसे स्वस्थ लोगों का कोई अस्पताल नहीं होता होता उसी प्रकार बुद्धिमान लोगों का कोई समाज नहीं होता | मुझे समाज में कोई बुराई नहीं दीखता, समाज वैसा ही ही जैसा इसको होना चाहिए | "इतिहास के पीछे इतनी भागदौड़ क्यों" - कोई भागदौड़ नहीं है, मैं इतिहास में ज़रा भी उत्सुक नहीं हूँ, न ही भविष्य की चिंता है मुझे, और न ही मैं वर्तमान को ले कर परेशान हूँ, हम अनंत अस्तिव हैं जिसका न तो कोई इतिहास है न को भविष्य है न ही वर्तमान है, हम शाश्वत हैं, एक प्रवाह हैं जो अहिर्निश चल रहा है | मैं ने इतिहास के पीछे भागने की नहीं इतिहास के पीछे छांकने की बात की थी | इसके पीछे जो मेरा उदेश्य था वो मैं पहले ही साफ़ कर चूका हूँ |

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

अच्छे को अच्छा कहना बड़ा सरल है, जो पूजने योग्य है उसकी पूजा तो कोई भी कर ले, परमात्मा के सामने सर झुकाना नहीं पड़ता है सर झुक जाता है, मज़ा तो तब है जब कोई पत्थर के सामने भी सर झुका दे…!! सवाल आशा राम के चरित्र का नहीं है सवाल हमारे और आपके चरित्र का है, आशा राम तो इके-दुके हैं, हम लाखों में हैं बल्कि अरबों में हैं… क्या एक आदमी के चारित्रिक पतन से हम सब का पतन हो गया ???? मेरे लिए आशा राम उतने महत्पूर्ण नहीं हैं जितना कि इस देश की 100 कड़ोड की आबादी, एक आशाराम के सही या गलत होने से कुछ फ़र्क नहीं पड़ता, सवाल है अरबों लगों की मानसिकता का, ऐसा लगता है जैसे बुनियादी रूप से हम किसी मानसिक रोग से पीड़ित हैं | मुझे डर है कि जो लगो आज आशाराम के खिलाफ़ है वो कल बुद्ध, महावीर, कृष्ण, जीसस और मोहम्मद के खिलाफ़ भी आवज़ उठाएंगे…| हमारा संतों को देखने और समझने का तरीका ही गलत है…| ध्यान रहे एक बुद्ध की आड़ में अगर सौ बुद्धुओं को भी पूजना पड़े तो कोई हर्ज़ नहीं है, लेकिन दो चार दस बुद्धुओं के चक्कर में आकर अगर हम बुद्धों के प्रति समादर खो दे तो ये बहुत बड़ा नुक्सान होगा | परमात्मा से प्राथना करता हूँ कि मंदबुद्धि लोगों को थोड़ी सद्बुद्धि दे..!! आमीन !!!.....................................................................बहुत ही सुन्दर मित्र............................. ...................................................................स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व से ग्रसित आस्था पर सत्य रूपी तलवार का करार प्रवाह.......................मज़ा आ गया...............................जय हो बाबाओं की .............और साथ ही उनके भक्तों की ........................हाँ...................हाँ...................हाँ...............तो एक बार जोर से बोलिए..........मूर्खों से भरपूर इस समाज की.............................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

जीवन वृक्ष की तरह है जिसकी शाखाएं तो हमें दिखती हैं लेकिन जड़े सदा हम से छुपी होती हैं | इल्लुमिनेटी के बारे में मैंने भी सुना है, जहाँ तक मुझे पता है Illuminati लैटिन शब्द है जिसका अर्थ 'सम्बोधि/एनलाइटनमेंट' होता है | Adam Weishaupt ने Bavarian Illuminati स्थापना की थी, इसका प्रतीक उल्लू था, उदेश्य नेक था, लेकिन नेक उदेश का हमेशा ने परिणाम हो ये ज़रूरी तो नहीं | इस गुप्त समाज की स्थापना दुनिया से अधविश्वास, बुराई, राजनीती पर धार्मिक दबाव को ख़त्म करने के लिए किया गया था | उस समय चर्च का राजनितिक मामलों में बहुत दखल होता था | लेकिन अक्सर ही ऐसा होता जो हम जिससे लड़ते हैं हम वैसे ही हो जाते हैं, ये जीवन के गहरे नियमों में से एक है, इसिलए काफी सोच समझ कर दुश्मन का चुनाव करना चाहिए...जिन बुराइयों से लड़ने के लिए इस गुप्त समाज की स्थापना की गयी बाद में ये ग्रुप उन्ही का शिकार हो गया...शक्ति के साथ हमेशा से खतरा रहा है ये हमें भ्रष्ट कर ही देता है | अभी कुछ दिन पहले मेरी गर्ल फ्रेंड ने मुझ से अपने कुछ राज़ शेयर किये, मुझे अच्छा लगा, मुझे पता भी नहीं चला कि कम मैं ने उसे दबाना शुरू कर दिया, वो तो जब वो मुझे खुद बताई कि मैं जाने अनजाने में उसे मनिप्यलेट करने की कोशिश कर रहा हूँ, पहले तो मैं ने मानने से इंकार कर दिया 'मैं ऐसा कैसे कर सकता हूँ' फिर जब मैं ने खुद को अलग कर के देखा तो एहसास हुआ मैं सच में उसकी कमजोरी जानने के बाद उसे मनिप्यलेट करने लगा था | मैं हैरान रह गया...| हैरानी की बात ये थी कि मैं गलत कर रहा था और मुझे इसका पता भी नहीं चल रहा था | शक्ति के साथ हज़ार खतरे हैं, लेकिन इस से बच कर भाग जाना बुद्धिमानी नहीं है | शक्तिहीन होने से अच्छा है शक्ति के साथ भ्रष्ट होना...| इसीलिए जानबुझ कर मैं ने गुप्त विषयों पर बातचीत शुरू कर दी है ताकि लोगों को वो जो छुपा हुआ संसार है उसकी कुछ खबर मिले और वो उस में उत्सुक हों, गलत उदेश के साथ ही लेकिन अदृश्य के प्रति साजग होना ज़रूरी है | हमें पता तो चले कि वो जो इतिहास हम पढ़ते हैं वो असली इतिहास नहीं है इतिहास के पीछे भी एक इतिहास है जिसकी हमें कोई खबर नहीं है |

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

मैं ने Illuminati जैसे असोटेरिक ग्रुप्स के बारे में पढ़ा है जो सत्रहवीं शताब्दी में सक्रीय थे. यह एक कथित षड़यंत्रपूर्ण संगठन था , जो "सिंहासन के पीछे एक अस्पष्ट शक्ति" के रूप में कार्य करता था , जो कथित रूप से वर्तमान सरकारों और निगमों के माध्यम से दुनिया के मामलों को नियंत्रित करते हैं. आमतौर पर , इल्लुमिनेटी अक्सर एक नई विश्व व्यवस्था (NWO) के संदर्भ में प्रयोग किया जाता है. कई साज़िश सिद्घांतकारों का मानना है कि इल्लुमिनेटी उन घटनाओं के पीछे के योजना बनाने वाले व्यक्ति हैं जो नई विश्व व्यवस्था की स्थापना को बढ़ावा देंगे. मुझे उलटे स्वास्तिक से ध्यान आया.......ये ambigram (चारो तरफ से एक जैसे दिखने वाले )शब्द या चित्र होते हैं जिन में उर्जा को केन्द्रित करने की अद्भुत शक्ति होती है.

के द्वारा: sinsera sinsera

आपका लेख और सद्गुरुजी का कमेन्ट पढ़ के अपने को बहुत ही अल्पग्य महसूस कर रही हूँ. ये तो सच है की बचपन में हम ओशो साहित्य कहीं से जुगाड़ कर के छुप के ही पढ़ते थे. डांट पड़ती थी लेकिन कारण समझ में नहीं आता था. कुछ समय बाद विनोद खन्ना जैसे लोगों के जुड़ने से पता चला कि उनके आश्रम में फ्री सेक्स को बढ़ावा दिया जाता है इसलिए वो अच्छे लोग नहीं है. थोडा बड़े होने पर पाया कि जैसा प्रचारित किया गया वास्तव में ओशो फिलोसफी तो उससे अलग कुछ और ही है....अपनी उर्जा को जगा कर सुख और शांति की तलाश अपने भीतर ही कर लेना एक बहुत बड़ी खोज है ..लोग रस्ते को देखते हैं लक्ष्य पर नहीं ध्यान देते. वैसे मुस्लिम ओशो को नापसंद करते हैं ये मुझे आज तक नहीं पता था..

के द्वारा: sinsera sinsera

बहुत अच्छा लेख.आलोचना करने को कुछ मिला नहीं.मै बचपन से ही ओशो की वाणियों को पढता आ रहा हूँ.पिता जी के भय से ओशो की किताब अन्य किताबों में छुपाकर पढता था.ओशो कहीं बंधते नहीं हैं,जैसा की सभी धर्म वाले करतें हैं,ओशो डराते भी नहीं हैं,जैसा की सभी धर्म वाले करतें हैं.ओशो स्वतंत्र होना सिखातें हैं,और भय दूर करतें हैं,ओशो इसीलिए मुझे प्रिय हैं.कोई संदेह नहीं वे एक सम्पूर्ण सद्गुरु हैं,और हमारे भीतर गहराई से प्रवेश करते चले जाते हैं.ओशो की किताब हाथ में हो तो खाना नहाना और दूसरे जरुरी काम सब आदमी भूल जाता है.मेरे ख्याल से ओशो इसीलिए सम्पूर्ण सद्गुरु हैं,क्योंकि वे अपने अनुयायियों को धन और सेवा के लालच में बांधते नहीं हैं,वो परत दर परत मोक्ष देते जाते है और हमें जीते जी मुक्त अवस्था का आनंद मिलता है.कबीर साहिब कहते हैं-अबहूँ मिला सो तबहूँ मिलेगा,नहीं तो यमपुर वासा.जीते से अन्तस् से आनंद और करुणा की धारा फूटनी चाहिए,जो सवयम को भी आनन्दित करे और दूसरों को भी.आप का पहला लेख पढ़ के ही मै आपको पहचान गया था.आपने बुद्धत्व,भगवत्ता और भीतरी समप्रदा जैसे शब्दों की चर्चा की थी,जो सामान्य लेखों में नहीं नजर आते हैं.ओशो ने ज्ञान के लिए खतना तक कराया था,पुराने जंग लगे चाकू से खतना हुआ था.इसीलिए वो पक गया था.पूरे ६ माह ओशो ईलाज कराते रहे और कष्ट सहते रहे.मुझे लगता है की उनकी मेहनत बेकार नहीं जाएगी और एक दिन भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लोग जीते जी मोक्ष का आनंद लेंगे,जो की अभी सोभाग्यशाली लोग ही ले प् रहें हैं.मेरा अपना अनुभव है कि ओशो ज्ञान तो देते ही हैं,सबसे बड़ी बात वो हमारे भातर का कई जनम का बसा अज्ञान भी दूर करते चले जातें हैं.ये एक सम्पूर्ण सद्गुरु ही कर सकतें हैं.लेख के लिए बधाई शब्द छोटा पड़ रहा है,इसीलिए मै मौन हो जाता हूँ.उससे बड़ा धन्याद क्या होगा!

के द्वारा: सद्गुरुजी सद्गुरुजी

आपको भी सादर नमस्कार.आपको दुःख पहुंचता हो तो मै कमेन्ट नहीं करूँगा.आप बुद्धिमान और प्रतिभाशाली हैं और देश की एक बौद्धिक सम्पदा भी हैं.मै आपके उत्तर का प्रतिउत्तर भी नहीं देना चाहता था.मेरे पास आनंद करुणा और के सिवा कुछ है भी नहीं.मै अपने आप में मगन रहता हूँ.मै जानता हूँ ओशो अन्नत जीवन हैं,वो न पैदा हुए न मरे.ओशो आश्रम वाले भी "ओशो साहित्य" शब्द का प्रयोग करते हैं.ओशो साहित्यकार थे,ये मैंने नहीं कहा.आपने उत्तर में कहा है-"मुझे बुद्धत्व का पता है, रही बात बुद्धत्व की तो मैं सच में दंग हूँ मैं ने कहीं नहीं कहा है कि आसाराम बुद्ध-पुरुष हैं…आपने ने एकदम कमाल ही कर दिया… मैं आपके खोजी दृष्टि के करिश्मे को देख कर सच में हैरान हूँ."प्रभु आप अपने ही लेख की शुरुआत देखिये-"पूजनीय श्री आशा राम जी बापू ग़लत नहीं हैं, उनकी साधुता में कोई कमी नहीं है | वो हमारे देश के एक गरिमापूर्ण और भगवत्ता को उपलब्ध संत हैं."ये आपके ही शब्द हैं प्रभु.जो भी हो मुझे आपका नाम व् विद्वता दोनों पसंद है.बुद्धत्व हम सबका नेचर जरुर है,परन्तु सब उसमे लीन नहीं रहतें हैं.बापूजी बुद्धत्व में लीन रहते तो ये समस्या ही पैदा नहीं होती.वो भगवत्ता को प्राप्त हैं या नहीं?यह सवाल भी नहीं पैदा होता.मै भी संतों का प्रेमी हूँ,आप भी संत हैं.मै सबका आदर करता हूँ,लेकिन बापू से चुक हो गई है.चुक मुझसे आपसे नहीं हुई है.दुर्भाग्य से हम किसी की चुक पर चर्चा कर रहें हैं.मित्र हमारे देश की जानता मानसिक रोगी नहीं है.आप बापू जी को जेल से बाहर आने दीजिये,फिर आप देखेंगे बापूजी के कार्यक्रमों में पहले से भी ज्यादा भीड़ होगी.जनता उनके जेल में बिताये अनुभव को सुनने को बैचैन होगी.मित्र.हमारे देश की आम जनता न बुद्धू है और न मानसिक रोगी,वो जरुरत से ज्यादा चतुर है,वो बुद्धत्व कभी आनंद ले लेती है और अशुद्धत्व का भी.

के द्वारा: सद्गुरुजी सद्गुरुजी

सद्गुरुजी नमस्ते- ऐसे बहुत ही कम मौके होते हैं जब मैं कुछ भी बोलने में असमर्थ महसूस करने लगता हूँ, आपका पांडित्य अनूठा है...| मैं हमेशा से पंडितों को नमस्ते बोल के निकल जाता हूँ, उनसे बात करना ऐसे हो जाता जैसे हम किसी ऐसे व्यक्ति से बात करे जो सुनने में असमर्थ हो या फिर कोई आँख बंद कर के कहे कि प्रकाश को सवित करो....आपका कमेंट पढ़ कर ही थक गया...रात जैसे ही मैं ने कमेंट पढ़ा कंप्यूटर बंद कर के सो गया, मैं ने कहा भागो पंडित जी आ गए...मैं बचपन में भी ऐसा ही करता था, जैसे ही कोई पंडित जी आते थे पूजा अदि कराने मैं घर छोर कर कहीं खेलने चला जाता था....|| प्रभु मुझे माफ़ कर दीजिए...पता नहीं कैसे आपकी दृष्टि मेरे लेख पर पड़ गयी...मैं ने पूरा इंतज़ाम कर रखा था कि कोई ज्ञानी पुरुष मुझे नहीं देख पाए...लेकिन आप खोजी हैं...||| अगर आप ऐसे नहीं तो कुछ ले दे के मान जाइये..मैं दान दक्षिणा देने को तैयार हूँ, लेकिन आप प्लीज मुझ पर रहम कर दीजिए.... I bow to honor the divine within you..!!

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

सद्गुरुजी नमस्ते...!! “आप ओशो साहित्य के प्रेमी हैं”- ओशो साहित्यकार थे...?? मुझे नहीं पता था, ये आपने एक नई बात बताई...! “वह भी अशो साहित्य से प्रभावित है”- साहित्य सत्य से प्रभावित होता है, सत्य किसी से प्रभावित नहीं होता है, जो प्रभावित हो जाये वो सत्य नहीं, सत्य आत्म-निर्भर होता है, आप से कहीं चुक हो रही है, कृपया फिर से जांच-पड़ताल करें... “इस लेख में आपने केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ही विचार किया है”- मैं ने कहीं कोई विचार नहीं किया है मैं कोई विचारक नहीं हूँ, मुझे देखने का एक ही ढंग अता है, दृष्टिकोण अध्यात्मिक हो सकता है, दृष्टि नहीं, दृष्टि हमेशा समग्र होता...| “अपने लेख में ये साबित करने की कोशिश की है कि आसाराम बापू बुद्धत्व को प्राप्त व्यक्ति हैं”- मैं ने लोगों को बुद्धू सवित करने की कोशिश ज़रूर की है, लेकिन आसाराम को संत सवित करना....सवाल ही पैदा नहीं होता, जो है उसको सवित करने की क्या ज़रुरत...बुद्धत्व हमारा स्वभाव है, स्वभाव को सवित नहीं करना पड़ता, पुरे लेख में मेरा जोर लोगों पर था न कि आशाराम पर, मैं ने लोगों को ध्यान में रख कर लेख लिखा था न कि आसाराम को...... “इसीलिए उनपर आरोप नहीं लगाना चाहिए”- ‘चाहिए’...??? आप ग़लतफहमी में है... महाप्रभु, आपने मेरे लेख में वो सब पढ़ लिया जो मैं ने कहीं नहीं लिखा है, मेरे पुरे लेख में ‘चाहिए’ शब्द का कहीं भी ज़िक्र नहीं है| “आपको कैसे पता कि आसाराम बापू बुद्धत्व को प्राप्त व्यक्ति हैं”- मुझे बुद्धत्व का पता है, रही बात बुद्धत्व की तो मैं सच में दंग हूँ मैं ने कहीं नहीं कहा है कि आसाराम बुद्ध-पुरुष हैं...आपने ने एकदम कमाल ही कर दिया... मैं आपके खोजी दृष्टि के करिश्मे को देख कर सच में हैरान हूँ.... “बुद्धत्व तो एक आंतरिक घटना है,जिसके शरीर के भीतर घटित होती है उसे भी भान नहीं रहता,दूसरों की तो बात ही छोड़ दीजिये” – कोई शक नहीं कि आप सुनी सुनाई बातों को दोहरा रहें हैं....इसिलए इस वक्तव्य पर नो कमेंट | आप के पुरे कमेंट में एक एक वाक्य असंगत है अगर मैं सब का जवाब दूं तो बहुत लम्बा हो जाये गा....जो नहीं है उसको देख लेने की आपकी क्षमता अद्भुद है

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

आप ओशो साहित्य के प्रेमी हैं.आपके लेखों में ओशो के तर्कों की झलक मिलती है.आप का लेख अथातो प्रेम जिज्ञासा भी मै पढ़ा,वह भी अशो साहित्य से प्रभावित है.गलत नहीं हैं आसाराम,इस लेख में आपने केवल आध्यात्मिक दृष्टि से ही विचार किया है.जो सत्य आँखों के सामने है,आप ने उस पर विचार नहीं किया है.आपने अपने लेख में ये साबित करने की कोशिश की है कि आसाराम बापू बुद्धत्व को प्राप्त व्यक्ति हैं,इसीलिए उनपर आरोप नहीं लगाना चाहिए.आपको कैसे पता कि आसाराम बापू बुद्धत्व को प्राप्त व्यक्ति हैं?बुद्धत्व तो एक आंतरिक घटना है,जिसके शरीर के भीतर घटित होती है उसे भी भान नहीं रहता,दूसरों की तो बात ही छोड़ दीजिये.आप सांसारिक नजरिये से भी देखिये.क्या आसाराम का विरोध करना मंदबुद्धि है?सबको मंदबुद्धि कहना ये भी एक अहंकार है.व्यक्तिगत घडी ख़राब हो तो चलता है,परन्तु संत चौराहे पर लगी घडीं हैं,जहाँ हर आदमी की नज़र पड़ती है.चाहे बुद्ध हों या कोई भी संत सबने पीड़ितों का साथ दिया है ओर आप पीड़ितों को ही मंदबुद्धि कह रह रहें हैं.आसाराम बापू पर आरोप लगाने वाला उनका शिष्य है,देश की जनता नहीं.जिसकी बहन-बेटियों के साथ इस तरह की घटनाएँ होतीं हैं,वही उसका दुःख समझता है.कहा गया है कि-जाके पैर न फटे बेवाई,वो क्या जाने पीर पराई.आप के लेख को पढ़ के ऐसा लगा कि आप संतो को ये छुट देना चाहतें हैं कि जो बुद्धत्व को प्राप्त हैं,वो कुछ भी करें,उसका विरोध नहीं होना चाहिए.ये गलत धरना है.कोई बुद्धत्व को प्राप्त है या नहीं आपको कैसे पता,ये तो एक आंतरिक घटना है,जिसके साथ घटा उसे भी भान नहीं.गलत काम करने वाले भगवान को और यहाँ के भ्रष्ट सिस्टम को धन्यवाद दें कि वो सजा से बच जातें हैं.ये लोग यदि मुस्लिम देशों में गलत काम करते तो वहां की सजाओं से इनकी रूह तक कांप जाती.आप आध्यात्म की बात करें तो रियलटी की भी बात करें.आप तार्किक और बुद्धिमान हैं,परन्तु वास्तविकता का भी ध्यान रखें.

के द्वारा: सद्गुरुजी सद्गुरुजी

आपका लेख तार्किक है और इसमें ओशो साहित्य की झलक मिलती है.आपके लेख का सार है कि मै सो रहा हूँ,मै प्रेम करता हूँ और मै मर गया हूँ ये सब कहना झूठ है.झूठ तो देखिये सारा जगत है.हजारों वर्ष पहले ही आदि शंकराचार्य जी ने कहा था-ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या.आप ने जो उदहारण दियें हैं वो अपूर्ण हैं.हर जीव की तीन स्थितियां हैं-जागते-बोलते समय वाचिक,सोचते समय मानसिक और सोते समय आत्मिक.आपने आत्मिक स्थिति की तुलना जाग्रत स्थिति से की है.मै सो रहा हूँ और मै सो गया हूँ दोनों में बड़ा अंतर है.आप जाग्रत अवस्था और समाधी अवस्था दोनों का घालमेल मत कीजिये.भगवान श्री कृष्ण के रासलीला प्रेम की तुलना आप सामान्य आदमी से क्यों कर रहे हैं?अगर कोई सामान्य व्यक्ति ये कहता है कि मै तुमसे प्यार करता हूँ,तो वो झूठ नहीं बोल रहा है,क्योंकि वो आध्यात्मिक प्रेम कि बात नहीं कर रहा है,वो सांसारिक प्रेम की बात कर रहा है.आप दोनों का घालमेल कर लोगों के लिए सिरदर्द मत पैदा कीजिये.जब मै था तब हरि नहीं अब हरि हैं मै नाही.ये कहावत संतो के लिए है आम आदमी के लिए नही.अथातो ब्रह्म जिज्ञासा को आपने अथातो प्रेम जिज्ञासा कर दिया है.बहुत से संतो के साथ मुझे रहने का सौभग्य मिला.सूफी संत मुझे भी प्रिय हैं.आपका नाम सूफी ध्यान मुहम्मद मुझे अच्छा लगा.अपने तर्कों से आपने जनता में हलचल मचाई,उसे सोचने को मजबूर किया,ये भी मुझे अच्छा लगा.

के द्वारा: सद्गुरुजी सद्गुरुजी

"सन्यासी के पास करोड़ों की संपत्ति का होना कभी हज़म नहीं होता" ...स्वभाविक है हम ने सदियों सदियों से दरिद्रता की पूजा की है, भिखमंगेपन को धर्म मना है... मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता जब मैं भारत को गरीबी के दलदल में धसा हुआ पता हूँ....| मेरी दृष्टि में संत अगर समृद्ध न हो तो वो संत कहलाने योग्य ही नहीं है...जिसने भीतरी समप्रदा को पाया है कोई कारण नहीं है कि वो बहार भिखमंगेपन में जिए..|| गरीब होना और गरीबों की इज्ज़त करना पाप है....जब तक हम अमीरों के प्रति अपने दिल में समादर पैदा नहीं करेंगे हम कभी भी समृद्ध नहीं हो पाएंगे....सच तो ये है कि हम अमीरों से जलते है, नहीं तो एक तरफ हम संपन्न देशों और उनकी भौतिकवादी मानसिकता की निंदा करते हैं और दूसरी तरफ हम धन की देवी लक्ष्मी की पूजा करते हैं....

के द्वारा: Sufi Dhyan Muhammad Sufi Dhyan Muhammad

के द्वारा: Madan Mohan saxena Madan Mohan saxena

तीसरे तल पर जिस बोध का जन्म होता है वो है “मैं जिम्मेवार हूँ” ये महाक्रांति है….यहाँ समाज मिट जता है…, भगवान मिट जाता है, तुम्हारा गुरु मिट जाता है… …सरकार मिट जाती है….यहाँ ‘तुम’ विलीन ही हो जाता है…..’तुम’ जैसा कुछ रह ही नहीं जाता…यहाँ तुम्हारा धर्म, तुम्हारे संस्कार, तुम्हारा परिवार सब समाप्त हो जाता है….जो भी है जैसा भी उस सब के लिए तुम जिम्मेवार हो जाते हो…और सिर्फ तुम….यहाँ तुम पूर्ण बोध के साथ कहते हो, ‘मैं जिम्मेवार हूँ’ ‘अच्छा बुरा जो भी हो रहा है सब के लिए मैं जिम्मेवार हूँ’….’मैं जैसा भी हूँ उसके लिए मैं जिम्मेवार हूँ’, ‘मेरे साथ जो भी होता है उसके लिए मैं जिम्मेवार हूँ’ ‘मैं अपने जन्म के लिए जिम्मेवार हूँ’ ‘मैं अपनी मृत्यु के लिए जिम्मेवार हूँ’ ‘ये दुनिया जैसी भी मैं उसके लिए जिम्मेवार हूँ’ ‘लोग मेरे साथ जैसा भी वर्ताव करते हैं मैं उसके लिए जिम्मवार हूँ…...............सच कहा मित्र............पर हम मूर्खों को बात समझ में आये तो..........यहाँ तो हम में से हरेक स्वार्थ, सत्ता और वर्चस्व के नशें में चूर हैं.....................

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

wise man .......आपका कहना सही है शायद इन सबके पीछे हमारे देश में जन्म से ही लड़कियों को यही सीख दी जाती है लड़के तुमसे श्रेष्ठ है पुत्रियों को पुत्रो की तुलना में हेय माना जाता रहा है शायद इसी कूट कूट कर भरी गई हीनभावना और इसी पुरुष दंभ के कारण ही हर क्षेत्र में लडकियों की प्रताड़ना की जाती रही है ! पति तुम्हारा मालिक है तुम्हारा भगवान है यही सीख भी उसे एक औरत (माता) द्वारा दी जाती है ! आज एक लड़की का बलात्कार तो होता सुना है किसी पुरुष का बलात्कार तो नहीं होता !और फिर ये सब गलिया भी तो पुरुषो की इजाद है किसी महिला की इजाद तो हो नहीं सकती और यही पुरुष एक लड़की के बलात्कार पर शोक मनाते है ये विडंबना नहीं तो और क्या है ? आपका कहना सही है इसके लिए लड़कियों को खुद को बदलना होगा अपनी मानसिकता बदलनी होगी वर्ना उनके साथ यही सब होता रहेगा ....

के द्वारा: D33P D33P

आदरणीय मीनू झा जी.....!!! (1st of all, I would like to thank Anil for sharing this post, यही मैं सोच रहा था कि आखिर इतने लोग आ कर इसे पढ़ कैसे रहें हैं.....!!!!!) "आपको इतनी बेरुखी से उत्तर देना" I don't know मित्र अनिल ने लोगों से क्या कहा है...पर मुझे नहीं लगता कि उसने किसी से ये कहा होगा कि संदीप आपकी आरती उतारेगा....मैं ने लोगो से वही कहा जो उन से कहा जाना चाहिए....अगर कोई इस मुगालते में हो कि वो संदीप का लेख पढ़ कर संदीप पर एहसान कर रहे हैं तो वो गलती में हैं...कोई मेरी तारीफ कर के मुझे सच बोलने से नहीं रोक सकता है... "आप अगर लोगों के विचार चाहते है".....मेरे पास क्या विचारों की कूड़ा-कचड़ा की कमी है जो मैं लोगों से विचार मांगू...???? मुझे लोगों से वोट ले कर चुनाव नहीं जितना है जो मैं उचित और अनुचित की परवाह करूँ.... "….पर प्रबुद्ध जनों को दिया गया टका सा उत्तर मुझे उचित नहीं लगा….शोभा नहीं देता…" 'प्रबुद्ध जनों' हाहा हाहा हाहाह अपने मुंह मिया मिठ्ठू हाहाह हाहाह हाहाहा हाहाह तो आपने क्या उन प्रबुद्धों की मान बचने का झंडा उठा रखा है....????? "आगे आपके जवाब देखकर रचना पर कोई भी टिप्पणी करने का दुहसाहस मैं नहीं कर सकतीं…" जो करना था वो तो आपने किया नहीं पर जो नहीं करना था वो आपने किया... (आपके प्रबुद्ध जन बिना सोचे समझे मुझे सलाह दे रहे थे....उनको टाका सा प्रतिउत्तर देना ज़रूरी था...... जिनको आप प्रबुद्ध कह रही हैं असल में वो बुद्धू कह लाने के लायक भी नहीं है, ये सब पोंगा पंडित है इनको बस शब्दों का मायाजाल फैलाना आता है...ये तोता हैं तोता ........ये हमारा दुर्भाग्य है कि हमें शब्दों का ठीक से उपयोग करना नहीं आता है....सुन्दर से सुन्दर शब्द को हम विकृत कर देते हैं...'प्रबुद्ध' जैसे विराट शब्द को आपने धुल में मिला दिया...)

के द्वारा: Sandeep Kumar Sandeep Kumar

प्रिय संदीप जी व अनिल जी ये आपकी रचना है या अनिल जी की ये मुझे ज्ञात नहीं और जवाब कौन दे रहा है ये भी नहीं जानती,पर जिस तरह अनिल भाई जा जाकर हरेक ब्लॉग पर आपकी रचना पर ध्यान देने का आग्रह कर रहे है.......आपको इतनी बेरुखी से उत्तर देना शोभा नहीं देता...आप अगर लोगों के विचार चाहते है तो उनका उत्तर भी शांति से दें तो उचित होगा....मेरा उद्देश्य आपको कुछ सिखाना या उपदेश देना नहीं है ,ना किसी विवाद में पङना ही  मेरी मंशा है....पर प्रबुद्ध जनों को दिया गया टका सा उत्तर मुझे उचित नहीं लगा.... आगे आपके जवाब देखकर रचना पर कोई भी टिप्पणी करने का दुहसाहस मैं नहीं कर सकतीं........मुझे आमंत्रित करने के लिए आप दोनों का धन्यवाद

के द्वारा: minujha minujha

दुश्मन जी , अपने स्वार्थ और सम्मान से बाहर निकलो फिर तुम्हें पता चलेगा कि क्या उचित है और क्या अनुचित है? यहाँ सवाल मान-सम्मान का नहीं बल्कि सच और झूठ का है. और कौन कह दिया कि मैं मजाक किया हूँ. यह मजाक नहीं जे जे के रवैये पर व्यंग्य है और व्यंग्य कहकर नहीं किया जाता. लोग जो कहकर किया करते हैं वो सचमुच गुनाहगार होते हैं और उनके अन्दर एक चोर होता है जिसकी मैं निंदा करता हूँ. तुम यार जिस समय कि बात कर रहे हो उस समय तुम अलगावाद का समर्थन कर रहे थे जबकि मेरा कहना था कि कि लड़ाई लड़ना है तो इस मंच पर रह कर लड़ों जबकि तुम जाना चाहते थे. जातिवाद, धर्मवाद, क्षेत्रवाद, अलगाववाद इत्यादी का मैं विरोधी हूँ और रहूँगा क्योंकि यह कुकृत्य है मानवता के लिए. जबकि मेरे केस में मैं इस मंच को छोड़ नहीं रहा बल्कि मुझसे छुड़वाया जा रहा है और वापसी एक ऐसी शर्त पर जिसक्के अंतर्गत झूठ के आगे सर झुकाना होगा. जो कि मुझे कतई मंजूर नहीं. यदि तुम्हारा कहना यह है कि मेरे ऐसा करने से कुछ हाशिल नहीं होगा तो मेरा कहना यह है कि तुम्हारे बात मानने से तुम्हें कुछ हाशिल नहीं होगा क्योंकि मैं आते ही अपना रुख पहले से भी तेज़ करूँगा तो फिर खेद प्रकट करने का सवाल तुम्हारे, जे जे, ब्लागेर और खुद के साथ बेईमानी होगी. क्योंकि मेरी वापसी हुई तो जो लोग मामा, मई, भैया, दीदी, नाना, नानी का झूठ मुठ का रिश्ता बना कर अपना स्वार्थ उर सम्मान सिद्ध कर रहे हैं उनको चैन से नहीं रहने दूंगा. क्योंकि मुझे बिलकुल पसंद नहीं कि कोई सामने से कुछ और हो तथा पीछे से कुछ और. मैं कभी नहीं कहता कि मैं अच्छा इंसान हूँ पर मैं इतना जरुर कहना चाहूँगा कि जो खुद को अच्छा कहते हैं उनसे कहीं बेहतर हूँ..... और रही बात तुम्हे उस समय समझाने कि तो यदि तुम्हारे साथ ऐसा हुआ होता जो मेरे साथ अभी हुआ है तो तुम्हें कभी झुकने के लिए नहीं कहता ..परन्तु तुम जोड़ने के लिए एक बंधा हुआ रिश्ता तोड़ रहे थे और तुम पर कोई झूठा इल्जाम नहीं लगा था और न ही किसी बिना स्पष्टीकरण के तुम्हारा ब्लॉग बंद किया गया था ...वो सिर्फ तुम थे जो सबकुछ ख़त्म करना चाहते थे......परन्तु जे जे ने बिना कोई नोटिस दिए और स्पष्टि कारन मांगे मेरे साथ दो बार किया है एक बार मेरी पोस्ट हटाई और दूसरी बार मेरा ब्लॉग.............. और रहा सम्मान कि नात तो यदि मैं उसके लिए लड़ता तो अभी जे जे पर मान-हानि का दावा करता कि बिना स्पष्टीकरण मांगे मेरा ब्लॉग बंद क्यों किये. पर मैं जेजे कि तरह अँधा और बहरा नहीं कि कुछ चाटुकारों कि वजह से किसी का ब्लॉग बंद कर दिया हूँ...........वो हर कोई जो इस मंच को छोड़कर जाना चाहा, मैं हमेशा उसका विरोध किया. चाहे मैं उसका समर्थक हूँ या असमर्थक ..क्योंकि मेरा मानना है कि यह साहित्य रणभूमि है तो कलम फेककर क्या लड़ना......पर मुझे तो लगता है सब इस इंतज़ार में बैठे थे कि यह किसी तरह से लिखना बंद कर दे.......सचमुच महान सोच हैं, महानों, धर्म-मर्यादा वालों और सदाचारियों की...हाँ..हाँ..हाँ.....! कमबख्त यहाँ तो वो भी मेरे पीछे छुड़ा घोंपा जिसके लिए आगे आके लड़ता आया हूँ. यह सब तो मैं पाहिले से ही जनता था कि इन मिट्ठी जुबानों के पीछे क्या हैं? पर कुछ भाइयों और मित्रों को पहचान नहीं पाया था जो अब पहचान लिया..पर मुझे किसी से कोई शिकायत नहीं ....जो उनका नेचर है वो करेंगे और जो मेरा नेचर हैं मैं करूँगा...क्योंकि सांप को देखकर मैं सांप नहीं बन सकताबस मेरा एक ही काम है हरेक चेहरे को बेनकाब करना पर नुकशान नहीं........वो हमेशा करता रहूँगा.......! कभी सामने से गुजरते हुए सांप पर दया किये हो. यदि नहीं तो सोचना कि तुम्हारे और उसमे क्या अंतर है.........................और अंत में दिनेश भैया और तुम्हारा धन्यवाद जो सच को स्वीकारे यह अलग बात है कि चेहरा छुपाकर ..हाँ..हाँ...लगता है फिर मेरे कारण तुम किसी को चेहरा दिखने लायक नहीं रहे......हाँ..हाँ...हां... तुम क्या समझा रहे हो. तुम्हे खुद पता ही नहीं..........तुम्हारा अजीज दुश्मन

के द्वारा: Sandeep Kumar Sandeep Kumar

संदीप जी किस प्रेम की बात कर रहे हैं आप जो हमें दूसरे से नफरत करना सिखाती है। जाने कितनों को आजमाया मैंने लेकिन मुझे सच्ची मुहब्बत कहीं नजर नहीं आती है। प्रेम करो अपनी परंपराओं से जो जकड़ लेता है हमारे विचारों को वट वृक्ष की जड़ों की तरह, अपने धर्म, अपनी जाति और अपने ईश्वर से करो मुहब्बत, जो हमें हिंसक बनाती है। यह बहुत खूबसूरत है, नाजुक है जवान है, इसलिये इससे करो बहताशा मुहब्बत, कहते हैं प्रेम अमर है, पर अमर कहाँ हुआ यह तो एक दिन नष्ट हो जाती है। प्रेम की सुख की दुख की परिभाषायें बहुत है  और एक दूसरे से जुदा भी, मेरे दोस्त  किस पर यकीन करूँ यह बात मेरी बुद्धि से निकल जाती है। http://dineshaastik.jagranjunction.com/2012/07/13/हम-ऐसे-खुदा-को-क्यों-मानें/

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

मित्र अनिल, यह पूरा प्रकरण जानने के बाद मैं बस यही कहना चाहूँगा की आपने जो किया वह निश्चय ही एक व्यंग था किन्तु मैं यह भी कहना चाहूँगा की जे जे के फीडबैक पर इस प्रकार उनका नाम लिख कुछ लिखना उचित नहीं आप इसे मान सम्मान का प्रश्न ना बनाय अभी बहुत लंबा जाना है बेकार की चीजों में न पड़े ..............सवाल माफ़ी मांगने का नहीं और ना ही जे जे ने आपको माफ़ी मांगने के लिए कहा है बस खेद प्रकट करना है जो जरुरी भी है क्यूंकि यहाँ हम मजाक करने तो आये नहीं हैं ............जे जे क्या कर रहा है उसपर पहले ही काफी हाय तौबा मच चुका है .............तब आपही ने कहा था की हमारा उदेश्य लिखना होना चाहिए सो आप छोडिये इन बातों को और एक खेद पत्र लिख पुनः मंच पर अपने उदेश्य को पूर्ण करने का कार्य करें बिना किसी स्वार्थ के .....................यदि समझ सके तो आपका मित्र

के द्वारा: ANAND PRAVIN ANAND PRAVIN

अनिल जी मुझे लगता है कि आपके विचार पूर्णतः पवित्र हैं, आपकी प्रवृति भी उत्तम है, संभवतः आपकी शैली मैं कहीं कमी है जो आपको नजर नहीं आती। क्योंकि आपकी आँखों पर आपका अपना चश्मा है। आप दूसरे का चश्मा लगाकर देखें। मेरा मानना है कि जागरण परिवार ने आपके शब्दों को पकड़ा है आपके भावों को नहीं। वह शब्दों से भ्रमित हो गये। उन्होंने आपके व्यंग को 420 समझ लिया। हाँ आपको प्रतिबंधित करने से पहिले एक बार अपनी सफाई पेश करने का अवसर मिलना चाहिये था। संभवतः वह नहीं मिला। आपका मुझसे कई विचारों पर मतभेद है। जो मंच पर सार्थक बहस से स्वतः सिद्ध हो जाता है। आप मेरे कुछ और मैं आपके कुछ विचारों का आलोचक हूँ। मैं आपने आलोचक  को अपना परम मित्र मानता हूँ। क्या मुझे मंच पर एक मित्र से  वंचित होना पड़ेगा? मंच पर आपके न रहने से नीरसता आ जायेगी। आपकी प्रतिक्रियायें रोचक एवं मनोरंजक तो होती ही थी, बहस को भी सार्थक बनाकर आगे बढ़ाती थीं। जागरण परिवार से निवेदन है कि आपको अपनी सफाई को एक मौका देकर अपनी पूर्व की परंपरा का निर्वाह करे।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

के द्वारा: sinsera sinsera

अब जरा साधना जी की चमत्कारी लेख भी पढ़ लीजिए........... "आत्म-साक्षात्कार…. पोस्टेड ओन: 9 Jun, 2012 जनरल डब्बा में “साक्षात्कार” मतलब दो व्यक्तियों के बीच प्रश्न और उत्तर के माध्यम से विचारों का आदान प्रदान… या यूँ कहें किसी एक व्यक्ति को जानना!! हम सभी ने साक्षात्कार तो बहुत लिए और दिए होंगे लेकिन क्या कभी आत्म साक्षात्कार किया है……? मैंने अक्सर लोगों को ये कहते हुए सुना है कि मैं उसे बहुत अच्छी तरह जानता हूँ / जानती हूँ ….. ये कैसे संभव है….? अगर किसी ने आत्म साक्षात्कार किया होगा तो वह व्यक्ति ऐसा कभी नहीं बोलेगा!! हम खुद को ही नहीं जानते….. किसी दूसरे को जानना बहुत मुश्किल है…. असंभव है…. !! अभी कुछ दिनों पहले मुझे मेरे एक मित्र ने बोला कि “तुम दुखवादी हो!” मुझे बड़ा कष्ट हुआ सुनकर…. क्रोध भी आया… विश्वास ही नहीं हुआ… कोई कैसे कह सकता है ये ….. !! मैं सोच रही थी मैं तो हर वक़्त हँसती मुस्कराती रहती हूँ…. मेरा चित्त प्रसन्न रहता है…. जो दिमाग में आता है बोल देती हूँ…. फिर मैं कैसे दुखवादी हो गयी….?? मैंने अपने मित्र की बात पर गहन विचार किया…. मैं अपने हर एक कदम पर नज़र रखने लगी… फिर मैंने गौर किया कि मैं जो बातें बोल देती हूँ वो अक्सर दुःख की ही होती हैं…. इसका मतलब कही अन्दर गहरा दुःख समाया हुआ है…. जिससे मैं अनजान हूँ!! हम खुद को ही नहीं जानते तो किसी दूसरे को कैसे जानेंगे…. लोगों की बोली हुई बातों पर हमारा उपरी मन बहुत जल्दी भरोसा कर लेता है… जैसा किसी ने कह दिया वैसी ही भ्रांतियां हम पाल लेते हैं…किसी ने अगर तारीफ कर दी तो हम उसे ही सच मान बैठते हैं….लेकिन अगर कुछ बुरा बोल दिया तो उसका विरोध करते हैं भले ही हमारा अंतर्मन उस बात को सही समझता हो…..क्योंकि हम अपना एक image बनाकर रहते हैं…. महानता का image …… लेकिन सच्चाई कुछ और होती है..हमारा भीतरी मन हर एक बात को समझता है …… और इस सच्चाई से वाकिफ हम तब होते हैं जब आत्मा साक्षात्कार करते हैं….!! आत्मसाक्षात्कार से हमे शक्ति मिलती है जो जैसा है उसे उसी रूप में स्वीकार करने की….. क्योंकि हम खुद को पहचान चुके होते हैं…. "

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

“रे मन गाफिल गफलत मत कर” ...................................................................................... Look at the absurdity of Sadhana ji's mind....! अभी 'ReEvaluation' ब्लॉग की लेखिका साधना जी ने एक बड़ा ही अजीबो-गरीब लेख लिखा 'आत्म-साक्षात्कार….' इस लेख की अनर्थकता समझने जैसी है, क्योकि इससे हमे पता चलेगा कि एक बेहोश आदमी का दिमाग कैसे काम करता है...........इस लेख में एक भी वचन संगत नहीं है.......... एक तरफ इस लेख कि लेखिका उद्घोषणा करतीं हैं कि, "अक्सर लोगों को ये कहते हुए सुना है कि मैं उसे बहुत अच्छी तरह जानता हूँ / जानती हूँ ….. ये कैसे संभव है….? अगर किसी ने आत्म साक्षात्कार किया होगा तो वह व्यक्ति ऐसा कभी नहीं बोलेगा!! हम खुद को ही नहीं जानते….. किसी दूसरे को जानना बहुत मुश्किल है…. असंभव है…. !!" और दूसरी तरफ ये मेरे बारे में क्या वक्तव्य देतीं हैं ये भी पढ़िए....."संदीप जी आपके लेख और कमेंट्स पढ़ कर लगता है आप बुद्ध हो चुके हैं…..".......... अब ये तो हद दर्जे की वेवकूफी हो गई.......एक तरफ इनका कहना है कि दूसरों को नहीं जाना जा सकता है.....अगर दूसरों को नहीं जाना जा सकता है.....तो फिर इनको ये कैसे पता चला कि मैं बुद्ध हूँ....?????? और ये भी सोचने वाली बात हैं.....अगर इनकी ये बात इतनी ही सच है तो फिर ये किसी और के ये कहने पर कि ये दुखवादी हैं.....ये आत्म-साक्षात्कार क्यों करने लगीं......???....अरे किसी और ने ही कहा था न.....दूसरों की बात पर भी क्या भरोसा करना .....यहाँ कौन किसको जान सकता है....... एक और बात जो कि मैं जानना चाहता हूँ....चूंकि इनहोने अब आत्म-साक्षात्कार कर लिया है....इनता तो तय हो गया कि अब ये आत्मा नहीं हैं.....क्योंकि इन्ही के अनुसार,,,"“साक्षात्कार” मतलब दो व्यक्तियों के बीच प्रश्न और उत्तर "........it means now two.....'seer and seen'.....? And if there are tow, seer and seen, then third is bound to be there.....because third is the by-product of these to....so now there are there, seer(द्रष्टा) seen(दृश्य) and seeing(देखना)............मज़ेदार......!Now, can she tell me…what and where she is….????? एक और मजेदार बात है..jab मैंने इनको इनके बेहोशी से अवगत कराया तो ये फिर से आत्म-साक्षात्कार करने के बजाय मुझ पर तिलमिला गयीं और बेहोशी मे कुछ से कुछ अनाप-सनाप बकने लगीं.......पहले आप मेरे इनके लेख पर किए गए कमेंट को पढ़िए फिर इनहोने बोखला कर मुझे क्या reply किया ये भी पढ़िए.......... follyofawiseman के द्वाराJune 9, 2012 साधना जी, एक प्रसिद्ध कहावत है……’आसमान से गिरे और खजूर पर अटकें……’ आप पहले से बीमार थी और आपके मित्र ने आपको एक नई बीमारी दे दी…..पहले आपकी बीमारी ये थी की आप खुद को सुखवादी मानती थी….लेकिन अब अपने उससे भी गहरी बीमारी पाल ली है खुद को दुखवादी मानने की……वैसे ‘दुखवादी’(Sadist) उसको कहते है जो दूसरों को दुखी देख कर खुश होता हो….जो खुद को कष्ट पहुँचता है हम उसको masochist कहते है….औरतें आम तौर पर masochist होतीं है….she enjoys torturing herself. She finds ways to torture herself. एक और बात ये आपने आत्मा से साक्षात्कार किया कैसे……? ये बात तो ऐसे हो गई जैसे, कुत्ते ने ख़ुद से ख़ुद की puchh पकड़ ली हो……? अगर आपने आत्मा से साक्षात्कार किया तो फिर आप कौन हैं….. .......................................................................................................................................... sadhna srivastava के द्वाराJune 9, 2012 संदीप जी आपके लेख और कमेंट्स पढ़ कर लगता है आप बुद्ध हो चुके हैं….. जिसने औरतों पर काफी शोध किया है….. और हाँ कुतों पर भी….. या ये कहूँ की हर किसी पर…. हर बीमारी…. हर प्राणी…. हर विचारधारा…. हर एक चीज़ पर आपका पूर्ण आधिपत्य लगता है…..!! आपकी कहावत तो एकदम सही है लेकिन यहाँ फिट नहीं बैठ रही…..!! बहुत अच्छा किया दुःख वादी शब्द का मतलब बता कर…. क्योंकि जिसने मुझे दुःख वादी कहा है उनके महानुभाव के अन्दर ऐसी आदतें हैं….. मैं आत्मसाक्षात्कार के पहले और बाद में … हमेशा ‘साधना’ ही रहूंगी…… (और इस सब के ठीक बाद मेरे उपरोक्त पोस्ट पर इनहोने क्या कमेंट किया ये भी पढ़ लीजिए.....) sadhna srivastava के द्वारा June 9, 2012 बस इतना ही काम रह गया है क्या…… (और यहाँ आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि ये वही साधना जी हैं....जो अभी कुछ दिन पहले मेरी तारीफ मे मेरे हर एक लेख पर दस-दस कमेंट करती थीं......और आज देखिए......मैंने जरा सा चोट क्या की....... इनकी बुनियाद ही हिल गई.......और अगर एक दो और चोट मैंने ढंग से कर दिया तो आश्चर्य नहीं होगा अगर ये भी मेरे विरोध मे कोई आंदोलन शुरू कर दें तो.......ये है हमारे मन का हाल हैं......साधना जी का ही नहीं हम सब का यही हाल...है......'पल में मासा पल में तोला') .......................................................................................................................... ये सब पढ़ कर अगर आपके अंदर साधना जी की तरह अगर जरा भी आत्म-साक्षात्कार करने की क्षमता है तो आप समझ ही गाए होंगे की आप और आपके इस जागरण मंच की महान लेखिका आत्म-साक्षात्कार करने मे कितने सक्षम हैं.........

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

सखी पिया को जो मैं न देखूँ तो कैसे काटूँ अंधेरी रतियाँ, के’ जिनमें उनकी ही रोशनी हो, कहीं से ला दो मुझे वो अँखियाँ। दिलों की बातें, दिलों के अंदर, ज़रा-सी ज़िद से दबी हुई हैं, वो सुनना चाहें ज़ुबाँ से सब कुछ, मैं करना चाहूँ नज़र से बतियाँ। ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, सुलगती-साँसे, तरसती-आँखें, मचलती-रूहें, धड़कती-छतियाँ। उन्हीं की आँखें, उन्हीं का जादू, उन्हीं की हस्ती, उन्हीं की ख़ुशबू, किसी भी धुन में रमाऊँ जियरा, किसी दरस में पिरो लूँ अँखियाँ। मैं कैसे मानूँ बरसते नैनो के’ तुमने देखा है पी को आते, न काग बोले, न मोर नाचे, न कूकी कोयल, न चटखीं कलियाँ ।.................... मैं कौन हूँ..................................?

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

संदीप जी ,.सादर नमस्कार भाई यह पोस्ट बुद्दिजीविओं के चिंतन लायक है ,..आपकी पहली पोस्ट भी पढ़ी थी लेकिन खुद को कमेन्ट लायक नहीं पाया था ,..खैर अब सोचता हूँ की मूरखों को भी अपनी बात कह देनी चाहिए ,.. पारलौकिक दुनिया में ईश्वर क्या है हमें नहीं पता ,.सुनी सुनाई और लिखी पढ़ी बातों पर विशवास के अलावा हमारे पास और कोई रास्ता नहीं ,.आस्तिकों के लिए जरूरत भी नहीं है ,..नास्तिकों के लिए तर्क दे पाना असंभव है . इस दुनिया में ईश्वर वह है जो हमारी मानवीय जरूरतों को समझे और उसकी पूर्ती करे ,...यह काम स्वयं के माध्यम और प्रकृति के द्वारा होता है ,अतः निश्चित ही ईश्वर हरेक में और कण कण में हैं ,...कोई माने या न माने किन्तु ईश्वरीय अनुभूति हमें अक्सर होती है जब अन्य सभी भावनाएं लुप्तप्राय हों और तन मन सिर्फ प्रसन्नता से सराबोर हो तो निश्चित ही ईश्वरीय तत्व जाग्रत होता है यह तत्व कहीं बाहर नहीं बल्कि हमारे अन्दर ही होता है ,...इससे आत्मा और परमात्मा के बीच का अटूट सम्बन्ध भी उजागर होता है ,...इस विषय पर अपने अल्प ज्ञान से जितना ठीक समझा लिख दिया है ,..आपकी चेतावनी डराती भी है ,.आपसे इस विषय को और प्रकाशित करने की प्रार्थना भी है ,...सादर आभार सहित

के द्वारा: Santosh Kumar Santosh Kumar

संद्देप मित्र , आपके आलेख से मुझे ज्ञान मिला , बड़ी ही गूढ़ और सूक्षम बात पता लगी , बाकी इश्वर के विषय में चाहता हूँ की आप ही निर्णय करे , जो तथ्य में आपके कमेन्ट में पोस्ट कर रहा हूँ उसे पढ़कर Professor : You are a Christian, aren’t you, son ? Student : Yes, sir. Professor: So, you believe in GOD ? Student : Absolutely, sir. Professor : Is GOD good ? Student : Sure. Professor: Is GOD all powerful ? Student : Yes. Professor: My brother died of cancer even though he prayed to GOD to heal him. Most of us would attempt to help others who are ill. But GOD didn’t. How is this GOD good then? Hmm? (Student was silent.) Professor: You can’t answer, can you ? Let’s start again, young fella. Is GOD good? Student : Yes. Professor: Is satan good ? Student : No. Professor: Where does satan come from ? Student : From … GOD … Professor: That’s right. Tell me son, is there evil in this world? Student : Yes. Professor: Evil is everywhere, isn’t it ? And GOD did make everything. Correct? Student : Yes. Professor: So who created evil ? (Student did not answer.) Professor: Is there sickness? Immorality? Hatred? Ugliness? All these terrible things exist in the world, don’t they? Student : Yes, sir. Professor: So, who created them ? (Student had no answer.) Professor: Science says you have 5 Senses you use to identify and observe the world around you. Tell me, son, have you ever seen GOD? Student : No, sir. Professor: Tell us if you have ever heard your GOD? Student : No , sir. Professor: Have you ever felt your GOD, tasted your GOD, smelt your GOD? Have you ever had any sensory perception of GOD for that matter? Student : No, sir. I’m afraid I haven’t. Professor: Yet you still believe in Him? Student : Yes. Professor : According to Empirical, Testable, Demonstrable Protocol, Science says your GOD doesn’t exist. What do you say to that, son? Student : Nothing. I only have my faith. Professor: Yes, faith. And that is the problem Science has. Student : Professor, is there such a thing as heat? Professor: Yes. Student : And is there such a thing as cold? Professor: Yes. Student : No, sir. There isn’t. (The lecture theater became very quiet with this turn of events.) Student : Sir, you can have lots of heat, even more heat, superheat, mega heat, white heat, a little heat or no heat. But we don’t have anything called cold. We can hit 458 degrees below zero which is no heat, but we can’t go any further after that. There is no such thing as cold. Cold is only a word we use to describe the absence of heat. We cannot measure cold. Heat is energy. Cold is not the opposite of heat, sir, just the absence of it. (There was pin-drop silence in the lecture theater.) Student : What about darkness, Professor? Is there such a thing as darkness? Professor: Yes. What is night if there isn’t darkness? Student : You’re wrong again, sir. Darkness is the absence of something. You can have low light, normal light, bright light, flashing light. But if you have no light constantly, you have nothing and its called darkness, isn’t it? In reality, darkness isn’t. If it is, well you would be able to make darkness darker, wouldn’t you? Professor: So what is the point you are making, young man ? Student : Sir, my point is your philosophical premise is flawed. Professor: Flawed ? Can you explain how? Student : Sir, you are working on the premise of duality. You argue there is life and then there is death, a good GOD and a bad GOD. You are viewing the concept of GOD as something finite, something we can measure. Sir, Science can’t even explain a thought. It uses electricity and magnetism, but has never seen, much less fully understood either one. To view death as the opposite of life is to be ignorant of the fact that death cannot exist as a substantive thing. Death is not the opposite of life: just the absence of it. Now tell me, Professor, do you teach your students that they evolved from a monkey? Professor: If you are referring to the natural evolutionary process, yes, of course, I do. Student : Have you ever observed evolution with your own eyes, sir? (The Professor shook his head with a smile, beginning to realize where the argument was going.) Student : Since no one has ever observed the process of evolution at work and cannot even prove that this process is an on-going endeavor. Are you not teaching your opinion, sir? Are you not a scientist but a preacher? (The class was in uproar.) Student : Is there anyone in the class who has ever seen the Professor’s brain? (The class broke out into laughter. ) Student : Is there anyone here who has ever heard the Professor’s brain, felt it, touched or smelt it? No one appears to have done so. So, according to the established Rules of Empirical, Stable, Demonstrable Protocol, Science says that you have no brain, sir. With all due respect, sir, how do we then trust your lectures, sir? (The room was silent. The Professor stared at the student, his face unfathomable.) Professor: I guess you’ll have to take them on faith, son. Student : That is it sir … Exactly ! The link between man & GOD is FAITH. That is all that keeps things alive and moving. P.S. I believe you have enjoyed the conversation. And if so, you’ll probably want your friends / colleagues to enjoy the same, won’t you? Forward this to increase their knowledge … or FAITH. By the way, that student was EINSTEIN.

के द्वारा: चन्दन राय चन्दन राय

ही………. ही…………. ही ……………….हाँ…..हाँ…..हाँ……! हम तो आज भी किसी के निष्काशन के विरुद्ध हैं..............क्योंकि मुझे किसी को मैदान से बाहर करके तलवार हवा में चलने की आदत नहीं हैं.................और जहाँ तक रही मेरी बात मुझे किसी के भीख पर रहने की आदत नहीं.................चलिए कम से कम आप तो साथ दे रहे हैं लग रहा है कुत्तों के मेहरबानियाँ आप पर कुछ ज्यादे ही हैं जो आप तबसे मेरे पीछे पड़े हैं जब से मैं उनके कारनामों को सबके बीच में ला दिया हूँ.....परन्तु मैं कोई कुत्ता नहीं हूँ, यह तो मुझे बस उपाधि मिली है....इसलिए मेरा आलेख कुत्ते पर पढ़ने के बाद जिस उम्मीद से आप मेरे पीछे पड़े हैं. वह काम मैं नहीं करता...बेहतर होगा....आप किसी आस-पड़ोस के कुत्ते के पूंछ में तेल लगाये .....वह आपकी परेशानी जरुर दूर करेगा..........!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: saaketji saaketji

और आपका एक कुक्कुर ऊपर झुट्ठे सिकड़ी तुड़ा रहा है. कौन पूछता ही है इसको, ज़रा बता दीजिएगा. दूसरे के निष्कासन की याद है और अपना कुक्कुरपना भुला गया. क्या बचा ही इसके पास जो कोई सुखलो हड्डी डालेगा इस कौड़ी के तीन को. कहीं कुछ लिखता है तो लोग मिटा देते हैं. जबरदस्ती गले पड़ रहा है तो लोग पल्ला झाड़ ले रहे हैं. जिन बुड्ढे लोगों को व्यभिचारी घोषित कर रहे हैं, उन्हीं में से एक को इसकी दयनीय स्थिति पर दया आ गई, नहीं तो एक महिला के चपेटे में आकर छटपटा छटपटा कर दया की भीख मांग रहा था. बहुत जल्दी भूल जाता है. इसका नेचर फिर हिलोरें लेने लगा है, क्योंकि मौक़ा मिल गया. ऊ कहावत है न ...'जाति सुभाउ न छूटे, आ टांग उठाकर मूते' . बहुत जल्दी इसकी फिर वही गति बनाने वाली है, यदि आदत नहीं छूटी तो. लेदेकर आप ही एक हैं, जहां आकर जीभ निकालकर थोड़ी देर सांस लेता है. हफर हफर हफ हफ ... हा हा हा हा . लोग जानते हैं कि आप भी अपना मतलब निकालकर इसको दूध की मक्खी जैसा फेंक देते हैं, अउर ई आदतन आपके पास आ चिपकता है. समझा दीजिये.

के द्वारा: saaketji saaketji

टेस्ट हमारा निम्न है कि आप का, खुद ही देख लीजिये, दूसरे से क्या पूछना. आपका ब्लॉग ही आपके टेस्ट का सूचक है. आप ने बूढों को लपेटा भी तो लड़कों के साथ बलात्कार की कल्पना में. लड़कियों महिलाओं की कल्पना करना आपके ज़ेहन में नहीं आया, जो बलात्कार भी होता तो कम से कम प्राकृतिक तो होता. आपके दिमाग में यही सब गंदगी भरी है, और यह कोई नई बात नहीं है. अप्राकृतिक यौनाचार को लेकर आपके दिमाग में ज़रूर कोई ग्रंथि है, जिसकी अभिव्यक्ति किसी न किसी रूप में तो होनी ही है. मुझे डर है कि जैसा आपका दिमाग है, शादी के बाद कहीं आप अपनी पत्नी को भी अप्राकृतिक यौनाचार के अँधेरे कुँए की और न धकेल दें, जैसा कि आज पश्चिमी जगत पागल हो रहा है. किसी सर्वेक्षण में पढ़ा था कि वहां के तलाक के कारणों में एक बड़ा प्रतिशत पुरुषों द्वारा अपनी पत्नियों को मुख मैथुन या गुदा मैथुन जैसे घृणित अप्राकृतिक यौनाचार के लिए मजबूर करना होता है. अत्याधुनिक विचारों की होने के बावजूद महिलाएं तलाक की अर्जी में यह बात छुपाना पसंद करती हैं. आप बिलकुल उन्हीं संस्कारों के बीच रहने और सोचने वाले पुरुष लगते हैं. जाहिर है कि आपको घेरकर चकल्लस करने वाले महिला पुरुष भी कुछ ऐसे ही टेस्ट के होंगे.

के द्वारा: saaketji saaketji

“पर कहा जाता है की कोई बदलता नहीं........” सुना तो आपने सही है लेकिन समझा गलत है.......” ...कोई भी आदत गलत नहीं होती है...बल्कि आदत मात्र गलत होती है....जो होशपूर्वक जीता है उसके जीवन में कोई आदत नहीं होती है......न सही आदत और न ही गलत आदत..... मेरी बातों को फिर से समझने की कोशिश कीजिए..... जैसे आग में घी डालने से आग और भड़क उठती है, वैसे ही शारीरिक भोग बेहोशी में भोगने से उनके प्रति इच्‍छा खत्‍म नहीं होती, बल्कि और प्रबल होती जाती है। समय के साथ शरीर दुर्बल होता जाता है, मन की वासनाओं को तृप्‍त करने के लिए साथ नहीं दे पाता। शरीर बूढ़ा होता है, लेकिन मन युवा ही रह जाता है। तब यह दुख बहुत भारी हो जाताहै। जिन्‍होंने भोगा उन्‍होंने ही सही में त्‍यागा। लेकिन जिसने भोग का सिर्फ चिंतन किया, उसका त्‍याग कभी नहीं हो सकता। वह केवल सोचता ही रहेगा त्‍याग करने के बारे में। जिसने होशपूर्वक भोगा और यह जानते हुए भोगा कि ‘एतन्‍मांसवसादिविकारम्’, वही फिर होशपूर्वक उसका त्‍याग भी कर सकता है।

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

.हाँ.....हाँ...हाँ.... कमबख्त किसको पड़ी है यहाँ पाने की............... अब हुई बात न ........चलो यदि असली चहरे के साथ मुझसे लड़ने की हिम्मत नहीं तो ऐसे ही नाम बदलकर लड़ों . परन्तु ऐसे शब्दों का इस्तमाल मत करों की बार-बार आपको लोग निष्काषित करते रहे.....! मैं तो नहीं चाहता की कोई भी व्यक्ति इस मंच को छोड़े और जो लोग यहाँ से किसी को हटाने के लिए संपादक महोदय के यहाँ गुहार लगते रहते हैं...मैं उनकी इस विचारधारा का विरोध करता हूँ..................! एक चीज आपको बताना भूल गया, मेरे पास वो दृढ इच्छा शक्ति है जिसके बल पर इंसान क्या नदियों का भी राह मोड़ दू........पर अनिल किसी को भाव नहीं देते................! वो भी अपनी अच्छों की पूर्ति के लिए................तो कभी नहीं !

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: D33P D33P

के द्वारा: D33P D33P

क्या आप भी हमेशा मुझको गंभीर करने के चक्कर के लगे राहतें है..... प्रेम शाश्वत है...आज से 5000 साल पहले भी था, आज भी है और सदियों बाद भी रहेगा.....मेरे ख्याल से, 'Life is nothing but an opportunity to Love' इसीलिए प्रेम पर लिखना मेरी मज़बूरी है..... "खुसरो पाती प्रेम की बिरला बाँचे कोय। वेद, कुरान, पोथी पढ़े, प्रेम बिना का होय।।" प्रेम को छोड़ कर सब बकवास है.......ये दर्शन, मनोविज्ञान ये सब अन्धो के द्वारा प्रकाश के बारे मे की गई थोथी बात-चित है......इनमे कुछ सार नहीं है....... "खुसरो बाजी प्रेम की मैं खेलूँ पी के संग। जीत गयी तो पिया मोरे हारी पी के संग।।" मुझे तो इश्क़ हुआ है मैं तो इश्क़ की बात ही करूँगा........हमको दुनियाँ-दारी से क्या लेना देना...... "हमन है इश्क मस्ताना, हमन को होशियारी क्या ? रहें आजाद या जग से, हमन दुनिया से यारी क्या ?"

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

मियां, आपने बहुत कुछ लिख दिया परन्तु सिर्फ शब्द ही बढ़ाएं है...बुड्ढों के इश्क के किस्से और कारनामे तो कुछ लिखा ही नहीं आपने..............खुदा न खस्ता , मुझे न लिखना पड़े , वरना हंगामा हो गायेगा....दो-चार बुड्ढे, अपनी असिलियत बहार आते देख निश्चय ही इस दुनिया से उठ जायेंगे.......अब इ देखिये मेरी बात सुनकर कुछ बुड्ढों के सांसे फूलने लगी और कुछ का पुराना दम उभर आया.....अरे भाई आप सभी निश्चिन्त रहें......मैं ऐसा कुछ नहीं लिखने वाला. जब उधर से बन्दुक नहीं चलेगी तबतक इधर से टॉप भी नहीं चलेगा. इतना आश्वासन देते हैं.... बचपन किताबो के बोझ के तले, नौजवानी बेरोजगारी के चोट के तले, सब कुछ लुट गया यहाँ हमारा बुड्ढे बाप का क्या जाता है............और ऊपर एक इलज़ाम कि बैठकर घर पर "अलीन" बुड्ढे बाप का खाता..... कौन कहता कि बुड्ढे इश्क नहीं करते, अरे भैया हम तो इ कहते हैं नौजवान इश्क के लायक नहीं, ऐसे मैं बुड्ढे कुछ भी कर जाएँ वो खलनायक नहीं...................हाँ......हाँ....हाँ......!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

के द्वारा: D33P D33P

अदरणीय बहिन, अपने भाई का कुछ तो ख्याल रखिए..... लड़कियों से तो मत लड़ाइए मुझे....... ये ख़बर मुझ तक पहुँच गई थी.......और किसी ख़ास कारण वश मैंने बस ‘हूँ’ लिख कर छोड़ दिया था...सब से पहला कमेंट मैंने ही किया था..... “वो समझ गयी और अपनी बोरिया बिस्तर समेत चल दी यंहा से”.....मुझे इस बात का बेहद अफ़सोस है....मैं यहाँ लड़कियों की संख्या बढ़ाना चाहता हूँ न की घटना............आप plz ऐसा कुछ भी मत कीजिए जिससे की लड़कियों को ये मंच छोड़ना पड़े.....(अपने भाई की भावनाओं को समझिए....कितना दुखी होता हूँ जब कोई ख़ूबसूरत इंसान इस मंच को छोड़ कर जाता है क्या बताऊँ.......have सम दया ऑन मी) “आपकी चेली बनते -२ वो रह गयी “ क्या मतलब है आपका ......????????? जोक्स सुनना मजबूरी है.....अभी मैं लोगों को तैयार कर रहा हूँ......अपने देखा नहीं क़साई बकरे को काटने से पहले अचार खिलता है..... “टी आर पि भी बढ़ जाती” .....नहीं ये टीआरपी बढ़ाने के लिए नहीं है.......बढ़ता हो ये अलग बात है......

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

सितीया जी : 'सुसरे हम तोका पाहिलेहे कहने रही की जियादा 'लबर-लबर' मत कर, मत कर.....लेकिन तो लोग के हमरी बात मज़ाक लागल....अब खाओ मार ससुरों लरीकी से....यही दिन देखना एकठो बाँकी रह गया था.....' 'हे बबुनी साधनिया' हम तोसे कहे तानी मारअ इन लोगन के....थपरिया दय इन ससुरन के ....तभी येनका भूत उतरी...... लखना: yeeeeeeeeeeeeeeeeeeeee! बुढ़ऊ.......तू ई का फटर-फटर करत बानी हो.....तोका दिमाग फिर गेलअ का .........! Paliya- अपुन को लगता है बुढ़ऊ को ताड़ी कुछ जियादा ही चढ़ गई है.... ......ए बूढ़ा, जियदा मच-मच नहीं करने का ईधर.....नहीं तो एक लगाऊँगा ज़ोर का लखना- अरे बोलत का हो कोरह न सरका दो बुढ़ऊरा का .....ससुरा भरकता है लोगन के हमरे ख़िलाफ Pakiya- और ये साधना जी, तू भी सुन ले .....ये कान-वान गरम करने की बात किस को बोल रही है रे तू, अपन लोग क्या तुझको time-पास दिखते है........जियादा भेजा नहीं गरम करने अपुन का, सुन ले........ 'ये लखना घोड़ा निकाल बे' अभी बताते है इसको....की हम कौन है.... लखना: घोड़ा क्यों भाई.... भागने का है क्या......? Pakiya: अबे चिरकुट....तू भी न.......वॉट लगबाएगा क्या...............!

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

भाई ताजमहल  मैं भी जा चुका हूँ, लेकिन वहाँ चिखेरू और पखेरू के बारे में किसी ने नही ंबताया। आपसे अनमाल  जानकारी मिली, इसके लिये आभार। इतिहास में भी इनका कहीं नाम  नहीं है। यदि इन्होंने सचमुत  ताजमहल का उद्घाटन  किया है तो इन्हें भी वही सम्मन  मिलना चाहिये जो हमारे उद्घाटन करने वाले नेताओं को मिलता है। भाई उन बुढ्ढ़े महोदय का कहीं पता नहीं चला। उनके पैर तोड़े या नहीं। या फिर पहिले से ही टूटे हुये थे।  अरे भाई ये व्यक्तिगत  बातें छोड़िये। एक  तरफ  तो कहते हो हमें सम्मान अपमान से कोई फरक   नहीं पड़ता तथा दूसरी और वही बातें लिये बैठे रहते हो। सच  है भाई हम सबकी करनी और कथनी में बहुत  अंतर हैं। हम सब झूठे अहंम  को लेकर जीते हैं। कुछ  नहीं होने वाला, कुछ  नहीं बदलेने वाला। हम अपने आपको तो बदल नहीं पा रहे। बात करते हैं दुनियाँ को बदलने की। अपने से बाहर  निकलिये। दूसरे को शिक्षा न देकर, पहले खुद  को शिक्षा  दीजिये। इसी तरह के आलेखों की भरमार देखकर मन दुखी हो गया इसलिये कुछ  कड़े एवं व्यंगात्मक  शब्दों का इस्तेमाल  कर  दिया है। दिल  दुखा होगा उसके लिये क्षमा चाहता हूँ। आपकी पोस्ट पर कमेन्ट नहीं हो रहा था, अतः यहाँ पेस्ट कर रहा हूँ।

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

चिखेरू- यार, संदीप भाई का तत्कालीन आलेख को पढ़ने के बाद एक बात याद आ गयी. पखेरू- कौन सी बात यार? चिखेरू- अरे यार, बहुत पुरानी है और वो भी मुग़ल कालीन या यूँ कहो मेरे पिछले जन्म की. जब मैं कबूतर हुआ करता था और ताजमहल की मीनारों पर बैठकर पोटी किया करता था...हाँ....हाँ..हाँ.. पखेरू- सच में, भाई ! बहुत माजा आता होगा न....मीनार पर बैठकर पोटी करने में ......! भाई जल्दी वह बात बताओ न ....अब रहा नहीं जा रहा हैं............! चिखेरू- इस बात को सुनने के लिए, पहिले पोटी करने की मुद्रा में बैठ जाओ.....और पूरा ध्यान पोटी करने में मतलब सुनने में लगा दो.......! पखेरू- लो भाई बैठ गया और ......लगा दिया... ! चिखेरू- क्या लगा दिए ......? पखेरू-अरे भाई ध्यान......आप ही ने तो कहा था......लगाने को....! चिखेरू- अरे हा.....! तो ठीक है ..ध्यान से सुनना......! यह बात उस समय की हैं जब ताजमहल बनकर नया-नया तैयार हुआ था और उसके उद्घाटन होने से पहिले मैं उसके मीनार पर बैठकर उद्घाटन कर दिया था. वो भी क्या हसीं दिन थे........! पखेरू- सच में...... पखेरू- सच में भाई!....उसका उद्घाटन आपने किया था. मुझे तो यकीं नहीं होता.........!भाई कैसे किया था.....आपने. चिखेरू- अबे बुरबक के नाती, कोई भी बात करते समय बीच में मत टोका कर ......जहाँ तक उद्घाटन की बात है तो शाहजहाँ को भी यकीं नहीं हो रहा था कि उसका उद्घाटन मैंने किया है और वो भी तब जब शाहजहाँ ताजमहल बनने के बाद आखें बंद और मुँह खोलकर ऊपर की तरफ सर करके मुमताज को याद कर रहा था. तभी मीनार के ऊपर बैठा हुआ मैं पोटी कर दिया जो सीधे उसके मुख में जा गिरी और इसी के साथ ही हो गया ताजमहल का उद्घाटन.........हाँ...हाँ..हाँ...! और मजा की मत पूछ ..... शाहजहाँ कुछ बोलने लायक नहीं था बस इतना ही कह सका. .. मैं ख़ामो खा ही इसको बनाने में आधा खजाना ख़त्म कर दिया...!मजाक-मजाक में कुछ ज्यादा ही मजाक हो गया... पखेरू- हाँ....हाँ...हाँ......! भाई मजा आ गया....दिल गार्डेन-गार्डेन हो गया.....! चिखेरू- यदि ज्यादे मजा आ गया है तो कुछ फोली भाई को दे दो और कुछ इनके मित्र अलीन भाई को....ताकि यह दोनों बुद्धिमान मूर्खों का दिमाग ठिकाने पर आ जाये......और दूसरा ताजमहल जैसी रचना या कल्पना करने का भी ख्वाब भी हम मूर्खों के बीच न देखे............! हाँ....हाँ....हाँ...! पखेरू- हाँ....हाँ....हाँ...भाई बात तो मजेदार कह रहे हो परन्तु इन दोनों बुद्धिमान मूर्खों से मजा की बात , भला करेगा कौन........? एक करैला है और दूसरा नीम.....हाँ...हाँ....हाँ...!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

महामहिम महिमा श्री जी ऊर्फ़ CBI जी नमस्कार, आप जो ये मेरे दरबार मे फरियाद ले कर आई....वो क्या सोच कर....मैं क्या दैनिक जागरण हूँ.....? या फिर सम्राट विक्रमादित्य.....हूँ ? वैसे मैंने उनको समझा दिया है उनका कहना है कि अब वो आगे से ऐसा नहीं करेंगी..... मैंने उन्हे समझते हुए क्या लिखा था वो मैं यहाँ पोस्ट कर देता हूँ 'follyofawiseman के द्वारा 25/05/2012 तो आप तुंबा हेरा-फेरी का काम करतीं है…..ये सब भी हो रहा है क्या इधर……! क्या मिल गया आपको ये सब कर के…….ये गलत आदत है….सुधार जाइए नहीं तो महिमा जी आपको छोड़ेंगी नहीं….उनका एक दूर का रिश्तेदार CBI मे काम करता है…' ये तुंबा हेरा-फेरी करना लड़कियों की पुरानी आदत है...सो इस बात को ले कर इतना हाय-तौबा मत मचाइए....

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

आदरणीय jj , नमस्कार आज सुबह से आलेख “अन्ध्रेरे के आधार पर विकास करता झारखण्ड ” जिसने आपने featured ” में डाला हुआ है जिसे सुश्री खुसबू जी ने अपने विचार कह के पोस्ट किया हुआ है … वो पूरा का पूरा आलेख टाइप किया हुआ है प्रथम पैर को छोड़ के … सीर्फ आकड़ा होता तो मैं आपके संज्ञान में नहीं लाती क्योंकि इस तरह के आलेख के लिए आकडे कहीं न कहीं से उठाने होते है . पर चुकी महोदय ने पूरा आलेख ही टाइप कर दिया है और संदर्भ भी नहीं दिया है … टी सवाल उठाना स्वाभविक है / आपके जानकारी के लिए बता दू इस आलेख की लेखिका अनुपमा जी है .. जो मर्ज कुछ , दवा कुछ ” के नाम से “तहलका ” के अंक 31may2012 में प्रकाशित है .. चूँकि आप ने सुबह से इसे फीचर किया हुआ है और कल को आप इसे बेस्ट ब्लॉग अफ डी विक भी कर देंगे … तो जानना चाहती हूँ आपकी नजर में ये कहाँ तक उचित है .. क्या जो अपनी स्वरचित और लिखित लेख लिखते हैं क्या उनके साथ नाइंसाफी नहीं होगी .. तो फिर हम भी क्यों मेहनत करे ... http://kg16.jagranjunction.com/2012/05/23/%e0%a4%85%e0%a4%82%e0%a4%a7%e0%a5%87%e0%a4%b0%e0%a5%87-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%86%e0%a4%a7%e0%a4%be%e0%a4%b0-%e0%a4%aa%e0%a4%b0-%e0%a4%b5%e0%a4%bf%e0%a4%95%e0%a4%be%e0%a4%b8-%e0%a4%95%e0%a4%b0

के द्वारा: MAHIMA SHREE MAHIMA SHREE

चिन्ता मत कर वणिक भाई, तेरा भी नम्बर आएगा . जातिवाद की बात मत कर, ब्राह्मण को यदि ब्राह्मण कहने में बुराई नहीं है, तो बनिये को बनिया नहीं तो क्या हरिजन कहेंगे ? सरकारी गजट और अभिलेख में सारे इंतजामात इन जातियों के आधार पर हैं तो तेरी जात क्यों छुपाना ? और तू भाषा की बात करता है ? शिवलिंग पूजा को लज्जाजनक बताने वाले धूर्त्त बगला भगत, तूने इस मंच पर अपनी मीठी छुरी वाली जबान से कम विष नहीं बोया है . तुझे भी बताता हूँ थोड़ी देर में . पहले इस मटर की फ़ली से तो निपट लूँ ! यह नामुराद अब ब्लागर्स को भगाने का घिनौना खेल भी खेलने लगा है . मनु टोसी के ब्लाग पर जाकर ऐसा ताना मारा कि उसने मंच छोड़ने की घोषणा कर डाली . देखता हूँ कौन भागता है . चल फ़ली, आ गया खली ! अब तू जहाँ जहाँ चलेगा, इस खली का साया तेरे साथ होगा .

के द्वारा: bolohari bolohari

चिन्ता मत कर वणिक भाई, तेरा भी नम्बर आएगा । जातिवाद की बात मत कर, ब्राह्मण को यदि ब्राह्मण कहने में बुराई नहीं है, तो बनिये को बनिया नहीं तो क्या हरिजन कहेंगे ? सरकारी गजट और अभिलेख में सारे इंतजामात इन जातियों के आधार पर हैं तो तेरी जात क्यों छुपाना ? और तू भाषा की बात करता है ? शिवलिंग पूजा को लज्जाजनक बताने वाले धूर्त्त बगला भगत, तूने इस मंच पर अपनी मीठी छुरी वाली जबान से कम विष नहीं बोया है । तुझे भी बताता हूँ थोड़ी देर में । पहले इस मटर की फ़ली से तो निपट लूँ ! यह नामुराद अब ब्लागर्स को भगाने का घिनौना खेल भी खेलने लगा है । मनु टोसी के ब्लाग पर जाकर ऐसा ताना मारा कि उसने मंच छोड़ने की घोषणा कर डाली । देखता हूँ कौन भागता है । चल फ़ली, आ गया खली ! अब तू जहाँ जहाँ चलेगा, इस खली का साया तेरे साथ होगा ।

के द्वारा: bolohari bolohari

एक दिन एक बाप अपने बेटे से कह रहा था, 'बेटा इस सीढ़ी पर चढ़ो' 'लेकिन बाबू जी ये टूटा है मैं गिर जाऊँगा....' ' अरे चढ़ो मैं हूँ न, नहीं गिरो गे ये मेरा अनुभव है,,,,,अपने भाप पर भरोसा कर......" बाप के बार बार कहे जाने पर बेटा सहमते हुए चिढ़ी पर चढ़ता है लिकिन जैसे ही आधी सीढ़ी पर पहुँचता है सीढ़ी टूट जाती है और बेचारा धाम से ज़मीन पर गिरता है........ '' बाबू जी, मैं पहले ही कह रहा था की मैं गिर जाऊँगा...ऊँ ...ऊँ.....ऊँ.....' बाप बेटे को चुप कराते हुए कहता है.......'चुप हो जा , मैं तुम्हें एक सीख दे रहा था....जिंदगी मे कभी किसी पर भरोसा मत करना आपने बाप पर भी नहीं....." वो बात मैंने लोगो को अविश्वास सीखने के लिए कही थी.....महाभारत की लड़ाई मे दो लोगों ने शपथ ली थी एक कृष्ण के और एक भीष्म ने......भीष्म अंत तक अपनी शपथ पर क़याम रहे....लेकिन कृष्ण ने अपनी शपथ तोड़ दी......कोई भी आत्मवान व्यक्ति ऐसा ही करता.......मैं वर्तमान मे जीता हूँ पास्ट मे नहीं......मैं बीते कल की लाश को अपने कंधो पर लेकर नहीं जीता हूँ.......छोटे बच्चे को कभी आपने देखा अभी लड़ेगा अभी दोस्ती.......!  साधना जी वो सच मे मज़ाक ही था वो भी गहरा वाला......ही....ही....ही

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

आपके अन्दर एक पुरुष और एक स्त्री के अलावा एक ”ड्रैकुला ” भी “ ..ha.ah.ha.ha.ha..hah…..! ये अच्छा इल्ज़ाम है......! मैं आश्चर्यचकित हूँ स्त्री का शरीर होते हुए भी आपको स्त्री के शरीर और मन के बारे मे न के बराबर पता है.......ये किसने कह दिया आपको की कुदरत ने स्त्री को पुरुष के कम शक्ति दी है.......अपने ने शायद बलूची महिलाओं के बारे में नहीं सुना है वो इतनी ताकतवर होती है की हमारे 5-6 पुरुषो को एक साथ आराम से पछार सकती है....आदिवासी औरतें बच्चे को जन्म देने के तुरंत बाद ही उठ के खड़ी हो जाती है और चल देती है आगे की यात्रा पर......अभी मुझे याद है...जब पहली बार मैंने अपनी एक लड़की दोस्त (girl friend) से हाथ मिलाया था तो उसने मुझ से कहा "तुम्हारे हाथ तो मुझसे भी जियादा कोमल हैं॥" और ऐसा बाद मे कई लड़कियों ने मुझसे कहा.....शारीरिक शक्ति श्रम करने से आती है.....ये कोई कुदरत की देन नहीं है.....स्त्री सभी अर्थो मे पुर्षों से अधिक होती है.......लड़कियाँ लड़कों से पहले बोलना शुरू करती है.....बचपन मे उनका मरने का अनुपात लड़कों से कम है......लड़के जियादा मारतें है बचपन...मे.... लड़कियों मे समझदारी लड़कों से अधिक होती है.........औरतें जियादा दिन जिंदा रहती है पुर्षों के अपेक्षा.......पुर्षों से अधिक सुंदर होती है...मुझे तो कहीं कमी नहीं दिखता है.......पुरुष तो ज़र होता है.......!  कुछ भी universal fact नहीं हो सकता है....सत्य मान्यता के हिसाब से बादल जाता है......आदमी खुद को जो मान लेता है वही हो जाता है है...."what you think you become"...........!  " you have got great insight……? Come back…and keep writing….!लिखते हैं…." पहली बात ये बात मैंने किसी और से कही थी आप को इसे यहाँ नहीं उठाना चहाइए था.....खैर , ये मैंने जिस मोहतरमा को लिखा था वो काफी दिन से कुछ नया नहीं लिख रहीं है...इसीलिए मैंने उनको झाड़ पर चढ़ाया ताकि बात में छाड़ को काट सकूँ......ये मैंने बस जाल फैलाया था.....बाद मे खिचाई करता......सरिता जी its game! "समाज की विकृतियाँ समाज कहिस्सा बेशक हैं ,जैसे फोड़ा शरीर का हिस्सा होता है, उसका इलाज किया जाता है और ठीक न होने की स्थिति में काट कर निकाल दिया जाता है…" सिक्के के एक पहलू को उसके दूसरे पहलू से अलग नहीं किया जा सकता है.......पिछले पाँच हज़ार सालो से कोशिश चल रही है अभी तक तो नहीं हुआ है देखते है आगे क्या होता है.......' "अपनी पोस्ट पर एक सुंदरी की फोटो लगा कर किसी भी डर से हटाते नहीं..क्या आपके अन्दर स्त्री, पुरुष और ड्रैकुला के साथ एक कायर भी है……..???" मेरे फेस्बूक पर जा कर देख लीजिए आपको कई नंगी स्त्रीयों के फोटो मिलेगा.......मैंने इस लिए हटाया क्योंकि वो फिट नहीं बैठ रहा था.....मेरा अगला लेख वाइन एंड वुमेन है उसमे वो फोटो भी होगा और नरक के द्वार वाली बात भी......मैंने उसे अगले लेख केलिए बचा के रख लिया है......इसिले Don't jump into conclusion so soon...! "दरअसल आप को विरोध करनेका नशा है" ये बात सच है.......लेकिन ध्यान रहे नशा ही है आदत नहीं है...... " अपनी और दूसरों की प्रतिभा नष्ट कर रहे हैं……" हाँ .....हाँ.....हाँ...........! वो तो मैं ने पहले भी कहा था मैं अकेले नहीं डुबूँगा सब को साथ ले के जाऊँगा........

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

या तो आप बात को ठीक से समझ नहीं पाए.... या तो आपके अन्दर एक पुरुष और एक स्त्री के अलावा एक  "ड्रैकुला " भी है जिसे खून की गंध लग गयी है और अब वो एक नए शिकार यानि की एक नए मुद्दे की तलाश में है.... कुदरत ने स्त्री को पुरुष से कम शक्ति दी है,, इसी लिए अधिक शक्ति वाले की कम शक्ति वाले से तुलना लोग चिढाने केलिए करते हैं...अगर मैं ने कहा की......god has created woman as a weaker gender than man, everybody wud hv to accept and respect it……”तो ये कुदरत का सम्मान करना है ,मेरा नहीं...मुझे या किसी को भी सम्मान मांगने की ज़रूरत नहीं होती है , ये तो उसके कर्म निर्धारित करते हैं .....  ...ये एक "universal fact" है, कोई आपकी विचारधारा नहीं कि रोज़ बदल जाये....... अन्यथा कभी तो आप स्त्री सुलभ गुणों का मजाक उड़ाते हैं और कहीं........ She’s no longer apart What other seeks, she desired too, She forgot her aimbition and opted Him as her mission,she did this, For whom, who used her, Absued her, and said that he loves her. Why? Why she still loves him? Why, her heart still beats for whom Who tried to shadow her shine, And said, “this is my style and Darling you’re only Mine”.......... ऐसा लिखने वालेको आप you have got great insight……? Come back…and keep writing….!लिखते हैं.... समाज की विकृतियाँ समाज कहिस्सा बेशक हैं ,जैसे फोड़ा शरीर का हिस्सा होता है, उसका इलाज किया जाता है और ठीक न होने की स्थिति में काट कर निकाल दिया जाता है... आप अपने ही विचारों से डरे रहते हैं तो दूसरे के विचारों को क्या समझें गे..अगर ऐसा न होता तो अपनी पोस्ट पर एक सुंदरी की फोटो लगा कर किसी भी डर से हटाते नहीं..क्या आपके अन्दर स्त्री, पुरुष और ड्रैकुला के साथ एक कायर भी है........??? साथ ही वो चार लाइनें......जो स्त्री शरीर क्रिया विज्ञान से सम्बंधित थीं....खुद न कह पाने से डर कर, अपने मित्र पकिया से कहलवाया....फिर भी डर के मारे डिलीट कर दिया............?? दरअसल आप को विरोध करनेका नशा है....ये नशा तर्क के सामने कुतर्क करने से पूरा होता है....इसी लिए आप अपनी पूरी की पूरी रचनात्मक शक्ति से कुतर्कों का भाड़ झोंक रहे हैं और अपनी और दूसरों की प्रतिभा नष्ट कर रहे हैं......

के द्वारा: sinsera sinsera

अदरणीय एवं पूजनीय सरिता जी,  'अपनी डफली अपना राग' ...........मुझे तो ये देख कर यक़ीन नहीं आ   रहा है की आप इस तरह की बातें कर रही है.......... अरे जिसका कोई मान ही नहीं है उसक मानहानि क्या होगा......अगर ऐसा है तो आपको उसी वक्त respond करना चाहिए था जब आपने लेख को पढ़ा.......आत्मवान व्यक्ति respond करता है.....तीन दिन बाद react नहीं........और ऐसा भी क्या मान जो किसी के देने से मिलता हो और न देने से घट जाता हो....मुझे पूरा उम्मीद है कि किसी पुरुष ने उकसाया होगा आपको......चाहे वो बाहर का पुरुष हो या फिर आपके ख़ुद के भीतर का..... इस कमेंट को पढ़ने के बाद एक बात तो मैं दावे के साथ कह सकता हूँ की आपका चित स्त्रेण बिल्कुल नहीं है.....आपकी मानसिकता पुरुषो वाली है..... इस सब के आलवे......न तो कोई स्त्री सिर्फ स्त्री होती है और न ही कोई पुरुष सिर्फ पुरुष होता है........स्त्री पुरुष के बीच जो भेद है वो quality का नहीं है quantity का है......हरेक पुरुष के भीतर स्त्री होती और हरेक स्त्री के भीतर पुरुष होता है.......और इसी वजह से, हो सकता है की किसी का शरीर स्त्री का हो लेकिन उसका चित पुरुष का हो...... "इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया…" जेजे ने इसलिए नहीं हटाया क्योंकि यह महावाहियात और घटिया लेख हमारे समाज का ही हिस्सा है......ये किसी और लोक की बात नहीं है........... आपकी जानकारी के लिए एक बात बता दें....की बिना रावण के राम का होना असंभव है.......आप तब तक ही मर्यादित हैं तब की अमर्यादित लोग समाज मैं मौजूद हैं......ये जीवन का गहरा गणित है इसे अच्छे से समझ लीजिए.......जिस दिन दुनियाँ से प्रकाश का अंत हो जाएगा उसी दिन अन्ध कार भी चला जाएगा.......... " इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ" क्या हटा देने से मान-सम्मन वापिस आ जाएगा.....अगर यदि आजाएगा तो इस तरह की थोथी मान सम्मान का क्या मोल..........और किसी के माने देने से आपका मान बढ़ता है...........तो समझ लीजिए देने वाला आपसे कहीं जियादा सम्मानित है...........क्योंकि देने वाला लेने वाले से हमेशा ऊपर रहेगा........मान-सम्मान भीख माँगने की चीज़ नहीं है.........ये भिखमंगापन त्यागिए.........!  और अंत मे यही कहूँगा....कि , 'जो सच मे ही सम्मानित व्यक्ति है उनके मान सम्मान को वो लेख पढ़ कर तनिक भी ठेस नहीं पहुँचेगा..... और जिनको पहुँचेगा वैसे table कुर्सी की कौन परवाह करता है............मेरे भीतर के स्त्री को तो कोई ठेस नहीं पहुँचा........." (और कोई भी व्यक्ति अगर अस्तित्व के इस स्त्री और पुरुष के रहस्य को और गहरे से समझना चाहता हो.......मुझे पर्सनल मेल कर के जान सकता है.........) एक और बात ज़रा मुझे बताइए....जब आब मरेंगी तो क्या आप के साथ दुनियाँ की सभी तथाकथित स्त्रियाँ मर जाएँगी......? व्यक्ति का अस्तित्व होता है...समाज का नहीं.....मैं अचंभित हूँ कि जो लोग खुद अंधविश्वास मे जी रहें है वो लोगों को क्या अंधविश्वास से बाहर निकलेंगे......????

के द्वारा: follyofawiseman follyofawiseman

हे भगवान ! अब यहाँ भी, यह तो सही के काली मैया की तरह हाथ धोकर पीछे पड़ गयी हैं.....कहे को तड़पा- तड़पाकर मार रही हैं बालक को. लीजिये एक ही बार में मेरा गर्दन काट कर खा जाइये न......मित्र इस देवी से मुझे बचाओ यार.....देखों कही से बकरा लाकर देवी को बलि में चढाओं नहीं तो यह तो बच्चे की जान लेकर ही रहेंगी......! फ़िलहाल इनसे बचने के लिए मैं आँखें बंद कर लेता हूँ....! अब आँखें फाड़ कर मुझे देख क्या रही हैं.........मैं तो आँखें और कान बंद कर लिया हूँ . आप कुछ भी बोलिए देखौर सुन थोड़े नहीं रहा हूँ......मित्र जल्दी करना वरना मैं देर तक अपनी आँखें बंद नहीं कर सकता....और इस बीच, यदि मेरी आखें खुली तो यह देवी तो मुझे खा ही जाएँगी....!

के द्वारा: अनिल कुमार ‘अलीन’ अनिल कुमार ‘अलीन’

मेरी सदा सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध एक आवाज अनिल कुमार ‘अलीन’ कुत्ता, मैं या तू ?http://merisada.jagranjunction.com/2012/05/20/%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE-%E0%A4%AE%E0%A5%88%E0%A4%82-%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%A4%E0%A5%82/ sinsera के द्वारा May 22, 2012 48 घंटे से सोच रही हूँ कि इस पोस्ट को कोई “report abuse ” क्यूँ नहीं कर रहा है.? सभी प्रबुद्धजन पढ़ रहे हैं और कमेन्ट भी कर रहे हैं… मुझे कटु व कठोर भाषा कतई पसंद नहीं है लेकिन मजबूरीवश कह रही हूँ कि इस महावाहियत, घटिया, निकृष्ट कोटि के लेख को खुद जे जे ने क्यूँ नहीं हटाया….आश्चर्य है….? समाज की विकृतियों को विकृति के रूप में दिखाया जाये तो पढना बुरा नहीं है, लेकिन 2%मानसिक रोगियों के आधार पर पूरी स्त्री जाति को लेखक महाशय generalize करने की धृष्टता कैसे कर सकते हैं..? यह “x-rated” लेख पूरी स्त्री जाति का अपमान है. मैं लेखक महाशय से इस लेख को तुरंत हटाने की अपील करती हूँ …अन्यथा उनके इस घृणास्पद कृत्य के लिए उनके ऊपर मानहानि का दावा किया जा सकता है…. इस पोस्ट और मेरे कमेन्ट की कॉपी मेरे पास है….कृपया कमेन्ट डिलीट करने का निकृष्ट कृत्य न करें….

के द्वारा: sinsera sinsera

न तो मेरा भगवान् सर्वशक्तिमान है और न ही सर्वज्ञ और सर्वव्यापी है, ……वो तो सभी प्रकार के चमत्कार व बकवास से रहित सीधा, सरल और साधारण है और यही कारण है कि मेरा भगवान् कभी पाखंडी नहीं हो सकता है…..वो जैसा भी है बस है…. मैंने उसको पूजने के लिए कोई शर्त नहीं रखी है, मेरा भगवान् मेरी कुंठित और विक्षिप्त वासनाओं का प्रक्षेपण नहीं है…… मेरा भगवान् पालनहार और सृजन करता नहीं है, इसीलिए मुझे उस पर निर्भर रह कर अकर्मण्यता में जीवन बिताने कि जरूरत नहीं है… संदीप जी बहुत सुन्दर बातें कही हैं प्रभु के लिए आप ने लेकिन जो कही हैं काश ऐसा ही हो और रहे ..... एक ही विन्दु को देखने का सब का अपना अलग नजरिया होता है ...थोड़ी सी स्याही गिरा दीजिये और प्रत्यक्षी करण करा लीजिये लोगों से अपने आप ये छोटी सी चीज समझ आ जायेगी ये ब्रह्माण्ड तो बहुत बड़ी बात है .... हाँ इतना अवश्य है जो बुरा कृत्य है सो बुरा है ...चाहे वह साधू हो आम मानव हो आप हो या हम .... न तो मेरा भगवान् सर्वशक्तिमान है और न ही सर्वज्ञ और सर्वव्यापी है,....ये भी ठीक है जब जिन्दगी के किसी मोड़ पर ऐसे वक्त आ जाते हैं सारी राहें बंद तो सर्व शक्तिमान बरबस याद आ जाता है ...शायद आप भी कभी अनुभव कर लें अभी जिन्दगी बाकी है ...उस भोले को याद कर आप के अपने ईश्वर का .... मन चंगा तो कठोती में गंगा ये भी पुराणी कहावत है ............. गोता लगाइए और बहुत से नए विचार मिलते रहेंगे ..शुभ कामनाएं .... भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukla bhramar5 surendra shukla bhramar5